हरियाणा में शिकायतों का अंबार: लोकायुक्त रिपोर्ट ने खोली प्रशासनिक जवाबदेही की पोल, 1,289 मामले अब भी लंबित

हरियाणा में शिकायतों का अंबार: लोकायुक्त रिपोर्ट ने खोली प्रशासनिक जवाबदेही की पोल, 1,289 मामले अब भी लंबित

चंडीगढ़: हरियाणा में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और सरकारी विभागों में शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था को लेकर हरियाणा लोकायुक्त की वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2026 तक लोकायुक्त के पास कुल 1,289 शिकायतें लंबित थीं। इनमें सबसे अधिक मामले विकास एवं पंचायत, पुलिस और राजस्व विभाग से जुड़े हुए हैं।

रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि प्रदेश में नागरिकों की शिकायतों के समाधान के लिए मौजूद व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की जरूरत है। खास तौर पर उन विभागों को लेकर चिंता ज्यादा दिखाई देती है, जिनका आम लोगों से प्रत्यक्ष और रोजमर्रा का संपर्क रहता है।

लोकायुक्त के समक्ष लंबित 1,289 मामलों में अकेले विकास एवं पंचायत विभाग से संबंधित 450 शिकायतें हैं। यह कुल लंबित मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा है। इसके बाद पुलिस विभाग 250 शिकायतों के साथ दूसरे और राजस्व विभाग 189 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर है।

इसके अलावा शिक्षा विभाग से संबंधित 100 शिकायतें लोकायुक्त के पास लंबित पाई गईं, जबकि शहरी स्थानीय निकाय विभाग से जुड़े 66 मामले भी अभी निपटारे की प्रतीक्षा में हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि स्थानीय प्रशासन, पुलिस, भूमि संबंधी मामलों और शिक्षा व्यवस्था जैसे क्षेत्रों को लेकर नागरिकों की शिकायतें बड़ी संख्या में लोकायुक्त तक पहुंच रही हैं।

विकास एवं पंचायत विभाग से जुड़ी 450 लंबित शिकायतों का आंकड़ा विशेष रूप से ध्यान खींचता है। पंचायत स्तर पर विकास कार्य, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, स्थानीय निकायों से जुड़े निर्णय और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक कामकाज सीधे आम लोगों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में इस विभाग के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में शिकायतों का लंबित रहना प्रशासनिक निगरानी और शिकायत निवारण प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।

पुलिस विभाग को लेकर लोकायुक्त के सामने पहुंची शिकायतों की प्रकृति भी गंभीर है। रिपोर्ट में पुलिस पर एफआईआर दर्ज नहीं करने, जांच प्रक्रिया में पक्षपात, रिश्वत मांगने और विरोधियों के प्रभाव में आकर झूठे मामलों में फंसाने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया है।

पुलिस को नागरिकों की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की शुरुआती कड़ी माना जाता है। किसी शिकायत पर एफआईआर दर्ज न होना या जांच में भेदभाव के आरोप लगना सीधे तौर पर पुलिस की निष्पक्षता और जवाबदेही से जुड़े सवाल पैदा करता है। यही कारण है कि लोकायुक्त के समक्ष पुलिस से संबंधित 250 शिकायतों का लंबित होना प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय माना जा रहा है।

राजस्व विभाग भी शिकायतों के मामले में पीछे नहीं है। इस विभाग से जुड़ी 189 शिकायतें लंबित हैं। इनमें भूमि रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों, राजस्व कार्यालयों में अनधिकृत लोगों की भूमिका, रिश्वत की मांग, उत्पीड़न और मामलों के निपटारे में अत्यधिक देरी जैसे आरोप शामिल हैं।

