पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इन दिनों एक बार फिर असंतोष की आवाजें तेज हो गई हैं। रावलकोट समेत कई इलाकों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है, आर्थिक संसाधनों का लाभ नहीं मिल रहा और उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। ईदगाह मैदान में हुए एक बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पाकिस्तान सरकार की नीतियों पर खुलकर नाराजगी जताई। कुछ प्रदर्शनकारियों ने यह तक कहा कि यदि उनके अधिकारों की अनदेखी जारी रही तो वे भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने की मांग भी उठा सकते हैं।
इन विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर उस इतिहास को चर्चा में ला दिया है कि आखिर पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर अस्तित्व में कैसे आया और 1947 के बाद ऐसी कौन-सी घटनाएं हुईं, जिनके कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा भारत से अलग होकर पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया।
आजादी के समय जम्मू-कश्मीर की स्थिति क्या थी?
15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र देशों के रूप में अस्तित्व में आए। उस समय देशभर में मौजूद रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ विलय करें। जम्मू-कश्मीर भी ऐसी ही एक बड़ी रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे।
महाराजा हरि सिंह तत्काल किसी भी देश के साथ विलय करने के पक्ष में नहीं थे। उनका उद्देश्य था कि जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत के रूप में अपनी पहचान बनाए रखे। इसी वजह से उन्होंने शुरुआत में भारत और पाकिस्तान दोनों से कुछ दूरी बनाए रखने की नीति अपनाई।
पाकिस्तान ने बदली रणनीति
महाराजा हरि सिंह के इस फैसले से पाकिस्तान संतुष्ट नहीं था। उसका मानना था कि मुस्लिम बहुल आबादी वाले जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। जब बातचीत से बात नहीं बनी तो पाकिस्तान ने सैन्य रणनीति अपनाई।
22 अक्टूबर 1947 को बड़ी संख्या में हथियारबंद कबायली लड़ाके जम्मू-कश्मीर में घुस आए। भारतीय इतिहासकारों के अनुसार इन कबायलियों को पाकिस्तान की ओर से समर्थन, हथियार और रसद उपलब्ध कराई गई थी। इन हमलावरों ने सीमावर्ती इलाकों में भारी हिंसा और लूटपाट मचाई तथा तेजी से श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे।
संकट के बीच भारत से मांगी गई मदद
कबायली हमलावरों के तेजी से आगे बढ़ने के कारण जम्मू-कश्मीर की स्थिति बेहद गंभीर हो गई। महाराजा हरि सिंह की सेना इस हमले को रोकने में सक्षम नहीं थी। ऐसे हालात में उन्होंने भारत सरकार से सैन्य सहायता की मांग की।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले जम्मू-कश्मीर का कानूनी रूप से भारत में विलय आवश्यक होगा। इसके बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज यानी इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए। इस कानूनी प्रक्रिया के पूरा होने के बाद भारतीय सेना को जम्मू-कश्मीर भेजा गया।
भारतीय सेना ने संभाला मोर्चा
अक्टूबर 1947 के अंतिम सप्ताह में भारतीय सैनिक श्रीनगर पहुंचे और उन्होंने कबायली हमलावरों के खिलाफ अभियान शुरू किया। सेना ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सुरक्षित किया और हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया।
हालांकि, युद्ध लगातार फैलता गया और इसमें पाकिस्तान की भूमिका भी खुलकर सामने आने लगी। संघर्ष केवल कबायली हमले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव का रूप लेने लगा।
संयुक्त राष्ट्र तक कैसे पहुंचा मामला?
युद्ध लंबा खिंचने लगा तो भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस विवाद को उठाने का फैसला किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1 जनवरी 1948 को जम्मू-कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में भेजा।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर कई दौर की चर्चा हुई। 1948 के दौरान सुरक्षा परिषद ने अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए, जिनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच संघर्ष रोकना और विवाद का शांतिपूर्ण समाधान तलाशना था।
इन प्रस्तावों में युद्धविराम, शांति व्यवस्था कायम करने और भविष्य में जनमत संग्रह की संभावना जैसी बातें शामिल थीं।
जनमत संग्रह को लेकर क्या थी शर्त?
