चंडीगढ़ की सुखना लेक तक पानी पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण कांसल डाइवर्जन कैनाल को अब और मजबूत बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। करीब 3.4 किलोमीटर लंबी इस कैनाल के कुछ हिस्सों में मिट्टी के कटाव की समस्या सामने आने के बाद प्रशासन ने इसके संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया है। वेटलैंड अथॉरिटी ने कैनाल की विस्तृत इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय स्थिति का अध्ययन कराने को मंजूरी दे दी है। इस अध्ययन के आधार पर उन हिस्सों को चिन्हित किया जाएगा, जहां संरचनात्मक मजबूती बढ़ाने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।
कांसल डाइवर्जन कैनाल सुखना लेक के जल प्रबंधन तंत्र का अहम हिस्सा है। यह कैंबवाला एंट्री गेट से शुरू होकर नेपली की दिशा में साकेतड़ी पुल तक जाती है। आसपास के कैचमेंट क्षेत्रों से बारिश और अन्य स्रोतों से आने वाले पानी को सुखना लेक तक पहुंचाने में इस नहर की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में कैनाल के किसी हिस्से में नुकसान या पानी के प्रवाह में रुकावट का सीधा असर लेक तक पहुंचने वाले जल पर पड़ सकता है।
प्रशासन की ओर से कराए जाने वाले विस्तृत अध्ययन का उद्देश्य केवल मौजूदा नुकसान का आकलन करना नहीं होगा, बल्कि कैनाल की दीर्घकालिक स्थिरता का भी मूल्यांकन किया जाएगा। इंजीनियरिंग टीम यह देखेगी कि किन स्थानों पर मिट्टी ज्यादा कमजोर है, कहां पानी के बहाव के कारण कटाव हो रहा है और किन हिस्सों में भविष्य में बड़े नुकसान की आशंका हो सकती है। इसके साथ ही पर्यावरणीय दृष्टि से भी कैनाल के आसपास की स्थिति का अध्ययन किया जाएगा।
कैनाल में मिट्टी के कटाव की समस्या को लेकर इसलिए भी चिंता बढ़ी है क्योंकि लगातार होने वाला कटाव धीरे-धीरे किनारों की मजबूती को प्रभावित कर सकता है। यदि समय रहते संवेदनशील हिस्सों को स्थिर नहीं किया गया तो पानी के बहाव के साथ मिट्टी और गाद बहकर आगे जाने की संभावना बढ़ सकती है। इसका असर न केवल कैनाल के ढांचे पर पड़ सकता है, बल्कि सुखना लेक के जल तंत्र पर भी पड़ सकता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए वेटलैंड अथॉरिटी ने इंजीनियरिंग असेसमेंट कराने का फैसला किया है। यूटी इंजीनियरिंग विभाग की टीमें कैनाल का मौके पर जाकर निरीक्षण करेंगी। इस दौरान पूरी लंबाई का फील्ड असेसमेंट किया जाएगा और ऐसे स्थानों की पहचान की जाएगी जहां कटाव गंभीर है या भविष्य में संरचनात्मक समस्या पैदा हो सकती है।
अधिकारियों के अनुसार, इंजीनियरिंग अध्ययन को नवंबर 2026 तक पूरा करने की समयसीमा तय की गई है। रिपोर्ट तैयार होने के बाद कैनाल के प्रत्येक संवेदनशील हिस्से के लिए आवश्यक संरक्षण उपायों की रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसके आधार पर काम को प्राथमिकता के अनुसार चरणों में बांटा जाएगा, ताकि सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सों को पहले सुरक्षित किया जा सके।
संभावित उपायों में कैनाल की ग्रेडिंग, रिवेटमेंट और अन्य सुरक्षात्मक संरचनाओं का निर्माण शामिल हो सकता है। जहां जरूरत होगी, वहां मिट्टी को स्थिर करने के लिए विशेष तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा सॉइल और मॉइश्चर कंजर्वेशन से जुड़े उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। इनका उद्देश्य केवल मौजूदा कटाव को रोकना नहीं, बल्कि भविष्य में बारिश और पानी के तेज बहाव के कारण होने वाले नुकसान को भी कम करना होगा।
कैनाल के संरक्षण का काम एक साथ पूरी लंबाई में करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से किए जाने की योजना है। इंजीनियरिंग रिपोर्ट में सामने आने वाली प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग हिस्सों में काम किया जाएगा। प्रशासन का लक्ष्य है कि संरक्षण और स्टेबलाइजेशन से जुड़े कार्य अगले दो वर्षों के भीतर पूरे कर लिए जाएं।
कांसल डाइवर्जन कैनाल की अहमियत को समझने के लिए सुखना लेक के जल स्रोत और कैचमेंट सिस्टम को देखना जरूरी है। सुखना लेक का जलस्तर काफी हद तक आसपास के कैचमेंट क्षेत्र में होने वाली वर्षा और उससे आने वाले पानी पर निर्भर करता है। ऐसे में पानी को सही दिशा में ले जाने वाली नहरों और जल निकासी संरचनाओं का सुरक्षित रहना जरूरी है।
कांसल कैनाल आसपास के क्षेत्र से आने वाले पानी को लेक की ओर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि कैनाल के किनारे कमजोर होते हैं या पानी का प्रवाह प्रभावित होता है तो जल संचरण की क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसलिए कैनाल का संरक्षण सुखना लेक के व्यापक जल प्रबंधन और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
