रिश्ता चाहे प्रेम का हो, शादी का हो या दोस्ती का, उसमें एक-दूसरे का ख्याल रखना स्वाभाविक है। जब हम किसी को अपना मानते हैं तो उसकी परेशानियों में साथ खड़े होते हैं, उसकी जरूरतों को समझने की कोशिश करते हैं और कई बार अपनी सुविधा छोड़कर उसके लिए समय भी निकालते हैं। यही चीज किसी रिश्ते को मजबूत बनाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर यह कोशिश हमेशा सिर्फ एक ही तरफ से होती रहे तो क्या होगा?
कई बार किसी रिश्ते को बचाए रखने या सामने वाले को खुश रखने की कोशिश में इंसान धीरे-धीरे अपनी ही जरूरतों को नजरअंदाज करने लगता है। वह अपनी पसंद छोड़ देता है, दोस्तों से मिलना कम कर देता है, अपने शौक के लिए समय नहीं निकालता और यहां तक कि आराम करने को भी गैरजरूरी समझने लगता है। बाहर से सबकुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर से व्यक्ति लगातार थकता जाता है।
इसी स्थिति को समझाने के लिए मोटिवेशनल स्पीकर और कंटेंट क्रिएटर अंकुर वारिकू ने फोन की बैटरी और चार्जर का बेहद सरल उदाहरण इस्तेमाल किया है। उनका यह उदाहरण बताता है कि दूसरों की जिंदगी में रोशनी भरने के चक्कर में अपनी ऊर्जा पूरी तरह खत्म कर देना समझदारी नहीं है।
पहले खुद को समझना क्यों जरूरी है?
रिश्ते में प्रवेश करने के बाद हमारी प्राथमिकताएं बदलना कोई असामान्य बात नहीं है। पार्टनर की खुशी मायने रखती है और उसके लिए कुछ त्याग करना भी रिश्ते का हिस्सा है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब त्याग एकतरफा आदत बन जाए।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को हर सप्ताहांत दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद था। रिश्ता बनने के बाद वह सिर्फ इसलिए दोस्तों से मिलना छोड़ देता है क्योंकि उसके पार्टनर को यह पसंद नहीं है। धीरे-धीरे वह अपनी बाकी पसंद भी छोड़ता जाता है। उसे लगता है कि शायद यही प्यार है और अच्छे रिश्ते के लिए उसे हर चीज में समझौता करना चाहिए।
कुछ समय बाद उसे महसूस हो सकता है कि उसकी अपनी जिंदगी में ऐसी बहुत कम चीजें बची हैं, जो उसे खुशी देती हैं। तब रिश्ते में मौजूद होने के बावजूद व्यक्ति भावनात्मक रूप से अकेला महसूस कर सकता है।
इसलिए खुद की जरूरतों को पहचानना स्वार्थ नहीं है। अपने लिए समय निकालना, अपनी पसंद बनाए रखना और अपनी सीमाओं को समझना भी स्वस्थ रिश्ते का हिस्सा है।
चार्जर वाला उदाहरण क्या समझाता है?
अंकुर वारिकू ने इसी बात को फोन चार्जर की स्थिति से जोड़कर समझाया। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति आपके पास आता है और कहता है कि उसके मोबाइल की बैटरी लगभग खत्म हो चुकी है। आप मदद करने के लिए अपना चार्जर उसे दे देते हैं।
उसका फोन धीरे-धीरे चार्ज होने लगता है। लेकिन उसी समय आपका अपना फोन भी कम बैटरी पर चल रहा है। इसके बावजूद आप सोचते हैं कि पहले उसका मोबाइल चार्ज हो जाए, बाद में अपने फोन की चिंता करेंगे।
वह व्यक्ति अपना फोन पूरी तरह चार्ज कर लेता है और आपका चार्जर वापस कर देता है। कुछ समय बाद उसकी बैटरी फिर कम होती है और वह दोबारा आपके पास मदद मांगने पहुंच जाता है। आप फिर अपना चार्जर उसे दे देते हैं।
अगर यह सिलसिला लगातार चलता रहे और आप कभी अपने फोन को चार्ज ही न करें, तो आखिरकार आपकी बैटरी भी खत्म हो जाएगी।
रिश्तों में भी कई लोग यही करते हैं। वे हर समय सामने वाले की भावनाओं, समस्याओं और जरूरतों को संभालते रहते हैं, लेकिन अपनी भावनात्मक स्थिति पर ध्यान नहीं देते। नतीजा यह होता है कि एक दिन उनके पास देने के लिए ऊर्जा ही नहीं बचती।
हर बार आप ही क्यों करें पहल?
