भारतीय हॉकी टीम ने आगामी एफआईएच हॉकी वर्ल्ड कप 2026 के लिए अपनी 20 सदस्यीय टीम की घोषणा कर दी है। लंबे समय से इस चयन का इंतजार किया जा रहा था, क्योंकि हाल के अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में टीम का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया था। चयन समिति ने इस बार अनुभवी खिलाड़ियों और युवा प्रतिभाओं का ऐसा मिश्रण तैयार किया है, जिससे टीम को बड़े टूर्नामेंट में संतुलन और मजबूती दोनों मिल सके। सबसे बड़ी जिम्मेदारी एक बार फिर स्टार डिफेंडर और ड्रैग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह को सौंपी गई है, जो कप्तान के रूप में भारतीय चुनौती का नेतृत्व करेंगे।
टीम चयन के दौरान कुछ ऐसे फैसले भी सामने आए, जिन्होंने हॉकी प्रशंसकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। हाल ही में यूरोप प्रो लीग में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले चार खिलाड़ियों को इस बार अंतिम टीम में जगह नहीं मिली है। चयनकर्ताओं का मानना है कि विश्व कप जैसे बड़े मंच पर टीम को नए संयोजन के साथ उतारना बेहतर रहेगा। यही कारण है कि कुछ युवा खिलाड़ियों को अवसर दिया गया है, जबकि कुछ अनुभवी चेहरों को बाहर बैठना पड़ा है।
भारतीय टीम पिछले कई वर्षों से विश्व कप में उस स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पाई है, जिसकी उससे उम्मीद की जाती रही है। ऐसे में इस बार टीम का लक्ष्य केवल अच्छा प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि 1975 के बाद पहली बार विश्व कप ट्रॉफी जीतने का सपना पूरा करना भी होगा। खिलाड़ियों और टीम प्रबंधन दोनों का मानना है कि सही रणनीति और निरंतर प्रदर्शन के दम पर भारत इतिहास बदल सकता है।
कप्तान हरमनप्रीत सिंह पर इस बार भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी रहेगी। उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय हॉकी को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है। पेरिस ओलंपिक 2024 में भारत को कांस्य पदक दिलाने वाले हरमनप्रीत न केवल अपनी शानदार ड्रैग फ्लिक के लिए पहचाने जाते हैं, बल्कि मैदान पर उनकी नेतृत्व क्षमता भी टीम की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। विश्व कप में उनसे एक बार फिर निर्णायक मौकों पर बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद होगी।
मिडफील्ड विभाग में भी भारतीय टीम काफी मजबूत नजर आ रही है। अनुभवी मनप्रीत सिंह अपने अनुभव से टीम को संतुलन देंगे, जबकि हार्दिक सिंह और विवेक सागर प्रसाद जैसे खिलाड़ी खेल की गति नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा राजिंदर सिंह, आदित्य अर्जुन लालगे और नीलकंठ शर्मा जैसे युवा खिलाड़ियों को भी मौका दिया गया है, ताकि टीम को नई ऊर्जा और आक्रामकता मिल सके। चयनकर्ताओं का विश्वास है कि यह मिडफील्ड विपक्षी टीमों के खिलाफ मैच का रुख बदलने की क्षमता रखता है।
गोलकीपिंग की जिम्मेदारी इस बार मोहित एचएस और सूरज करकेरा के हाथों में होगी। दोनों खिलाड़ियों ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया है। विश्व कप जैसे दबाव वाले टूर्नामेंट में गोलकीपर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है और टीम प्रबंधन को उम्मीद है कि दोनों खिलाड़ी मुश्किल परिस्थितियों में टीम को मजबूत सहारा देंगे।
डिफेंस की बात करें तो भारत ने अनुभवी और युवा खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण तैयार किया है। कप्तान हरमनप्रीत सिंह के साथ अमित रोहिदास, जुगराज सिंह, संजय, सुमित, जरमनप्रीत सिंह और यशदीप सिवाच को टीम में शामिल किया गया है। इन खिलाड़ियों पर विपक्षी टीमों के आक्रमण को रोकने के साथ-साथ पेनल्टी कॉर्नर पर गोल करने की भी जिम्मेदारी होगी। खासकर हरमनप्रीत और जुगराज सिंह की ड्रैग फ्लिक क्षमता भारत के लिए बड़ा हथियार साबित हो सकती है।
फॉरवर्ड लाइन में भी चयनकर्ताओं ने कई भरोसेमंद नामों को जगह दी है। मंदीप सिंह, दिलप्रीत सिंह, अभिषेक, सुखजीत सिंह और शिलानंद लाकड़ा पर गोल करने की जिम्मेदारी होगी। इन खिलाड़ियों ने पिछले कुछ समय में तेज आक्रमण और बेहतर तालमेल का प्रदर्शन किया है। यदि फॉरवर्ड लाइन अपने अवसरों को गोल में बदलने में सफल रहती है तो भारत किसी भी मजबूत टीम को चुनौती दे सकता है।
