संसद में हंगामे के बीच पास हुआ विनियोग विधेयक, जानिए क्यों जरूरी होता है यह कानून

संसद में हंगामे के बीच पास हुआ विनियोग विधेयक, जानिए क्यों जरूरी होता है यह कानून

संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को लोकसभा में भारी शोर-शराबे और विपक्ष के विरोध के बीच विनियोग (संख्या-3) विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई। सदन में लगातार नारेबाजी और व्यवधान के बावजूद सरकार ने इस महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयक को पारित कराया। यह विधेयक 31 मार्च 2023 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के दौरान सरकार द्वारा स्वीकृत बजट से अधिक किए गए खर्च को कानूनी मान्यता देने से जुड़ा हुआ है।

सरकार के लिए यह विधेयक इसलिए अहम माना जाता है क्योंकि संविधान के तहत भारत की संचित निधि से कोई भी राशि संसद की स्वीकृति के बिना खर्च नहीं की जा सकती। यदि किसी वित्तीय वर्ष में किसी विभाग या योजना पर तय सीमा से अधिक राशि खर्च हो जाती है, तो बाद में संसद से उस अतिरिक्त व्यय की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए विनियोग विधेयक लाया जाता है।

विपक्ष के विरोध के बीच आगे बढ़ी कार्यवाही

मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में विपक्ष ने कई मुद्दों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। लोकसभा और राज्यसभा में बार-बार नारेबाजी होने से कार्यवाही कई बार बाधित हुई। इसके बावजूद सरकार ने अपना विधायी एजेंडा आगे बढ़ाते हुए विनियोग (संख्या-3) विधेयक को पारित कराया।

इसी दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक भी सदन में पेश किया। इस प्रस्तावित कानून में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 तथा वित्त अधिनियम, 2026 में आवश्यक संशोधन किए जाने का प्रावधान रखा गया है। हालांकि विपक्ष के विरोध के कारण इन विषयों पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी।

आखिर क्या होता है विनियोग विधेयक?

सरल शब्दों में समझें तो विनियोग विधेयक वह कानूनी दस्तावेज होता है जो सरकार को भारत की संचित निधि से धन निकालने और उसका उपयोग करने की अनुमति देता है। संसद से मंजूरी मिलने के बाद ही सरकार विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और योजनाओं के लिए धन खर्च कर सकती है।

कई बार ऐसा होता है कि किसी योजना, परियोजना या सरकारी कार्यक्रम पर अनुमान से अधिक राशि खर्च करनी पड़ जाती है। ऐसे अतिरिक्त व्यय को बाद में संसद की स्वीकृति दिलाने के लिए सरकार विनियोग विधेयक पेश करती है। संसद की मंजूरी मिलने के बाद ही उस अतिरिक्त खर्च को कानूनी वैधता प्राप्त होती है।

एक आसान उदाहरण से समझें

मान लीजिए किसी परिवार ने पूरे महीने का बजट 50 हजार रुपये तय किया। लेकिन महीने के दौरान किसी सदस्य की तबीयत खराब हो गई या घर में कोई जरूरी मरम्मत करनी पड़ गई, जिसके कारण कुल खर्च 55 हजार रुपये पहुंच गया।

अब परिवार के बाकी सदस्यों को यह बताया जाएगा कि अतिरिक्त 5 हजार रुपये किस कारण खर्च हुए। यदि सभी सदस्य सहमत हो जाएं, तो उस अतिरिक्त खर्च को स्वीकार कर लिया जाता है। सरकार के वित्तीय प्रबंधन में भी लगभग यही व्यवस्था लागू होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां परिवार की जगह संसद और सरकारी खजाने की भूमिका होती है।

अतिरिक्त खर्च की जांच कैसे होती है?

सरकार जब किसी मद पर स्वीकृत बजट से अधिक धन खर्च करती है, तो उस खर्च को सीधे स्वीकार नहीं कर लिया जाता। इसके लिए एक निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।

सबसे पहले भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) पूरे अतिरिक्त व्यय की जांच करते हैं। वे यह देखते हैं कि खर्च किन परिस्थितियों में हुआ और क्या वह नियमों के अनुरूप था।

इसके बाद यह मामला लोकसभा की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के पास जाता है। समिति अतिरिक्त खर्च का विस्तृत परीक्षण करती है और अपनी रिपोर्ट तैयार करती है। यदि समिति संतुष्ट होती है, तो सरकार संसद के समक्ष अतिरिक्त अनुदान की मांग रखती है। संसद द्वारा स्वीकृति मिलने के बाद विनियोग विधेयक पारित किया जाता है, जिससे अतिरिक्त व्यय पूरी तरह वैध माना जाता है।

हर साल बजट में कैसे तय होती है राशि?