किसी भी रिश्ते में प्रयास होना जरूरी है, लेकिन प्रयास की जिम्मेदारी केवल एक व्यक्ति की नहीं होनी चाहिए। अगर हमेशा एक ही पार्टनर फोन करता है, बातचीत शुरू करता है, मिलने की योजना बनाता है, माफी मांगता है और विवाद खत्म करने की कोशिश करता है, तो कुछ समय बाद उसके भीतर यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि आखिर रिश्ते को निभाने की कोशिश सिर्फ वही क्यों कर रहा है?
शुरुआत में वह इन चीजों को प्यार समझकर नजरअंदाज कर सकता है। लेकिन लंबे समय तक एकतरफा प्रयास व्यक्ति को मानसिक रूप से थका सकते हैं।
स्वस्थ रिश्ते में दोनों लोग अपनी तरफ से योगदान करते हैं। कभी एक व्यक्ति कमजोर होता है तो दूसरा उसका सहारा बनता है। फिर जरूरत पड़ने पर भूमिका बदल जाती है। यही आपसी सहयोग रिश्ते को संतुलित बनाता है।
प्यार का मतलब अपनी पहचान खो देना नहीं
किसी के साथ जुड़ने का अर्थ यह नहीं है कि आपकी व्यक्तिगत पहचान खत्म हो जाए। पार्टनर आपकी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, लेकिन आपकी पूरी दुनिया केवल उसी तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
आपकी अपनी पसंद, दोस्त, परिवार, करियर, शौक और निजी लक्ष्य भी महत्वपूर्ण हैं। अगर आपको संगीत सुनना अच्छा लगता है, किताबें पढ़ना पसंद है, अकेले घूमना अच्छा लगता है या दोस्तों के साथ समय बिताने से खुशी मिलती है, तो रिश्ते में आने के बाद इन चीजों को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है।
इसी तरह पार्टनर को भी अपनी व्यक्तिगत जिंदगी जीने की आजादी और जगह मिलनी चाहिए। दो लोगों का साथ तभी ज्यादा खूबसूरत बनता है, जब दोनों अपनी पहचान बनाए रखते हुए एक-दूसरे का हिस्सा बनें।
हर समझौता प्यार नहीं होता
रिश्तों में समझौते होते हैं और होने भी चाहिए। कभी आपकी पसंद के मुताबिक योजना बनती है तो कभी पार्टनर की सुविधा के हिसाब से। कभी आप अपनी इच्छा छोड़ते हैं और कभी सामने वाला आपके लिए ऐसा करता है।
लेकिन हर बार अगर सिर्फ आप ही समझौता कर रहे हैं, तो इसे रिश्ते की मजबूती समझना सही नहीं होगा।
अगर आपको बार-बार अपनी बात दबानी पड़ती है, अपनी इच्छाएं छोड़नी पड़ती हैं या सिर्फ इसलिए कुछ करना पड़ता है क्योंकि सामने वाला नाराज हो जाएगा, तो इस स्थिति पर विचार करना जरूरी है। रिश्ते में समझदारी का अर्थ हर बात पर खुद को मिटा देना नहीं है।
आपको यह समझना होगा कि समझौता और आत्म-उपेक्षा में फर्क होता है। समझौता दोनों तरफ से हो सकता है, जबकि आत्म-उपेक्षा में व्यक्ति लगातार अपनी जरूरतों को महत्वहीन मानने लगता है।
अपनी ‘बैटरी’ को रिचार्ज करते रहें
फोन की बैटरी को लगातार चलाने के लिए चार्ज करना पड़ता है। इंसान भी इससे अलग नहीं है। लगातार काम, जिम्मेदारियों और रिश्तों को संभालते रहने के लिए मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा चाहिए।
इसलिए अपने लिए समय निकालना जरूरी है। कुछ देर अकेले रहना, पसंद का काम करना, पर्याप्त आराम लेना, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना या बस कुछ समय बिना किसी जिम्मेदारी के बिताना व्यक्ति को फिर से ऊर्जा दे सकता है।
जब आप खुद मानसिक रूप से ठीक महसूस करेंगे, तभी किसी दूसरे का बेहतर तरीके से साथ दे पाएंगे। खुद की देखभाल का मतलब यह नहीं कि आप अपने पार्टनर की परवाह नहीं करते। बल्कि इसका मतलब है कि आप रिश्ते को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखने के लिए अपनी क्षमता को भी समझते हैं।
रिश्ते में ‘बैलेंस’ क्यों जरूरी है?