हालांकि टीम चयन में सबसे ज्यादा चर्चा उन चार खिलाड़ियों को लेकर हो रही है, जिन्हें इस बार अंतिम टीम में शामिल नहीं किया गया। यूरोप प्रो लीग में खेलने वाले डिफेंडर अमनदीप लकरा, मिडफील्डर राज कुमार पाल, रबीचंद्र सिंह मोइरांगथेम और फॉरवर्ड सेल्वम कार्थी को विश्व कप टीम से बाहर रखा गया है। इन खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी ने कई सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन चयन समिति का मानना है कि मौजूदा संयोजन टीम की रणनीति के लिए अधिक उपयुक्त है।
हाल के महीनों में भारतीय टीम का प्रदर्शन एफआईएच प्रो लीग में निराशाजनक रहा था। पूरे अभियान के दौरान भारत केवल चार मुकाबलों में जीत दर्ज कर पाया। इसके अलावा पांच मैच ड्रॉ रहे, जबकि सात मुकाबलों में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रदर्शन का असर अंक तालिका पर भी दिखाई दिया और भारतीय टीम आठवें स्थान पर रही। ऐसे नतीजों के बाद टीम प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि विश्व कप में बेहतर प्रदर्शन के लिए कुछ कठिन फैसले लेना जरूरी था।
प्रो लीग के अनुभव से भारतीय टीम ने कई अहम सबक भी सीखे हैं। खिलाड़ियों ने माना कि निर्णायक मौकों पर गोल करने में चूक, रक्षात्मक गलतियां और दबाव में संयम की कमी के कारण कई मुकाबले हाथ से निकल गए। अब विश्व कप में इन्हीं कमजोरियों को दूर करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। अभ्यास शिविर के दौरान फिटनेस, पेनल्टी कॉर्नर कन्वर्जन और रक्षात्मक रणनीति पर विशेष काम किया गया है।
भारतीय हॉकी का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है, लेकिन विश्व कप में सफलता लंबे समय से टीम से दूर रही है। भारत ने पहली और अब तक की एकमात्र विश्व कप ट्रॉफी वर्ष 1975 में जीती थी। उसके बाद कई बार टीम ने उम्मीद जगाई, लेकिन खिताब तक नहीं पहुंच सकी। इतना ही नहीं, पिछले विश्व कप 2023 में भी भारत का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा और टीम नौवें स्थान पर रही थी। यही वजह है कि इस बार खिलाड़ियों के सामने केवल अच्छा प्रदर्शन करने की नहीं, बल्कि इतिहास बदलने की भी चुनौती है।
टूर्नामेंट में भारत को पूल डी में रखा गया है, जहां मुकाबला आसान नहीं रहने वाला। इस ग्रुप में इंग्लैंड, पाकिस्तान और वेल्स जैसी मजबूत टीमें मौजूद हैं। तीनों मुकाबले नीदरलैंड के एमस्टेलवीन में खेले जाएंगे। भारतीय टीम अपने अभियान की शुरुआत 15 अगस्त को वेल्स के खिलाफ करेगी। इसके बाद 17 अगस्त को इंग्लैंड से मुकाबला होगा, जबकि 19 अगस्त को चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ हाई-वोल्टेज मैच खेला जाएगा। खासकर भारत-पाकिस्तान मुकाबले पर दुनियाभर के हॉकी प्रशंसकों की नजर रहेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ग्रुप चरण में लगातार अच्छा प्रदर्शन करता है तो नॉकआउट दौर में उसका आत्मविश्वास काफी बढ़ जाएगा। हालांकि इंग्लैंड जैसी टीम के खिलाफ अनुशासित हॉकी खेलना और पाकिस्तान के खिलाफ दबाव को संभालना भारतीय खिलाड़ियों के लिए बड़ी परीक्षा होगी। ऐसे में शुरुआती तीन मुकाबले पूरे अभियान की दिशा तय कर सकते हैं।
टीम प्रबंधन को भरोसा है कि अनुभव और युवा जोश का यह संतुलन भारत के लिए फायदेमंद साबित होगा। वरिष्ठ खिलाड़ियों का अनुभव और युवा खिलाड़ियों की ऊर्जा मिलकर टीम को नई पहचान दे सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय हॉकी ने कई बड़े मंचों पर शानदार प्रदर्शन किया है और अब लक्ष्य उस प्रदर्शन को विश्व कप में भी दोहराने का है।
विश्व कप के लिए घोषित इस टीम से देशभर के हॉकी प्रेमियों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। हरमनप्रीत सिंह की कप्तानी, मजबूत डिफेंस, संतुलित मिडफील्ड और आक्रामक फॉरवर्ड लाइन के दम पर भारत खिताब की दौड़ में मजबूत दावेदार बनने की कोशिश करेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारतीय टीम 51 साल पुराने इतिहास को दोहराते हुए एक बार फिर विश्व हॉकी की सबसे बड़ी ट्रॉफी अपने नाम कर पाएगी या नहीं। आने वाले मुकाबले इस सवाल का जवाब देंगे, लेकिन इतना तय है कि भारतीय टीम इस बार नए इरादों, नई रणनीति और नए विश्वास के साथ मैदान में उतरने जा रही है।




