चंडीगढ़ में बढ़ती महंगाई और घरेलू बजट पर बढ़ते दबाव के बीच बिजली और पानी की कीमतों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शहर के सांसद मनीष तिवारी ने यूटी प्रशासक गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए हर महीने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली और 20 हजार लीटर तक मुफ्त पानी उपलब्ध कराने की मांग की है। सांसद का कहना है कि महंगाई के मौजूदा दौर में बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर राहत मिलने से कम और मध्यम आय वाले परिवारों को आर्थिक सहारा मिल सकता है।
सांसद की ओर से प्रशासक को भेजा गया पत्र करीब चार पन्नों का बताया जा रहा है। इसमें उन्होंने शहर की आर्थिक स्थिति, प्रशासन के बजट और बिजली वितरण व्यवस्था से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख करते हुए मुफ्त बिजली और पानी की योजना पर विचार करने की अपील की है। उनका तर्क है कि यदि योजना को केवल जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तक सीमित रखा जाए तो प्रशासन पर पड़ने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ नियंत्रित किया जा सकता है।
महंगाई के बीच राहत देने की मांग
मनीष तिवारी ने अपने पत्र में कहा कि पिछले कुछ समय से रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ने के कारण आम परिवारों के घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा है। भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और आवास से जुड़े खर्चों के बीच बिजली और पानी के बिल भी परिवारों की मासिक आय का एक हिस्सा लेते हैं।
ऐसे में सांसद ने सुझाव दिया है कि प्रशासन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए एक लक्षित राहत योजना तैयार कर सकता है। इसके तहत पात्र परिवारों को हर महीने 300 यूनिट तक बिजली और 20 हजार लीटर तक पानी मुफ्त उपलब्ध कराने का प्रावधान किया जा सकता है।
उनका मानना है कि इस तरह की योजना को सभी उपभोक्ताओं पर लागू करने के बजाय आय सीमा या अन्य पात्रता मानदंडों से जोड़ा जा सकता है। इससे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल उन परिवारों के लिए किया जा सकेगा जिन्हें वास्तव में आर्थिक सहायता की जरूरत है।
बिजली क्षेत्र के बजट में कमी का दिया हवाला
सांसद ने अपने प्रस्ताव के समर्थन में चंडीगढ़ प्रशासन के वित्तीय आंकड़ों का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण के बाद प्रशासन पर बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़े खर्च का दबाव पहले की तुलना में कम हुआ है।
पत्र में दावा किया गया है कि वित्त वर्ष 2024-25 में बिजली एवं नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र पर करीब 1,027.87 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज किया गया था। वहीं वर्ष 2026-27 के अनुमानित बजट में इस क्षेत्र के लिए करीब 171.86 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।
मनीष तिवारी का तर्क है कि दोनों आंकड़ों के बीच दिखाई देने वाले अंतर को देखते हुए प्रशासन के पास जनकल्याण से जुड़ी किसी लक्षित योजना पर विचार करने की गुंजाइश हो सकती है। उन्होंने सुझाव दिया है कि सरकार वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता का आकलन करते हुए बिजली सब्सिडी के लिए अलग प्रावधान कर सकती है।
हालांकि, बजट में किसी क्षेत्र के लिए कम प्रावधान होने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि उतनी ही राशि सीधे बचत के रूप में उपलब्ध हो। इसलिए प्रस्ताव को लागू करने से पहले प्रशासन को वास्तविक राजस्व, व्यय, बिजली खरीद लागत और भविष्य की वित्तीय देनदारियों का विस्तृत आकलन करना होगा।
सितंबर या अक्टूबर में अतिरिक्त बजट की व्यवस्था का सुझाव