केंद्र सरकार हर वित्तीय वर्ष की शुरुआत में आम बजट पेश करती है। इसमें रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सड़क, रेलवे और अन्य मंत्रालयों के लिए अलग-अलग धनराशि निर्धारित की जाती है।

संसद इन प्रस्तावों पर चर्चा करती है और मंजूरी देती है। इसके बाद संबंधित मंत्रालयों को निर्धारित सीमा के भीतर खर्च करने की अनुमति मिलती है। हालांकि कई बार प्राकृतिक आपदा, नई योजनाओं, महंगाई, आपात परिस्थितियों या अन्य प्रशासनिक जरूरतों के कारण अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ जाता है। ऐसे मामलों में बाद में संसद से औपचारिक स्वीकृति लेना आवश्यक होता है।

क्या होती है भारत की संचित निधि?

भारत सरकार की अधिकांश आय भारत की संचित निधि यानी Consolidated Fund of India में जमा होती है। इसमें करों से प्राप्त राशि, सरकारी ऋण, विभिन्न शुल्क और अन्य सरकारी प्राप्तियां शामिल होती हैं।

इसे केंद्र सरकार का सबसे बड़ा आधिकारिक कोष माना जाता है। संविधान के अनुच्छेद 266 के तहत इस निधि से कोई भी राशि संसद की अनुमति के बिना खर्च नहीं की जा सकती। यही कारण है कि सरकार को अतिरिक्त खर्च के लिए भी संसद की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है।

संसद में क्यों हुआ लगातार हंगामा?

मंगलवार को संसद की कार्यवाही सामान्य ढंग से नहीं चल सकी। विपक्षी दलों ने कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। संसद परिसर में भी विपक्षी सांसदों ने प्रदर्शन किया और विभिन्न मामलों पर सरकार से जवाब मांगा।

विपक्ष ने राम मंदिर चंदा मामले में कथित अनियमितताओं, संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई तथा कावेरी जल विवाद जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। इन मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बनने के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी।

लगातार व्यवधान के बावजूद सरकार ने अपने विधायी कार्यों को आगे बढ़ाया और आवश्यक विधेयकों को सदन के समक्ष रखा। कार्यवाही समाप्त होने के बाद लोकसभा की अगली बैठक बुधवार सुबह 11 बजे के लिए निर्धारित की गई।

पहले भी बिना चर्चा के पारित हुआ था एक विधेयक

मानसून सत्र के दौरान यह पहला अवसर नहीं है जब विरोध के बीच कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुआ हो। इससे पहले सोमवार को भी लोकसभा ने विपक्ष के विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने से संबंधित विधेयक को बिना विस्तृत चर्चा के पारित कर दिया था।

सरकार का कहना है कि संसद का समय सीमित होता है और महत्वपूर्ण विधायी कार्य समय पर पूरे करना आवश्यक है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि सरकार पर्याप्त चर्चा के बिना कानून पारित कर रही है।

भाजपा ने विपक्ष पर लगाए आरोप

भारतीय जनता पार्टी ने संसद में लगातार हो रहे व्यवधान के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी का आरोप है कि विपक्ष जानबूझकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहा है, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा प्रभावित हो रही है।

भाजपा नेताओं का कहना है कि संसद जनता की समस्याओं पर चर्चा और कानून बनाने का मंच है, लेकिन लगातार हंगामे के कारण कई अहम विषयों पर सार्थक बहस नहीं हो पा रही। पार्टी ने यह भी कहा कि विपक्ष के रवैये से जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा।

दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि जिन विषयों को वह उठा रहा है, वे सार्वजनिक महत्व के हैं और सरकार को उन पर जवाब देना चाहिए। इसी कारण सदन में गतिरोध लगातार बना हुआ है।

फिलहाल विनियोग (संख्या-3) विधेयक के पारित होने के साथ सरकार को 31 मार्च 2023 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में किए गए अतिरिक्त खर्च को संवैधानिक और कानूनी मंजूरी मिल गई है। इसके जरिए उस अतिरिक्त व्यय को भारत की संचित निधि से अधिकृत खर्च के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई है।

(Photo: AI Generated)