जमीन से जुड़े मामलों में दस्तावेजों और रिकॉर्ड की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसी व्यक्ति की संपत्ति, खेती या अन्य भूमि संबंधी अधिकार सीधे राजस्व रिकॉर्ड पर निर्भर करते हैं। ऐसे मामलों में यदि रिकॉर्ड में अनियमितता हो या किसी आवेदन अथवा विवाद के निपटारे में अनावश्यक देरी हो तो इसका सीधा असर संबंधित व्यक्ति पर पड़ता है। लोकायुक्त की रिपोर्ट ने राजस्व व्यवस्था में पारदर्शिता और समयबद्धता बढ़ाने की आवश्यकता को सामने रखा है।

शिक्षा विभाग से संबंधित 100 शिकायतों का लंबित होना भी रिपोर्ट में दर्ज किया गया है। वहीं शहरी स्थानीय निकाय विभाग से जुड़ी 66 शिकायतें लंबित हैं। ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि शिकायतों का दायरा केवल किसी एक विभाग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर नागरिकों की शिकायतें मौजूद हैं।

रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू लोकायुक्त की सिफारिशों पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से संबंधित है। वर्ष 2017 से 2025 के बीच लोकायुक्त द्वारा सरकार को जिन मामलों में सिफारिशें भेजी गईं, उनमें से 170 मामलों में अभी तक Action Taken Report यानी कार्रवाई की रिपोर्ट लोकायुक्त के समक्ष पेश नहीं की गई थी।

यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकायुक्त की भूमिका केवल शिकायतों की जांच करने तक सीमित नहीं होती। जांच के बाद यदि किसी मामले में कार्रवाई की सिफारिश की जाती है तो संबंधित विभाग या सक्षम प्राधिकारी से यह अपेक्षा रहती है कि वह उस पर की गई कार्रवाई की जानकारी समय पर उपलब्ध कराए।

170 मामलों में कार्रवाई रिपोर्ट का लंबित रहना इस बात पर सवाल खड़ा करता है कि लोकायुक्त की सिफारिशों को प्रशासनिक स्तर पर कितनी प्राथमिकता दी जा रही है। यदि जांच के बाद सिफारिशें लंबे समय तक लंबित रहती हैं और उनकी अनुपालन रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की जाती, तो इससे शिकायत निवारण की पूरी प्रक्रिया की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।

वर्ष 2025-26 के दौरान भी बड़ी संख्या में लोग लोकायुक्त के पास पहुंचे। 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच कुल 539 नई शिकायतें दर्ज हुईं। यह संख्या बताती है कि नागरिक भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही या सरकारी कामकाज से जुड़ी शिकायतों को लेकर लोकायुक्त जैसी संस्था से उम्मीद बनाए हुए हैं।

इसी अवधि में लोकायुक्त के प्रयासों से सरकारी धन के दुरुपयोग और गबन से जुड़े मामलों में 28,17,065 रुपये की वसूली भी कराई गई। यह पहलू लोकायुक्त की उस भूमिका को दर्शाता है, जिसके तहत सरकारी धन के नुकसान से जुड़े मामलों में कार्रवाई के जरिए राशि की रिकवरी भी सुनिश्चित की जा सकती है।

जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो भिवानी सबसे अधिक नई शिकायतों वाला जिला रहा। यहां से एक साल में 73 शिकायतें लोकायुक्त तक पहुंचीं। इसके बाद पानीपत में 43 और रेवाड़ी में 39 नई शिकायतें दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से यह भी संकेत मिलता है कि लोकायुक्त के पास शिकायतों का दबाव केवल राज्य के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है।

दक्षिण हरियाणा से जुड़े मामलों को लेकर रिपोर्ट में शिकायतकर्ताओं की व्यावहारिक परेशानी का मुद्दा भी सामने आया है। फरीदाबाद, गुरुग्राम, रेवाड़ी, पलवल, नूंह, महेंद्रगढ़ और झज्जर जिलों से संबंधित कुल 312 शिकायतें लंबित थीं।

इन क्षेत्रों के शिकायतकर्ताओं और संबंधित अधिकारियों को सुनवाई के लिए चंडीगढ़ पहुंचना पड़ता है। दूरदराज के जिलों से बार-बार चंडीगढ़ आने में शिकायतकर्ताओं का समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं। विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए यह प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है, जो पहले ही किसी प्रशासनिक विवाद या शिकायत के कारण परेशानी झेल रहे हों।

