शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स-निफ्टी लाल निशान में; ऑटो, बैंकिंग और मेटल शेयरों में बिकवाली हावी

शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स-निफ्टी लाल निशान में; ऑटो, बैंकिंग और मेटल शेयरों में बिकवाली हावी

सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रही और शुरुआती घंटों में ही निवेशकों के बीच मुनाफावसूली का माहौल देखने को मिला। सोमवार, 13 जुलाई को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 300 अंकों से अधिक की गिरावट के साथ लगभग 77,200 के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 50 भी करीब 100 अंक टूटकर 24,100 के आसपास पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में सबसे ज्यादा दबाव ऑटोमोबाइल, बैंकिंग और मेटल सेक्टर के शेयरों पर देखने को मिला, जिसके चलते बाजार का समग्र रुख कमजोर बना रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक संकेतों में कमजोरी, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और निवेशकों की सतर्क रणनीति ने घरेलू बाजार की चाल पर असर डाला है। पिछले कारोबारी सत्र में शानदार तेजी दर्ज करने के बाद सोमवार को कई निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी, जिससे प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ गया। शुरुआती कारोबार में अधिकांश सेक्टोरल इंडेक्स लाल निशान में दिखाई दिए और बाजार की चौड़ाई भी कमजोर रही।

ऑटो कंपनियों के शेयरों में बिकवाली का दबाव सबसे अधिक नजर आया। इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर के बड़े शेयरों में भी कमजोरी देखी गई, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। मेटल कंपनियों के शेयर भी गिरावट के साथ कारोबार करते रहे। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है।

इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड करीब 4 प्रतिशत उछलकर लगभग 79 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। ऊर्जा बाजार में आई इस तेजी की एक बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव माना जा रहा है। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह बयान दिया था कि ईरान के साथ हुआ समझौता अब प्रभावी नहीं रहा। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका तेज हुई, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से भविष्य में ईंधन आयात पर दबाव बढ़ने और महंगाई की चिंता भी निवेशकों के बीच बनी हुई है।

तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव परिवहन, विमानन, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण जैसे कई उद्योगों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि कच्चे तेल में आई तेजी ने निवेशकों की धारणा को कमजोर किया और बाजार में बिकवाली बढ़ी। यदि आने वाले दिनों में तेल की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों की लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

घरेलू बाजार के साथ-साथ एशियाई शेयर बाजारों में भी सोमवार को कमजोरी का माहौल देखने को मिला। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स सबसे अधिक दबाव में रहा और इसमें चार प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। जापान का निक्केई सूचकांक भी एक प्रतिशत से अधिक फिसला, जबकि हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स भी लाल निशान में कारोबार करता नजर आया। एशियाई बाजारों में यह कमजोरी वैश्विक निवेशकों की सतर्कता और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाती है।

वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर अक्सर देखने को मिलता है। विदेशी निवेशक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपनी निवेश रणनीति तय करते हैं। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार कमजोर रहते हैं तो भारतीय बाजार में भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू आर्थिक संकेतक अभी भी कई मामलों में मजबूत माने जा रहे हैं, लेकिन वैश्विक जोखिम फिलहाल निवेशकों की चिंता का प्रमुख कारण बने हुए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जहां एशियाई बाजारों में सोमवार को गिरावट रही, वहीं पिछले कारोबारी सत्र में अमेरिकी शेयर बाजार मजबूती के साथ बंद हुए थे। डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज में करीब 150 अंकों की बढ़त दर्ज की गई थी। इसके अलावा नैस्डैक कंपोजिट और एसएंडपी 500 इंडेक्स भी सकारात्मक बढ़त के साथ बंद हुए थे। अमेरिकी बाजारों में आई इस मजबूती के बावजूद एशियाई बाजारों पर इसका सकारात्मक असर नहीं दिखाई दिया, क्योंकि निवेशकों का ध्यान फिलहाल पश्चिम एशिया के तनाव और ऊर्जा कीमतों की ओर अधिक केंद्रित है।

विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। पिछले सात कारोबारी दिनों के आंकड़ों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई/एफपीआई) ने भारतीय शेयर बाजार में लगभग 4,427 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की है। वहीं पिछले 30 दिनों के दौरान भी विदेशी निवेशकों का रुख सकारात्मक रहा और उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 1,975 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने भी लगातार निवेश जारी रखा है। बीते सात दिनों में डीआईआई ने लगभग 4,484 करोड़ रुपये और पिछले 30 दिनों में करीब 39,118 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी दर्ज की। यह संकेत देता है कि घरेलू संस्थागत निवेशक अब भी भारतीय बाजार की दीर्घकालिक संभावनाओं को लेकर भरोसा बनाए हुए हैं।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी निवेशकों की खरीदारी सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन अल्पकालिक उतार-चढ़ाव पर वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है या अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ता है तो आने वाले सत्रों में भी बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। दूसरी ओर यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं और विदेशी निवेशकों की खरीदारी जारी रहती है तो बाजार दोबारा मजबूती की ओर लौट सकता है।

शुक्रवार को बाजार का रुख पूरी तरह अलग था। पिछले कारोबारी सत्र में सेंसेक्स ने शानदार तेजी दिखाई थी और करीब 828 अंकों की छलांग लगाते हुए 77,569 के स्तर पर बंद हुआ था। उसी दिन निफ्टी 50 भी लगभग 244 अंकों की मजबूती के साथ 24,206 के स्तर तक पहुंच गया था। उस तेजी के दौरान निवेशकों में सकारात्मक माहौल देखने को मिला था और कई प्रमुख सेक्टरों में खरीदारी दर्ज की गई थी। हालांकि सप्ताह की शुरुआत में तस्वीर बदल गई और बाजार फिर दबाव में आ गया।

विश्लेषकों के अनुसार शेयर बाजार में इस तरह का उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी एक कारोबारी सत्र की तेजी या गिरावट से लंबी अवधि की दिशा तय नहीं होती। निवेशकों को वैश्विक घटनाक्रम, कंपनियों के तिमाही नतीजे, आर्थिक आंकड़े, ब्याज दरों से जुड़े संकेत और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है। आने वाले दिनों में यदि वैश्विक बाजार स्थिर रहते हैं और घरेलू आर्थिक संकेतक मजबूत बने रहते हैं तो भारतीय बाजार दोबारा मजबूती हासिल कर सकता है।

फिलहाल शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में बने हुए हैं। ऑटो, बैंकिंग और मेटल सेक्टर की कमजोरी बाजार की चाल पर भारी पड़ रही है, जबकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें निवेशकों की चिंता बढ़ा रही हैं। अब बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक वैश्विक संकेतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और ऊर्जा बाजार की चाल पर निर्भर करेगी।