मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक राजनीति और सैन्य रणनीति का केंद्र बन गया है। पिछले कई दिनों से अमेरिका ईरान से जुड़े ठिकानों और होर्मुज के आसपास के क्षेत्रों में सैन्य कार्रवाई कर रहा है। वॉशिंगटन का दावा है कि उसका उद्देश्य इस अहम समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखना और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को निर्बाध बनाए रखना है। हालांकि, रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि मौजूदा रणनीति से अमेरिका अपने घोषित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल हवाई हमलों के सहारे किसी भी रणनीतिक समुद्री क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना संभव नहीं है। उनका तर्क है कि जब तक बड़े पैमाने पर जमीनी अभियान नहीं चलाया जाता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना मुश्किल होगा। साथ ही यदि किसी तरह नियंत्रण स्थापित भी कर लिया जाए, तो उसे लंबे समय तक बनाए रखना अमेरिका के लिए बेहद महंगा और चुनौतीपूर्ण साबित होगा।
रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से होकर गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और बीमा उद्योग को प्रभावित कर सकता है।
पेंटागन के पूर्व अधिकारी जेसन कैंपबेल ने अमेरिकी रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि शुरुआत में अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करना, वहां की मौजूदा इस्लामिक सरकार पर दबाव बढ़ाना और उसकी सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना था। लेकिन समय के साथ अभियान का फोकस बदल गया है। अब अमेरिका मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है।
कैंपबेल के अनुसार, यह नया लक्ष्य भी उतना आसान नहीं है जितना दिखाई देता है। उनका कहना है कि केवल मिसाइल हमलों और हवाई कार्रवाई के जरिए समुद्री मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। जब तक व्यापारिक जहाजों और उन्हें बीमा देने वाली कंपनियों को सुरक्षा का पूरा भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक इस क्षेत्र में सामान्य गतिविधियां बहाल होना मुश्किल रहेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि अमेरिका वास्तव में चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित घोषित हो, तो उसे बड़े पैमाने पर जमीनी सैन्य अभियान चलाना होगा। इसके लिए हजारों सैनिकों की तैनाती, भारी सैन्य संसाधन और लंबे समय तक संचालन की जरूरत पड़ेगी। केवल समुद्र और हवा से दबाव बनाकर इस उद्देश्य को हासिल नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज के आसपास का इलाका भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से बेहद जटिल है। ईरान इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित है और वर्षों से उसने यहां अपनी सैन्य मौजूदगी तथा रक्षा व्यवस्था को मजबूत किया है। ऐसे में किसी बाहरी देश के लिए वहां स्थायी नियंत्रण स्थापित करना आसान नहीं माना जाता।
रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक, यदि अमेरिका जमीनी अभियान शुरू नहीं करता तो मौजूदा हवाई हमलों का प्रभाव सीमित ही रहेगा। दूसरी ओर, यदि वह जमीनी कार्रवाई करता है तो उसे भारी सैन्य संसाधनों, अधिक सैनिकों और लंबे समय तक चलने वाले अभियान के लिए तैयार रहना होगा। इसके साथ ही अमेरिकी सेना को लगातार सुरक्षा, रसद और आपूर्ति जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि किसी क्षेत्र पर कब्जा करना एक अलग बात है, लेकिन उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना उससे कहीं अधिक कठिन होता है। होर्मुज जैसे संवेदनशील इलाके में यह चुनौती और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यहां लगातार सैन्य गतिविधियां, समुद्री यातायात और क्षेत्रीय तनाव बने रहते हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, इस समय पर्शियन गल्फ और अरब सागर में अमेरिका के लगभग 20 युद्धपोत तैनात हैं, जो क्षेत्र में चल रहे सैन्य अभियानों का हिस्सा हैं। इसके अलावा मध्य पूर्व के विभिन्न देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों और युद्धपोतों पर 50 हजार से अधिक सैनिक मौजूद हैं। इसके बावजूद कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी सैन्य ताकत भी होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल युद्धपोतों की संख्या पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए तटीय इलाकों पर नियंत्रण, खुफिया नेटवर्क, हवाई निगरानी, विशेष बलों की तैनाती और स्थानीय परिस्थितियों की गहरी समझ भी जरूरी होती है। यदि इन सभी पहलुओं पर समान रूप से काम नहीं किया जाए, तो किसी भी अभियान की सफलता सीमित रह सकती है।
कुछ रणनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे स्वाभाविक बढ़त देती है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास उसका प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है और उसने इस क्षेत्र में अपनी रक्षा क्षमताओं को लगातार मजबूत किया है। यही कारण है कि बाहरी सैन्य शक्ति के लिए यहां निर्णायक बढ़त हासिल करना आसान नहीं माना जाता।
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस संघर्ष का दायरा और बढ़ता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि दुनिया भर के कई देश इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका लगातार यह दोहराता रहा है कि उसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वैश्विक व्यापार को बाधित होने से बचाना है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी रणनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल हवाई हमले पर्याप्त नहीं होते। यदि जमीन पर नियंत्रण नहीं हो, तो किसी क्षेत्र को स्थायी रूप से सुरक्षित बनाए रखना बेहद कठिन होता है।
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, आने वाले समय में अमेरिका को यह तय करना होगा कि वह केवल सीमित सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा या फिर अपने अभियान का दायरा बढ़ाएगा। फिलहाल विशेषज्ञों की राय यही है कि मौजूदा परिस्थितियों में होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना अमेरिका के लिए बेहद कठिन चुनौती बना हुआ है और बिना व्यापक जमीनी अभियान के इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं दिखाई देता।