इसी समस्या को देखते हुए लोकायुक्त ने गुरुग्राम में क्षेत्रीय लोकायुक्त कैंप कोर्ट अथवा कार्यालय स्थापित करने की सिफारिश की है। यदि ऐसा तंत्र स्थापित होता है तो दक्षिण हरियाणा के शिकायतकर्ताओं को अपने मामलों की सुनवाई के लिए चंडीगढ़ तक आने की आवश्यकता कम हो सकती है। इससे शिकायत निवारण प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है।

रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े केवल लंबित शिकायतों की संख्या नहीं बताते, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाते हैं। किसी शिकायत का लोकायुक्त तक पहुंचना अपने आप में यह संकेत हो सकता है कि शिकायतकर्ता को सामान्य प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं मिला या वह उस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं था।

इसलिए शिकायतों की संख्या को कम करना ही पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह भी है कि विभागीय स्तर पर शिकायतों का निपटारा प्रभावी तरीके से हो, ताकि लोगों को छोटी-बड़ी समस्याओं के लिए उच्च स्तर की शिकायत निवारण संस्थाओं तक जाने की आवश्यकता कम पड़े।

लोकायुक्त की रिपोर्ट यह भी बताती है कि केवल शिकायतों का निपटारा करना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही, भ्रष्टाचार या अधिकारों के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो उसके खिलाफ उचित विभागीय या कानूनी कार्रवाई भी जरूरी है। तभी जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावी मानी जा सकती है।

विकास एवं पंचायत, पुलिस और राजस्व विभाग से जुड़ी शिकायतों की अधिक संख्या को देखते हुए इन विभागों में विशेष निगरानी की आवश्यकता महसूस होती है। इन विभागों का सीधा संबंध आम नागरिकों से है और यहां होने वाली किसी भी प्रशासनिक देरी या कथित अनियमितता का असर बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ सकता है।

लोकायुक्त की सिफारिशों पर समय पर Action Taken Report उपलब्ध कराना भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। रिपोर्ट के मुताबिक 170 मामलों में यह रिपोर्ट लंबित है। ऐसे में सरकार और संबंधित विभागों के सामने चुनौती केवल नई शिकायतों के निपटारे की नहीं, बल्कि पुराने मामलों में की गई कार्रवाई को रिकॉर्ड पर लाने की भी है।

रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से लड़ने के लिए संस्थागत तंत्र मौजूद है, लेकिन उसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकारी विभाग उसकी सिफारिशों और निर्देशों पर कितनी तेजी से कार्रवाई करते हैं।

हरियाणा में पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन की दिशा में लोकायुक्त की रिपोर्ट महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आई है। 31 मार्च 2026 तक 1,289 लंबित शिकायतें, एक वर्ष में मिली 539 नई शिकायतें और 170 मामलों में कार्रवाई रिपोर्ट का अभाव प्रशासन के सामने सुधार की जरूरत को रेखांकित करता है।

अब जरूरत इस बात की है कि अधिक शिकायतों वाले विभागों में आंतरिक निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए, शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट समयसीमा तय हो और लोकायुक्त की सिफारिशों पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही दक्षिण हरियाणा जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्तर पर सुनवाई की सुविधा उपलब्ध कराने से शिकायतकर्ताओं की परेशानी भी कम हो सकती है।

कुल मिलाकर, हरियाणा लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने कई अहम सवाल रखे हैं। एक ओर बड़ी संख्या में नागरिक शिकायतों के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोकायुक्त की सिफारिशों पर सरकारी कार्रवाई की रिपोर्ट भी कई मामलों में लंबित है। ऐसे में रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि केवल शिकायत सुनने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं, बल्कि समय पर समाधान, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया को अधिक मजबूत बनाना होगा।
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