संयुक्त राष्ट्र ने जनमत संग्रह का सुझाव जरूर दिया, लेकिन इसके साथ स्पष्ट शर्तें भी रखीं। सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि पाकिस्तान उन सभी कबायली लड़ाकों और अपनी सैन्य मौजूदगी को जम्मू-कश्मीर के कब्जे वाले हिस्से से पूरी तरह हटाए।
इसके बाद भारत को भी अपनी सैन्य उपस्थिति न्यूनतम स्तर तक लानी थी, ताकि निष्पक्ष माहौल में जनमत संग्रह कराया जा सके।
भारत का कहना रहा कि पाकिस्तान ने पहली और सबसे जरूरी शर्त कभी पूरी नहीं की। पाकिस्तान द्वारा सेना और कबायलियों को वापस न बुलाने के कारण जनमत संग्रह की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
युद्धविराम के बाद बना नियंत्रण क्षेत्र
लगातार संघर्ष के बाद संयुक्त राष्ट्र की पहल पर दोनों देशों के बीच युद्धविराम लागू करने पर सहमति बनी। 1 जनवरी 1949 से प्रभावी हुए सीजफायर के समय तक जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा इलाका पाकिस्तान के नियंत्रण में जा चुका था।
युद्धविराम के दौरान यह तय हुआ कि जिस स्थान पर दोनों देशों की सेनाएं मौजूद हैं, वहीं उनकी स्थिति बनी रहेगी। इसी व्यवस्था के कारण पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र उसके नियंत्रण में रह गया।
बाद के वर्षों में यही इलाका पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर (PoK) के नाम से जाना जाने लगा। भारत लगातार इस पूरे क्षेत्र को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और इसे पाकिस्तान का अवैध कब्जा बताता है।
पीओके का प्रशासन कैसे चलता है?
पाकिस्तान इस क्षेत्र को “आज़ाद जम्मू और कश्मीर” कहता है और वहां अलग प्रशासनिक व्यवस्था होने का दावा करता है। हालांकि कई विश्लेषकों और स्थानीय संगठनों का आरोप है कि वास्तविक नियंत्रण इस्लामाबाद के पास ही रहता है और स्थानीय सरकार के अधिकार सीमित हैं।
वर्षों से वहां के कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन अधिक स्वायत्तता, बेहतर आर्थिक अवसर और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग उठाते रहे हैं। समय-समय पर इन मांगों को लेकर प्रदर्शन भी होते रहे हैं।
मौजूदा विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
हाल के दिनों में रावलकोट सहित कई इलाकों में लोगों का असंतोष फिर सामने आया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें मूलभूत सुविधाएं, रोजगार, बिजली, पानी और राजनीतिक अधिकार पर्याप्त रूप से नहीं मिल रहे। इसके अलावा स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं सुना जाता और विरोध करने वालों पर कार्रवाई की जाती है।
ईदगाह मैदान में आयोजित हालिया प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। वहां मौजूद कई वक्ताओं ने पाकिस्तान सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए चेतावनी दी कि यदि हालात नहीं बदले तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
भारत का क्या रुख है?
भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से स्पष्ट रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने 1947-48 के युद्ध के दौरान जिस क्षेत्र पर कब्जा किया था, वह अवैध है।
दूसरी ओर पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अपना दावा बनाए रखता है और कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। इसी कारण यह विवाद दशकों से भारत-पाकिस्तान संबंधों का सबसे संवेदनशील विषय बना हुआ है।
आज भी बना हुआ है विवाद
1947 में शुरू हुआ यह विवाद सात दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। नियंत्रण रेखा (LoC) दोनों देशों के बीच सैन्य विभाजन का आधार बनी हुई है, जबकि कूटनीतिक स्तर पर भी समय-समय पर इस मुद्दे को लेकर तनाव देखने को मिलता है।
वर्तमान में पीओके में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर इस क्षेत्र की राजनीतिक और ऐतिहासिक स्थिति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। स्थानीय लोगों की नाराजगी, पाकिस्तान सरकार के खिलाफ उठती आवाजें और क्षेत्र के भविष्य को लेकर जारी बहस यह दिखाती है कि यह मुद्दा आज भी दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है।
(Photo : AI Generated)




