सुपर-डुपर अल-नीनो से बदल सकता है दुनिया का मौसम: भारत में कमजोर बारिश और सूखे का बढ़ सकता है खतरा, जानें WMO का अनुमान

सुपर-डुपर अल-नीनो से बदल सकता है दुनिया का मौसम: भारत में कमजोर बारिश और सूखे का बढ़ सकता है खतरा, जानें WMO का अनुमान

दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाली एक बड़ी प्राकृतिक घटना को लेकर वैज्ञानिकों की नजरें प्रशांत महासागर पर टिकी हुई हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा मौसमी अनुमान ने इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज कर दी है। आशंका जताई जा रही है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के बीच भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच सकता है। इसी संभावित तीव्रता के कारण इसे कई जगह सुपर-डुपर अल-नीनो कहा जा रहा है। अनुमान है कि यह स्थिति दिसंबर के आसपास अपने चरम पर पहुंच सकती है और इसके प्रभाव फरवरी 2027 तक बने रह सकते हैं।

इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि अल-नीनो का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता। समुद्र के तापमान में होने वाला बदलाव वातावरण में हवाओं की दिशा, बादलों के निर्माण और बारिश के वितरण को प्रभावित कर सकता है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों में अलग-अलग रूप में दिखाई दे सकता है। कहीं सामान्य से ज्यादा वर्षा होने की संभावना बनती है, तो कहीं सूखे और पानी की कमी का जोखिम बढ़ सकता है। भारत के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां कृषि, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है।

क्या होता है अल-नीनो और कैसे बदलता है मौसम?

अल-नीनो को समझने के लिए प्रशांत महासागर में चलने वाली हवाओं और समुद्र के पानी के सामान्य व्यवहार को जानना जरूरी है। भूमध्य रेखा के आसपास सामान्य परिस्थितियों में पूर्व से पश्चिम की तरफ चलने वाली व्यापारिक हवाएं समुद्र के गर्म सतही पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। दूसरी ओर, दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास समुद्र की गहराई से अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। इस व्यवस्था के कारण प्रशांत महासागर के अलग-अलग हिस्सों में तापमान का एक सामान्य संतुलन बना रहता है।

लेकिन जब व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ने लगती हैं, तब समुद्र की यह व्यवस्था बदल जाती है। पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी मध्य और पूर्वी प्रशांत की ओर फैलने लगता है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर से ऊपर चला जाता है। इसी बदलाव को अल-नीनो कहा जाता है। समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली इस प्रक्रिया का असर दूर-दराज के क्षेत्रों में भी पड़ सकता है।

अल-नीनो के दौरान बारिश लाने वाली हवाओं और बादलों के बनने का स्थान बदल सकता है। इससे कुछ इलाकों में वर्षा का वितरण प्रभावित होता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं। हालांकि, इसका असर हर साल और हर देश में एक जैसा नहीं होता। स्थानीय मौसम प्रणालियां और दूसरे महासागरों की स्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सुपर-डुपर अल-नीनो कितना गंभीर हो सकता है?

अल-नीनो की ताकत को लेकर सुपर और सुपर-डुपर जैसे शब्द इन दिनों सुर्खियों में हैं। हालांकि, यह स्पष्ट रहना चाहिए कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन इन नामों को अल-नीनो की अलग आधिकारिक श्रेणियों के रूप में इस्तेमाल नहीं करता। वैज्ञानिक आमतौर पर समुद्र की सतह के तापमान में सामान्य से अंतर और उससे जुड़े अन्य जलवायु संकेतकों के आधार पर इस घटना की तीव्रता का आकलन करते हैं। इसके लिए कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत जैसे वर्गों का उपयोग किया जा सकता है।

