समुद्र के नीचे मौजूद है धरती का सबसे ऊंचा पर्वत! जानिए मौना केआ की हैरान कर देने वाली कहानी

समुद्र के नीचे मौजूद है धरती का सबसे ऊंचा पर्वत! जानिए मौना केआ की हैरान कर देने वाली कहानी

जब भी दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों की बात होती है, तो सबसे पहले माउंट एवरेस्ट का नाम सामने आता है। हिमालय की गोद में स्थित यह पर्वत अपनी विशाल ऊंचाई के कारण पूरी दुनिया में मशहूर है। बर्फ से ढकी इसकी चोटी को छूना आज भी पर्वतारोहियों के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पृथ्वी पर एक ऐसा पर्वत भी है, जिसका ज्यादातर हिस्सा समुद्र के पानी के नीचे छिपा हुआ है? इसकी खासियत जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

हमारी पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है। महासागरों की विशाल गहराइयों में ऐसी कई भौगोलिक संरचनाएं मौजूद हैं, जिनके बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी है। समुद्र के भीतर गहरी खाइयां, ज्वालामुखी, ऊंचे पर्वत और अनोखे जीवों की दुनिया बसी हुई है। इनमें से कुछ पर्वत इतने विशाल हैं कि उनकी ऊंचाई समुद्र तल से मापने पर दुनिया की सबसे ऊंची स्थलीय चोटियों को भी पीछे छोड़ देती है।

इसी रहस्यमयी दुनिया में स्थित है हवाई द्वीप समूह का मौना केआ। यह पर्वत अपनी अनोखी बनावट और समुद्र के नीचे छिपे विशाल हिस्से के कारण वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखता है। हालांकि, इसकी पूरी कहानी समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि किसी पर्वत की ऊंचाई किस स्थान से मापी जाती है।

समुद्र की गहराई में छिपा है मौना केआ का विशाल हिस्सा

प्रशांत महासागर में स्थित हवाई द्वीप समूह अपने ज्वालामुखियों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। इसी द्वीप समूह पर मौना केआ नाम का विशाल ज्वालामुखीय पर्वत मौजूद है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका काफी हिस्सा समुद्र की सतह के नीचे है। जमीन से देखने पर इसकी विशालता का पूरा अंदाजा लगाना मुश्किल है।

मौना केआ एक निष्क्रिय ज्वालामुखी है। इसका निर्माण लंबे समय तक समुद्र के भीतर ज्वालामुखीय गतिविधियों से निकले लावा के जमा होने के कारण हुआ। धीरे-धीरे लावा की परतें एक-दूसरे के ऊपर जमती गईं और एक विशाल पर्वत का आकार बन गया। समय के साथ इसका ऊपरी हिस्सा समुद्र की सतह से ऊपर निकल आया, जबकि इसका आधार आज भी पानी के भीतर मौजूद है।

यही वजह है कि मौना केआ को केवल जमीन से दिखाई देने वाली ऊंचाई के आधार पर नहीं समझा जा सकता। अगर इसकी चोटी से लेकर समुद्र की सतह तक की दूरी मापी जाए, तो इसकी ऊंचाई लगभग 4,207 मीटर है। लेकिन जब इसके समुद्र के भीतर डूबे आधार को भी गणना में शामिल किया जाता है, तो इसकी कुल ऊंचाई लगभग 10,000 मीटर से अधिक हो जाती है।

कुछ अनुमानों में समुद्र तल से इसकी चोटी तक की कुल ऊंचाई लगभग 10,200 मीटर बताई जाती है। इस तरह आधार से शिखर तक मापने पर मौना केआ की ऊंचाई माउंट एवरेस्ट से अधिक हो सकती है। हालांकि, दोनों पर्वतों की तुलना करते समय यह समझना जरूरी है कि एवरेस्ट की ऊंचाई समुद्र तल से मापी जाती है, जबकि मौना केआ की लगभग 10 किलोमीटर की ऊंचाई उसके समुद्र के नीचे स्थित आधार से चोटी तक की दूरी है।

आखिर माउंट एवरेस्ट और मौना केआ में क्या है अंतर?

माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 8,849 मीटर है। नेपाल और चीन की सीमा पर स्थित यह पर्वत हिमालय का हिस्सा है और अपनी कठिन चढ़ाई के लिए जाना जाता है।

दूसरी ओर, मौना केआ की खासियत उसकी समुद्र के नीचे से शुरू होने वाली संरचना है। इसका अधिकांश आधार प्रशांत महासागर में डूबा हुआ है। इसलिए अगर पर्वत की ऊंचाई उसके आधार से लेकर शिखर तक मापी जाए, तो मौना केआ एवरेस्ट से अधिक ऊंचा दिखाई देता है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए कि किसी इमारत का बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे बना हो और केवल कुछ मंजिलें बाहर दिखाई देती हों। अगर हम सिर्फ बाहर दिखाई देने वाले हिस्से की ऊंचाई मापेंगे, तो हमें इमारत के वास्तविक आकार का पता नहीं चलेगा। मौना केआ के मामले में भी कुछ ऐसा ही है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि मौना केआ समुद्र तल से ऊपर उठने के मामले में एवरेस्ट से ऊंचा है। दोनों की ऊंचाई मापने का आधार अलग है। इसलिए मौना केआ को आधार से शिखर तक मापने पर अधिक ऊंचा माना जाता है, जबकि समुद्र तल से ऊंचाई के मामले में माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है।

समुद्र के नीचे फैली है दुनिया की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला

समुद्र के भीतर केवल मौना केआ जैसा विशाल पर्वत ही नहीं है, बल्कि यहां एक ऐसी पर्वत श्रृंखला भी मौजूद है, जिसका विस्तार पृथ्वी के महासागरों में हजारों किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसे मिड-ओशन रिज यानी मध्य-महासागरीय पर्वत श्रृंखला कहा जाता है।

इस विशाल पर्वतीय तंत्र की कुल लंबाई लगभग 65,000 किलोमीटर मानी जाती है। यह दुनिया की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला है और इसका बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे स्थित है। इसकी तुलना में जमीन पर दिखाई देने वाली पर्वतमालाएं इसके विशाल विस्तार का केवल एक छोटा हिस्सा लगती हैं।

मिड-ओशन रिज कोई एक सीधी और समान ऊंचाई वाली पर्वत श्रृंखला नहीं है। इसमें कई पर्वतीय हिस्से, दरारें और ज्वालामुखीय संरचनाएं शामिल हैं। यह महासागरों के भीतर अलग-अलग क्षेत्रों से होकर गुजरती है और पृथ्वी की सतह के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस पर्वत श्रृंखला का निर्माण मुख्य रूप से टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों से जुड़ा है। पृथ्वी की बाहरी ठोस परत कई बड़ी और छोटी प्लेटों में बंटी हुई है। समुद्र के कुछ हिस्सों में ये प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिसकती हैं। जब ऐसा होता है, तो पृथ्वी के भीतर से गर्म पदार्थ ऊपर उठता है और दरारों के माध्यम से मैग्मा बाहर निकलता है।

यह मैग्मा ठंडा होकर ठोस चट्टानों में बदल जाता है। लंबे समय तक चलने वाली इस प्रक्रिया से समुद्र की सतह के नीचे नई भूपर्पटी बनती रहती है। इसी कारण मध्य-महासागरीय पर्वत श्रृंखला को समुद्र तल के भूवैज्ञानिक विकास के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

समुद्र के नीचे कैसे बनते हैं इतने विशाल पहाड़?

समुद्र के भीतर बनने वाले पहाड़ों को समझने के लिए ज्वालामुखीय गतिविधियों पर ध्यान देना जरूरी है। समुद्र के तल पर कई ऐसे स्थान हैं, जहां पृथ्वी के अंदर मौजूद गर्म मैग्मा बाहर निकलता है। जब यह पदार्थ ठंडा होकर जमता है, तो चट्टानों की नई परतें बनने लगती हैं।

अगर यह प्रक्रिया लंबे समय तक जारी रहती है, तो चट्टानों की परतें जमा होकर ऊंची संरचना बना सकती हैं। ऐसे कई पर्वत ज्वालामुखीय गतिविधियों से पैदा होते हैं। इनमें से जो पर्वत समुद्र की सतह तक नहीं पहुंच पाते और पानी के नीचे ही रहते हैं, उन्हें सीमाउंट यानी समुद्र के भीतर स्थित पर्वत कहा जाता है।

सीमाउंट अलग-अलग आकार और ऊंचाई के हो सकते हैं। कुछ समुद्र तल से थोड़ी ऊंचाई तक उठते हैं, जबकि कुछ हजारों मीटर तक ऊंचे होते हैं। इनमें से कई विलुप्त ज्वालामुखियों के अवशेष हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में आज भी ज्वालामुखीय गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।

ये पर्वत समुद्री पर्यावरण के लिए भी अहम हैं। समुद्र के तल पर मौजूद अपेक्षाकृत समतल क्षेत्रों के मुकाबले इनकी ढलान और ऊंचाई पानी के बहाव को प्रभावित कर सकती है। इनके आसपास पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आ सकता है, जिससे समुद्री जीवों को भोजन मिलता है।

इसी कारण कई सीमाउंट मछलियों, समुद्री अकशेरुकी जीवों और दूसरी प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास बन जाते हैं। हालांकि, हर समुद्री पर्वत पर एक जैसा पारिस्थितिकी तंत्र नहीं होता। वहां रहने वाले जीवों की प्रजातियां पानी की गहराई, तापमान, भोजन की उपलब्धता और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं।