एक अच्छा रिश्ता वह नहीं जिसमें दो लोग हर समय साथ रहें। अच्छा रिश्ता वह है जिसमें दोनों एक-दूसरे के साथ रहते हुए भी खुद के लिए जगह बनाए रख सकें।
कभी पार्टनर को आपकी जरूरत होगी और कभी आपको उसकी जरूरत पड़ सकती है। कभी एक व्यक्ति ज्यादा देगा तो दूसरे समय दूसरा व्यक्ति ज्यादा योगदान करेगा। जरूरी यह है कि लंबे समय में रिश्ता एकतरफा न बन जाए।
अगर आप महसूस कर रहे हैं कि सामने वाले की खुशी के लिए लगातार अपनी खुशी छोड़ रहे हैं, तो थोड़ा रुककर खुद से सवाल पूछना चाहिए—क्या मैं इस रिश्ते में खुश हूं? क्या मेरी जरूरतों को भी महत्व दिया जाता है? क्या मैं बिना अपराधबोध के अपनी जिंदगी के दूसरे हिस्सों को समय दे सकता हूं?
इन सवालों के जवाब रिश्ते की स्थिति को समझने में मदद कर सकते हैं।
सामने वाले की बैटरी भी समझें, अपनी भी
रिश्ते में सिर्फ अपनी जरूरतों को समझना पर्याप्त नहीं है। पार्टनर की भावनात्मक स्थिति को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर वह थका हुआ है, परेशान है या उसे कुछ समय अकेले चाहिए, तो उसे वह जगह देना प्यार का ही हिस्सा है।
लेकिन इसी के साथ यह उम्मीद भी उचित है कि आपकी थकान और भावनाओं को भी समझा जाए। रिश्ता तभी संतुलित रहता है जब दोनों लोग एक-दूसरे की ‘बैटरी’ का ख्याल रखें।
इसलिए अगली बार जब आपको लगे कि आप लगातार किसी दूसरे को संभाल रहे हैं, उसकी समस्याएं सुन रहे हैं और उसकी जरूरतों को पूरा करने में लगे हैं, तो एक बार अपनी स्थिति भी देखिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि दूसरे का फोन चार्ज करते-करते आपका अपना फोन ही बंद होने वाला है?
प्यार में किसी का हाथ थामना खूबसूरत बात है, लेकिन अपना हाथ पूरी तरह छोड़ देना नहीं। रिश्ते को निभाइए, पार्टनर की परवाह कीजिए, जरूरत पड़ने पर समझौता भी कीजिए, लेकिन अपनी पहचान, अपनी खुशी और अपने मानसिक सुकून के लिए भी जगह बचाकर रखिए। आखिर स्वस्थ रिश्ता वही है, जहां दो लोग एक-दूसरे को ऊर्जा देते हैं, न कि एक की पूरी ऊर्जा खत्म करके दूसरा चलता रहे।
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