सुपर-डुपर अल-नीनो का इस्तेमाल मुख्य रूप से किसी संभावित बेहद शक्तिशाली घटना का वर्णन करने के लिए किया जा रहा है। इसलिए इस शब्द को अपने आप में किसी औपचारिक आपदा चेतावनी के रूप में नहीं देखना चाहिए। फिर भी, यदि प्रशांत महासागर का तापमान अनुमान के मुताबिक बहुत ऊंचा पहुंचता है, तो दुनिया के कई हिस्सों में मौसमी परिस्थितियों पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के 8 अक्टूबर 2026 के अपडेट के अनुसार, मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में अक्टूबर-दिसंबर के दौरान तापमान में असाधारण वृद्धि की संभावना जताई गई है। इस अवधि के लिए समुद्र की सतह के तापमान का सामान्य से अंतर लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान बताया गया है। यह एक खास समुद्री क्षेत्र और निर्धारित अवधि से जुड़ा मौसमी अनुमान है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पूरी दुनिया के समुद्र या जमीन का तापमान 3.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।

किन इलाकों में ज्यादा बारिश की आशंका है?

अल-नीनो का प्रभाव दुनिया भर में एक जैसा नहीं होता। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मौसमी संकेतों के मुताबिक, मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में सामान्य से ज्यादा वर्षा की संभावना हो सकती है। इसके अलावा अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र, मध्य एशिया के कुछ हिस्सों, पूर्वी एशिया के तटीय क्षेत्रों, अरब प्रायद्वीप के उत्तरी भागों और दक्षिण-पूर्वी दक्षिण अमेरिका के कुछ इलाकों में भी अधिक बारिश के संकेत दिए गए हैं।

हालांकि, ज्यादा बारिश की संभावना को सीधे बाढ़ की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। बाढ़ का खतरा इस बात पर भी निर्भर करता है कि बारिश कितनी तीव्र होती है, कितने समय तक जारी रहती है और संबंधित इलाके की जमीन पानी सोखने में कितनी सक्षम है। नदियों का जलस्तर, जल निकासी की व्यवस्था और स्थानीय मौसम प्रणालियां भी नुकसान की गंभीरता तय करती हैं।

जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है, वहां जरूरत से ज्यादा पानी खेती, सड़क परिवहन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर सकता है। पहाड़ी इलाकों में कुछ परिस्थितियों में भूस्खलन का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए संबंधित देशों के मौसम विभागों के स्थानीय पूर्वानुमान और चेतावनियां महत्वपूर्ण रहेंगी।

कहां सूखे और पानी की कमी का खतरा बढ़ सकता है?

जहां कुछ क्षेत्रों में बारिश बढ़ने के संकेत हैं, वहीं दूसरी जगहों पर सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। WMO के मौसमी अनुमान के अनुसार, पश्चिमी प्रशांत और भूमध्यरेखीय अटलांटिक के बड़े हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। दक्षिण प्रशांत से लेकर दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी छोर तक भी कुछ क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियों की आशंका है।

भारतीय उपमहाद्वीप, मध्य अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, कैरेबियन के कुछ क्षेत्रों और उत्तर-पश्चिमी दक्षिण अमेरिका में भी सामान्य से कम बारिश के संकेत बताए गए हैं। अगर लंबे समय तक वर्षा में कमी बनी रहती है, तो इसका प्रभाव खेतों की नमी, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और पेयजल आपूर्ति पर पड़ सकता है। बिजली उत्पादन पर भी असर संभव है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जलाशयों और नदियों से मिलने वाला पानी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हालांकि, मौसमी पूर्वानुमान किसी खास शहर, जिले या गांव के लिए अंतिम फैसला नहीं होते। ये बड़े क्षेत्रों में मौसम की संभावित दिशा बताते हैं। किसी स्थान पर वास्तव में कितनी बारिश होगी, इसका बेहतर अनुमान समय के साथ जारी होने वाले क्षेत्रीय पूर्वानुमानों से मिलता है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह जलवायु घटनाक्रम?