सूरज की रोशनी के बिना भी पनपती है समुद्री जीवों की दुनिया

समुद्र की गहराइयों की सबसे हैरान करने वाली विशेषताओं में से एक वहां मौजूद जीवन है। आमतौर पर पृथ्वी पर जीवन को सूर्य की रोशनी से मिलने वाली ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण के जरिए भोजन बनाते हैं और समुद्री खाद्य श्रृंखला के बड़े हिस्से को ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।

लेकिन समुद्र के कुछ बेहद गहरे इलाकों में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती। इसके बावजूद वहां जीवों की विभिन्न प्रजातियां जीवित रहती हैं। इन क्षेत्रों में हाइड्रोथर्मल वेंट्स यानी समुद्र तल पर मौजूद गर्म पानी के स्रोत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ये स्रोत अक्सर उन स्थानों पर मिलते हैं, जहां समुद्र की सतह के नीचे भूवैज्ञानिक गतिविधियां सक्रिय होती हैं। समुद्र का पानी चट्टानों की दरारों से नीचे पहुंचता है, गर्म चट्टानों के संपर्क में आता है और फिर घुले हुए खनिजों तथा रासायनिक पदार्थों के साथ वापस बाहर निकलता है। कुछ वेंट्स से निकलने वाले पानी का तापमान काफी अधिक हो सकता है।

इन स्रोतों के आसपास ऐसे सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जो सूर्य की रोशनी पर निर्भर रहने के बजाय रासायनिक ऊर्जा का इस्तेमाल करके अपना भोजन तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया को केमोसिंथेसिस कहा जाता है। इन सूक्ष्मजीवों पर निर्भर रहते हुए कुछ अन्य जीव भी अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

हाइड्रोथर्मल वेंट्स के आसपास ट्यूब वर्म, कुछ प्रकार के झींगे, केकड़े और दूसरे अनुकूलित समुद्री जीव पाए जा सकते हैं। इनमें से कई प्रजातियों ने अत्यधिक दबाव, कम रोशनी और रासायनिक रूप से अलग वातावरण में जीवित रहने के लिए विशेष अनुकूलन विकसित किए हैं।

यह खोज वैज्ञानिकों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि जीवन के लिए जरूरी परिस्थितियां हमारी सामान्य समझ से कहीं अधिक विविध हो सकती हैं। हालांकि, इन जीवों का अस्तित्व विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है और सभी गहरे समुद्री इलाकों में ऐसे समुदाय मौजूद नहीं होते।

महासागरों की दुनिया के कई रहस्य अब भी अनसुलझे

इंसानों ने अंतरिक्ष की खोज में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन समुद्र की गहराइयों को समझना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। गहरे महासागरों में पानी का दबाव बहुत अधिक होता है। वहां रोशनी बेहद कम या बिल्कुल नहीं होती और कई स्थानों पर तापमान भी अत्यधिक ठंडा रहता है।

इन परिस्थितियों में समुद्र तल का अध्ययन करने के लिए विशेष उपकरणों, सोनार तकनीक, दूर से संचालित पनडुब्बियों और गहरे समुद्र में उतरने वाले यानों की जरूरत पड़ती है। इसके बावजूद महासागरों के कई हिस्सों का विस्तृत अध्ययन अभी बाकी है।

समुद्र के नीचे मौजूद पर्वतों और ज्वालामुखियों का अध्ययन केवल प्राकृतिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है। इससे वैज्ञानिकों को पृथ्वी की आंतरिक प्रक्रियाओं, समुद्री भूकंपों, ज्वालामुखीय गतिविधियों और नई भूपर्पटी के निर्माण को समझने में मदद मिलती है। साथ ही, समुद्री पर्वतों के आसपास मौजूद जीव-जंतुओं और उनके आवासों के बारे में भी नई जानकारियां मिलती हैं।

मौना केआ से लेकर मिड-ओशन रिज तक, समुद्र के भीतर फैली ये संरचनाएं बताती हैं कि पृथ्वी की सतह का बड़ा हिस्सा हमारी नजरों से छिपा हुआ है। जमीन पर दिखाई देने वाले पहाड़ इस ग्रह की भौगोलिक विविधता का केवल एक पहलू हैं। महासागरों की गहराइयों में मौजूद पर्वत, ज्वालामुखी और अनोखे जीव इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी पृथ्वी के बारे में जानने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

इसलिए अगली बार जब आप माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई के बारे में सुनें, तो मौना केआ को भी याद रखिएगा। समुद्र की सतह के नीचे छिपा यह विशाल पर्वत हमें याद दिलाता है कि किसी चीज का वास्तविक आकार हमेशा उतना नहीं होता, जितना हमें पहली नजर में दिखाई देता है।