सांसद ने अपने पत्र में यह भी सुझाव दिया है कि यदि प्रशासन योजना को लागू करने का निर्णय लेता है तो सितंबर या अक्टूबर 2026 के दौरान सप्लीमेंट्री ग्रांट के जरिए अतिरिक्त वित्तीय व्यवस्था की जा सकती है।
उनके अनुसार इस योजना के लिए करीब 856 करोड़ रुपये से 1,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त प्रावधान किया जा सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि प्रशासन यदि आवश्यक वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी कर ले तो योजना को जुलाई 2026 से लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, किसी भी मुफ्त बिजली योजना को लागू करने के लिए केवल बजट उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पात्र परिवारों की पहचान, सब्सिडी की सीमा, मीटरिंग व्यवस्था, बिलिंग प्रक्रिया और योजना के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाने की जरूरत होगी।
मुफ्त पानी को लेकर भी उठी मांग
बिजली के साथ-साथ सांसद ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को हर महीने 20 हजार लीटर तक मुफ्त पानी देने की मांग भी रखी है। उन्होंने अपने पत्र में चंडीगढ़ नगर निगम के पुराने प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा कि मुफ्त पानी का मुद्दा पहले भी सदन में उठ चुका है।
तिवारी के अनुसार 11 मार्च 2024 को नगर निगम के जनरल हाउस में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के पार्षदों ने मुफ्त पानी उपलब्ध कराने से संबंधित प्रस्ताव पारित किया था। हालांकि बाद में इस प्रस्ताव को प्रशासन की ओर से मंजूरी नहीं मिली। सांसद का कहना है कि इसके बाद भी निगम स्तर पर दोबारा प्रस्ताव पारित किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस विषय को लेकर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन मौजूद है।
सांसद ने प्रशासन से इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि योजना को केवल एक निश्चित आय सीमा से नीचे रहने वाले परिवारों तक सीमित रखा जाए तो इसका वित्तीय भार काफी कम किया जा सकता है।
20 हजार रुपये से कम मासिक आय वाले परिवारों पर फोकस
मनीष तिवारी ने मुफ्त पानी की सुविधा के लिए एक लक्षित मॉडल का सुझाव दिया है। उनके अनुसार यदि केवल उन परिवारों को योजना में शामिल किया जाए जिनकी मासिक आय 20 हजार रुपये से कम है, तो प्रशासन पर अतिरिक्त वित्तीय भार सीमित रह सकता है।
उन्होंने अनुमान जताया कि ऐसी व्यवस्था लागू करने पर सालाना करीब 15 से 20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च हो सकता है। उनका तर्क है कि यह राशि प्रशासन के कुल बजट की तुलना में बहुत बड़ी नहीं है और जरूरतमंद परिवारों को राहत देने के उद्देश्य से इसे वहन किया जा सकता है।
हालांकि, योजना की वास्तविक लागत लाभार्थियों की संख्या, पानी की खपत, मौजूदा टैरिफ और नगर निगम की परिचालन लागत पर निर्भर करेगी। इसलिए अंतिम निर्णय से पहले विस्तृत वित्तीय अध्ययन और पात्र परिवारों की सही संख्या का आकलन महत्वपूर्ण होगा।
मनीमाजरा की 24×7 जल परियोजना पर भी सवाल
सांसद ने मनीमाजरा की 24×7 जल आपूर्ति परियोजना का मुद्दा भी अपने पत्र में उठाया है। उन्होंने परियोजना पर खर्च और इसके अपेक्षित परिणामों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
उनके अनुसार इस परियोजना पर करीब 166 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन इसके बावजूद जल आपूर्ति व्यवस्था से जुड़े सभी लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सका। उन्होंने परियोजना की कार्यप्रणाली और खर्च की समीक्षा की जरूरत बताई है।
मनीमाजरा की जल परियोजना से जुड़े वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं को लेकर सीएजी ऑडिट का भी उल्लेख किया गया है। सांसद ने जल प्रबंधन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने, पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत करने और पानी के रिसाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।
