हिमाचल प्रदेश में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त (State Chief Information Commissioner) और सूचना आयुक्त (Information Commissioner) के लंबे समय से खाली पड़े पदों को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। सूचना का अधिकार (RTI) व्यवस्था से जुड़े इन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति नहीं होने के मामले में अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
यह मामला एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation) के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा, जिसमें कहा गया कि राज्य सूचना आयोग के प्रमुख पद पिछले कई महीनों से रिक्त हैं। याचिका में यह भी दलील दी गई कि इन पदों पर नियुक्ति न होने के कारण सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आने वाली शिकायतों और अपीलों के निस्तारण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बी.सी. नेगी की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका में उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और निर्धारित समय के भीतर अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा।
अदालत ने सरकार से यह जानकारी भी मांगी है कि इन महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं वैधानिक पदों पर नियुक्ति अब तक क्यों नहीं की गई तथा रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार की ओर से अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
जनहित याचिका में कहा गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) के तहत प्रत्येक राज्य में राज्य सूचना आयोग का गठन किया जाता है। आयोग का नेतृत्व राज्य मुख्य सूचना आयुक्त करते हैं और उनके साथ सूचना आयुक्त कार्य करते हैं।
याचिका के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का पद जून 2025 से रिक्त है, जबकि सूचना आयुक्त का पद जुलाई 2025 से खाली पड़ा हुआ है। लंबे समय तक इन पदों पर नियुक्तियां नहीं होने के कारण आयोग की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग में लंबित मामलों की संख्या बढ़ सकती है और सूचना प्राप्त करने के अधिकार का प्रभावी क्रियान्वयन भी प्रभावित हो सकता है।
सूचना आयोग की क्या होती है भूमिका?
राज्य सूचना आयोग सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत गठित एक महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सरकारी विभागों से सूचना प्राप्त करने के अधिकार की रक्षा करना और सूचना उपलब्ध कराने से जुड़े विवादों का समाधान करना होता है।
जब किसी नागरिक को निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचना नहीं मिलती या सूचना देने से मना कर दिया जाता है, तब वह संबंधित विभाग में प्रथम अपील के बाद राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील या शिकायत दर्ज कर सकता है।
आयोग ऐसे मामलों की सुनवाई करता है और आवश्यक होने पर संबंधित अधिकारियों को सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश भी जारी कर सकता है। साथ ही, अधिनियम के उल्लंघन के मामलों में आयोग के पास दंडात्मक कार्रवाई करने की भी शक्तियां होती हैं।
पद खाली रहने से क्या हो सकता है असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सूचना आयोग में शीर्ष पद लंबे समय तक खाली रहने से आयोग की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
यदि आयोग में पर्याप्त संख्या में आयुक्त उपलब्ध नहीं होंगे, तो—
- अपीलों और शिकायतों की सुनवाई में देरी हो सकती है।
- लंबित मामलों की संख्या बढ़ सकती है।
- सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
- नागरिकों को समय पर न्याय मिलने में कठिनाई हो सकती है।
- आरटीआई अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर असर पड़ सकता है।
इसी कारण विभिन्न राज्यों में सूचना आयोग के रिक्त पदों को समय पर भरने की मांग समय-समय पर उठती रही है।
सूचना का अधिकार अधिनियम क्यों है महत्वपूर्ण?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून माना जाता है। इस कानून के माध्यम से नागरिक किसी भी सरकारी विभाग, मंत्रालय, सार्वजनिक प्राधिकरण या सरकारी संस्था से निर्धारित प्रक्रिया के तहत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
इस अधिनियम का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता बढ़ाना, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना और सरकारी संस्थाओं को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना है।
पिछले दो दशकों में आरटीआई कानून के माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक हुई हैं और विभिन्न प्रशासनिक मामलों में पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है।
नियुक्ति प्रक्रिया कैसे होती है?
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। इसके लिए एक चयन समिति की सिफारिश के आधार पर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की जाती है।
इस चयन समिति में सामान्यतः मुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता तथा मंत्रिपरिषद के एक नामित सदस्य शामिल होते हैं। समिति योग्य उम्मीदवारों के नामों पर विचार करने के बाद अपनी सिफारिश राज्यपाल को भेजती है।
याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होने के कारण आयोग की नियमित कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है।
सरकार से मांगा गया विस्तृत जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे मामले पर विस्तृत जवाब दाखिल करे। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि—
- दोनों पद कब से रिक्त हैं।
- नियुक्ति प्रक्रिया में देरी क्यों हुई।
- अब तक कौन-कौन से प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं।
- रिक्त पदों को भरने की संभावित समय-सीमा क्या है।
अदालत सरकार के जवाब के आधार पर आगे की सुनवाई में आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
जनहित याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में यह तर्क दिया गया कि सूचना आयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था है। यदि आयोग के शीर्ष पद लंबे समय तक रिक्त रहते हैं, तो नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया कि राज्य सरकार को शीघ्र नियुक्तियां करने के निर्देश दिए जाएं ताकि आयोग पूरी क्षमता के साथ कार्य कर सके और लंबित मामलों का समय पर निपटारा हो।
पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा अहम मुद्दा
सूचना आयोग केवल अपीलों का निस्तारण करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की महत्वपूर्ण कड़ी भी माना जाता है। आयोग के माध्यम से नागरिक सरकारी निर्णयों, योजनाओं, खर्च, नियुक्तियों और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ी सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं।
यही कारण है कि सूचना आयोग के प्रमुख पदों का लंबे समय तक रिक्त रहना सार्वजनिक महत्व का विषय माना जाता है। विभिन्न राज्यों में समय-समय पर सूचना आयोगों में लंबित मामलों और रिक्त पदों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है।
फिलहाल हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है। अब सरकार की ओर से दाखिल किए जाने वाले उत्तर और नियुक्ति प्रक्रिया की प्रगति पर इस मामले की आगामी सुनवाई में अदालत आगे का रुख तय करेगी।