भारत में अल-नीनो की चर्चा होते ही मानसून पर उसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगते हैं। इसकी वजह यह है कि अल-नीनो की कई घटनाओं के दौरान भारतीय मानसून कमजोर रहने की स्थिति देखी गई है। प्रशांत महासागर के गर्म होने से वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आ सकता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में बारिश की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है।

यदि भारत में वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो इसका असर खरीफ फसलों की बुवाई, फसल की बढ़त और सिंचाई की जरूरतों पर पड़ सकता है। धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों के लिए पर्याप्त पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। बारिश में कमी लंबे समय तक बनी रहने पर किसानों की लागत बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।

जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से पेयजल आपूर्ति और सिंचाई प्रबंधन पर दबाव बढ़ सकता है। जिन इलाकों में खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर करती है, वहां स्थिति पर विशेष नजर रखने की जरूरत होगी। गर्म और शुष्क मौसम के दौरान पानी की मांग भी बढ़ सकती है।

फिर भी, अल-नीनो को भारत में कमजोर मानसून की गारंटी मानना सही नहीं होगा। हर अल-नीनो वर्ष में भारतीय मानसून का व्यवहार एक जैसा नहीं रहता। हिंद महासागर का डाइपोल, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां तथा दूसरे क्षेत्रीय कारक भी वर्षा की मात्रा और वितरण को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी खास राज्य या जिले में सूखे की स्थिति का निष्कर्ष केवल अल-नीनो के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।

अल-नीनो और ला-नीना में क्या अंतर है?

अल-नीनो और ला-नीना एक ही प्राकृतिक जलवायु प्रणाली की विपरीत अवस्थाएं हैं। अल-नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत का पानी सामान्य से अधिक गर्म होता है। इसके उलट, ला-नीना की स्थिति में इसी क्षेत्र का समुद्री पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है और व्यापारिक हवाएं आम तौर पर मजबूत होती हैं।

इन दोनों घटनाओं का असर दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है, लेकिन यह प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप लेता है। ला-नीना का अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया में ठंड बढ़ जाएगी। इसी तरह अल-नीनो के कारण हर जगह गर्मी या सूखा पड़ना भी जरूरी नहीं है। इनका वास्तविक प्रभाव घटना की तीव्रता, अवधि, मौसम और अन्य जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

क्या WMO की चेतावनी का मतलब बड़ी आपदा आने वाली है?

WMO के मौसमी अनुमान को किसी निश्चित तारीख पर होने वाली आपदा की घोषणा समझना गलत होगा। इसका उद्देश्य आने वाले महीनों में संभावित जलवायु परिस्थितियों के बारे में पहले से जानकारी देना है, ताकि सरकारें, मौसम विभाग, किसान और आपदा प्रबंधन एजेंसियां तैयारी कर सकें।

पूर्वानुमान में अनिश्चितता बनी रहती है। समुद्र और वातावरण के व्यवहार में बदलाव, दूसरे जलवायु संकेत और स्थानीय परिस्थितियां वास्तविक मौसम को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए आने वाले महीनों में जारी होने वाले नए अपडेट पर नजर रखना जरूरी होगा।

भारत में किसानों को फसल और सिंचाई से जुड़े फैसले स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार लेने चाहिए। आम लोगों को गर्मी के दौरान पर्याप्त पानी पीने, धूप से बचने और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां अपनाने पर ध्यान देना चाहिए। बारिश या बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में प्रशासन की ओर से जारी निर्देशों का पालन करना भी महत्वपूर्ण है।

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का औसत तापमान पहले से बढ़ रहा है। ऐसे में अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाएं कुछ परिस्थितियों में गर्मी और मौसम संबंधी जोखिमों को और गंभीर बना सकती हैं। लेकिन किसी एक घटना को हर मौसमी बदलाव का अकेला कारण मानना उचित नहीं होगा।

कुल मिलाकर, संभावित सुपर-डुपर अल-नीनो दुनिया के मौसम के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, लेकिन इसके वास्तविक प्रभावों का आकलन लगातार मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों से ही किया जा सकेगा। भारत के लिए फिलहाल सबसे जरूरी है कि मानसून, जल उपलब्धता और स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखी जाए।

(Photo : AI Generated)