पानी की पाइपलाइन में रिसाव बड़ी चुनौती
चंडीगढ़ में मुफ्त पानी की योजना को लेकर सबसे बड़ी चुनौती जल आपूर्ति व्यवस्था की मौजूदा वित्तीय स्थिति को माना जा रहा है। प्रशासन और नगर निगम से जुड़े अधिकारियों की ओर से पहले भी पानी की सप्लाई में होने वाले वित्तीय नुकसान का मुद्दा उठाया जाता रहा है।
जानकारी के अनुसार नगर निगम को पानी की आपूर्ति से हर साल करीब 100 करोड़ रुपये के नुकसान का सामना करना पड़ता है। पुरानी पाइपलाइन, लीकेज और पानी की बर्बादी को इस नुकसान की प्रमुख वजहों में शामिल किया जाता है।
बताया जाता है कि शहर की जल वितरण प्रणाली में करीब 30 प्रतिशत तक पानी रिसाव या अन्य कारणों से बर्बाद हो जाता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि पानी को मुफ्त करने के साथ-साथ जल नेटवर्क को मजबूत करना और लीकेज कम करना भी जरूरी होगा।
यदि पानी की बर्बादी को नियंत्रित नहीं किया गया तो मुफ्त पानी की योजना का वित्तीय भार भविष्य में बढ़ सकता है। इसलिए एक तरफ जहां जरूरतमंद परिवारों को राहत देने की मांग की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ जल संरक्षण और बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
प्रशासन के सामने वित्तीय संतुलन की चुनौती
मुफ्त बिजली और पानी की योजना को लागू करने की मांग के बाद प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संतुलन बनाए रखने की होगी। किसी भी सब्सिडी योजना का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचाने के लिए सरकार को इसके लिए स्थायी वित्तीय स्रोत सुनिश्चित करना पड़ता है।
बिजली के मामले में सब्सिडी का खर्च बिजली वितरण कंपनी और प्रशासन के बीच किस व्यवस्था के तहत वहन किया जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण सवाल होगा। इसी तरह पानी की सुविधा के लिए नगर निगम की आय, जल उत्पादन लागत और वितरण खर्च को ध्यान में रखना होगा।
यदि योजना को आय सीमा के आधार पर लागू किया जाता है तो पात्र परिवारों की पहचान के लिए आय प्रमाण, संपत्ति रिकॉर्ड या अन्य सरकारी डेटाबेस का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि सब्सिडी वास्तविक जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे।
मुफ्त सुविधाओं पर राजनीतिक बहस भी तेज
चंडीगढ़ में मुफ्त बिजली और पानी की मांग केवल आर्थिक राहत का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। देश के कई राज्यों में मुफ्त बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी योजनाएं पहले से राजनीतिक बहस का हिस्सा रही हैं।
सांसद मनीष तिवारी की मांग के बाद चंडीगढ़ में भी यह चर्चा तेज हो गई है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राहत देने के लिए किस तरह की सब्सिडी व्यवस्था बनाई जा सकती है। समर्थकों का कहना है कि बुनियादी सेवाओं पर राहत से कम आय वाले परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा, जबकि आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि ऐसी योजनाओं की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
अब प्रशासन के फैसले पर नजर
मनीष तिवारी की मांग के बाद अब निगाहें यूटी प्रशासन के अगले कदम पर हैं। प्रशासन को यह तय करना होगा कि 300 यूनिट मुफ्त बिजली और 20 हजार लीटर मुफ्त पानी की मांग को किस रूप में लागू किया जा सकता है या इसके लिए कोई वैकल्पिक राहत मॉडल तैयार किया जा सकता है।
फिलहाल यह प्रस्ताव राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत देने की मांग है, वहीं दूसरी ओर बिजली सब्सिडी की संभावित लागत, नगर निगम की जल आपूर्ति व्यवस्था में वित्तीय घाटा, पाइपलाइन लीकेज और भविष्य के बजट पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दों पर भी विचार करना होगा।