मिट्टी के कटाव से जुड़ी एक और चिंता गाद के लेक तक पहुंचने की है। पानी के साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी बहकर आने पर जलाशय में सिल्ट जमा हो सकती है। लंबे समय में इससे लेक की जलधारण क्षमता प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसके अलावा अधिक गाद जलीय पारिस्थितिकी और पानी की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। कैनाल के संवेदनशील हिस्सों को मजबूत करने से इस तरह के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
प्रशासन की योजना में इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय पहलुओं को साथ लेकर चलने पर जोर दिया गया है। इसका कारण यह है कि कैनाल केवल एक निर्माण संरचना नहीं, बल्कि सुखना लेक से जुड़े संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। इसलिए मरम्मत या मजबूती के दौरान ऐसे उपायों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनसे प्राकृतिक जल प्रवाह और आसपास के पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
अध्ययन के दौरान कैनाल के किनारों की स्थिति, पानी के बहाव, मिट्टी की प्रकृति और कटाव वाले हिस्सों का तकनीकी मूल्यांकन किया जा सकता है। इसके आधार पर यह तय होगा कि किस स्थान पर किस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है। जहां सामान्य स्तर के कटाव की समस्या होगी, वहां उपयुक्त मिट्टी संरक्षण उपाय किए जा सकते हैं, जबकि अधिक संवेदनशील स्थानों पर स्थायी सुरक्षात्मक ढांचे तैयार किए जा सकते हैं।
प्रशासन का मानना है कि समय रहते कैनाल का संरक्षण करना भविष्य में होने वाले बड़े खर्च और नुकसान से बचने का बेहतर तरीका है। यदि छोटे स्तर पर सामने आई समस्याओं को अभी दूर कर दिया जाता है तो कैनाल की संरचनात्मक मजबूती लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे सुखना लेक तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी अधिक भरोसेमंद बनी रहेगी।
आगामी दो वर्षों में होने वाले संरक्षण कार्यों के दौरान कैनाल के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति के अनुसार प्राथमिकताएं तय की जाएंगी। पहले उन क्षेत्रों पर काम किया जाएगा जहां कटाव सबसे ज्यादा है या जहां पानी के बहाव से संरचना को तत्काल खतरा हो सकता है। इसके बाद अपेक्षाकृत कम प्रभावित हिस्सों को मजबूत करने का काम किया जाएगा।
कांसल डाइवर्जन कैनाल का संरक्षण चंडीगढ़ के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुखना लेक शहर की प्रमुख पर्यावरणीय और प्राकृतिक धरोहरों में शामिल है। लेक का जलस्तर, आसपास का वेटलैंड और इससे जुड़ा जैव विविधता तंत्र शहर के पर्यावरणीय संतुलन में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में लेक तक पानी पहुंचाने वाले प्राकृतिक और कृत्रिम जल मार्गों का रखरखाव जरूरी है।
कैनाल की वैज्ञानिक जांच और प्रस्तावित संरक्षण कार्यों से प्रशासन को भविष्य के लिए भी बेहतर प्रबंधन योजना तैयार करने में मदद मिल सकती है। नियमित निगरानी, समय पर मरम्मत और संवेदनशील हिस्सों की पहचान के जरिए कैनाल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे अचानक होने वाले कटाव या जल प्रवाह में बाधा जैसी समस्याओं को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित करने की संभावना बढ़ेगी।
फिलहाल नवंबर 2026 तक इंजीनियरिंग असेसमेंट पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद तैयार रिपोर्ट के आधार पर स्टेबलाइजेशन और कंजर्वेशन के कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा। अगले दो वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कैनाल को मजबूत करने की योजना है।
कुल मिलाकर, कांसल डाइवर्जन कैनाल की प्रस्तावित इंजीनियरिंग और इकोलॉजिकल स्टडी सुखना लेक के संरक्षण की व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कैनाल के कमजोर हिस्सों की पहचान, मिट्टी के कटाव पर नियंत्रण और आवश्यक सुरक्षात्मक ढांचे तैयार करने से जल प्रवाह को अधिक सुरक्षित बनाए रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही कैनाल के माध्यम से लेक में पहुंचने वाली मिट्टी और गाद की मात्रा को नियंत्रित करने में भी फायदा होगा। प्रशासन का प्रयास है कि तकनीकी विशेषज्ञता और पर्यावरणीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कैनाल का ऐसा संरक्षण किया जाए, जिससे सुखना लेक का जल तंत्र और पारिस्थितिक संतुलन लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।




