अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर आने वाले समय में राहत की उम्मीद जताई जा रही है। वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति में सुधार और खपत की रफ्तार कमजोर पड़ने से 2027 में क्रूड के दाम घटकर औसतन 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकते हैं। अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स की एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। इसके साथ ही दूसरे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने से बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता बेहतर होने की संभावना है। इन परिस्थितियों में वैश्विक तेल बाजार में मांग की तुलना में आपूर्ति अधिक हो सकती है, जिससे कीमतों पर नीचे आने का दबाव बनेगा।
हालांकि, तेल की कीमतों में गिरावट का यह अनुमान कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। खासतौर पर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष की दिशा वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है। यदि क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है और तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रह सकती हैं। ऐसे में बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और अनुमानित गिरावट में देरी हो सकती है।
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव काफी अहम है। देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने पर भारत का आयात खर्च बढ़ जाता है। वहीं, कीमतें कम होने पर देश को विदेशी मुद्रा की बचत करने और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को कम करने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि 2027 में तेल के दाम घटने की संभावना भारत के आर्थिक परिदृश्य के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
2027 में औसतन 80 डॉलर रह सकता है ब्रेंट क्रूड
गोल्डमैन सैक्स ने अपने अनुमान में कहा है कि दिसंबर 2026 तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 90 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है। बैंक ने इससे पहले दिसंबर के लिए 85 डॉलर प्रति बैरल का अनुमान लगाया था। यानी मौजूदा आकलन में कीमतों का स्तर पहले की अपेक्षा ऊंचा रखा गया है। इसके बावजूद बैंक को उम्मीद है कि 2027 के दौरान तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिलेगी और पूरे साल ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है।
यह अनुमान इस आधार पर तैयार किया गया है कि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर मौजूदा दबाव धीरे-धीरे कम होगा। मिडिल ईस्ट से निर्यात में सुधार, क्षेत्र के बाहर तेल उत्पादन में वृद्धि और खपत में कमजोरी जैसे कारक बाजार का संतुलन बदल सकते हैं। यदि इन रुझानों का असर आगे भी जारी रहता है, तो तेल की उपलब्धता बढ़ने के साथ कीमतों को सहारा देने वाले कारक कमजोर पड़ सकते हैं।
हालांकि, 80 डॉलर प्रति बैरल का स्तर कोई निश्चित कीमत नहीं है। यह गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है, जो भविष्य में सप्लाई, डिमांड और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर बदल सकता है। खासकर मिडिल ईस्ट में किसी बड़े घटनाक्रम से बाजार का मौजूदा आकलन प्रभावित हो सकता है।
तेल की कमी में आई बड़ी गिरावट, बाजार संतुलन के करीब
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में वैश्विक तेल बाजार की स्थिति में आए बदलाव को भी रेखांकित किया गया है। बैंक के मुताबिक, मार्च में दुनिया भर में तेल की मांग, आपूर्ति से प्रतिदिन लगभग 72 लाख बैरल अधिक थी। सितंबर तक यह अंतर घटकर करीब 3 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। इसका मतलब है कि कुछ महीनों के दौरान बाजार में तेल की कमी काफी हद तक कम हुई है।
आपूर्ति और मांग के बीच का यह अंतर तेल की कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है। जब बाजार में जरूरत के मुकाबले कम तेल उपलब्ध होता है, तब खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं। इसके उलट, यदि उत्पादन और निर्यात बढ़ने से बाजार में उपलब्धता बेहतर हो जाए, तो कीमतों पर दबाव बन सकता है।
सितंबर तक घाटे का इतना कम रह जाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक बाजार पहले की तुलना में संतुलन के अधिक करीब पहुंच गया है। यदि आने वाले महीनों में यही रुझान बना रहता है, तो तेल की कमी की जगह अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति बन सकती है। गोल्डमैन सैक्स को उम्मीद है कि 2026 की आखिरी तिमाही में वैश्विक तेल बाजार सरप्लस में आ जाएगा। बैंक का अनुमान है कि 2027 में भी मांग के मुकाबले आपूर्ति अधिक रहने की स्थिति जारी रह सकती है।
मिडिल ईस्ट से निर्यात सुधरने का दिखने लगा असर
वैश्विक तेल बाजार में सुधार की एक बड़ी वजह फारस की खाड़ी से होने वाले निर्यात में आई रिकवरी को माना जा रहा है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, सितंबर के अंत तक इस क्षेत्र से तेल का निर्यात सुधरकर 2025 के औसत स्तर के आसपास पहुंच गया था। इससे संकेत मिलता है कि संघर्ष और उससे पैदा हुई बाधाओं के बावजूद तेल निर्यात करने वाले देश अपने कामकाज को नए हालात के अनुरूप ढालने में सफल रहे हैं।
निर्यातकों ने परिवहन व्यवस्था और तेल की आपूर्ति से जुड़े इंतजामों में बदलाव किए हैं। साथ ही, परिवहन क्षमता बढ़ाने से भी सप्लाई को संभालने में मदद मिली है। यदि यह सुधार आगे जारी रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार को तेल की नियमित उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
फिर भी, मिडिल ईस्ट से तेल की आपूर्ति को पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं माना जा सकता। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर उत्पादन, परिवहन और निर्यात प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में बाजार में उपलब्ध तेल की मात्रा कम हो सकती है और कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं। इसलिए निर्यात में मौजूदा सुधार के बावजूद निवेशक और तेल बाजार से जुड़े कारोबारी क्षेत्र के घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
फिलहाल तेल की कीमतों पर बना हुआ है युद्ध का दबाव
लंबी अवधि में कीमतें घटने की संभावना के बावजूद फिलहाल तेल बाजार में जोखिम बना हुआ है। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, निकट भविष्य में डिलीवरी के लिए फिजिकल ब्रेंट क्रूड की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के बेंचमार्क फ्यूचर्स हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुके हैं।
फिजिकल क्रूड वह तेल है जिसकी वास्तविक डिलीवरी के लिए खरीद-बिक्री होती है, जबकि फ्यूचर्स बाजार में भविष्य में तय शर्तों पर कारोबार किया जाता है। दोनों की कीमतों में अंतर बाजार की तत्काल जरूरतों और आने वाले समय को लेकर कारोबारियों की उम्मीदों को दिखा सकता है।
गोल्डमैन सैक्स में ग्लोबल कमोडिटीज रिसर्च के सह-प्रमुख और ऑयल रिसर्च हेड डान स्ट्रुवेन के मुताबिक, संघर्ष बढ़ने की आशंका से तत्काल तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बनी हुई है। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर तेल का भंडार भी रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब है। ऐसी स्थिति में खरीदारों को भविष्य की जरूरतों के लिए स्टॉक दोबारा भरने की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे बाजार में मांग बढ़ेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा कीमतों में करीब 25 डॉलर प्रति बैरल का रिस्क प्रीमियम शामिल है। यह अतिरिक्त कीमत मुख्य रूप से संभावित सप्लाई बाधाओं और भू-राजनीतिक जोखिमों को दर्शाती है। यदि संघर्ष और तेज होता है, तो तेल की उपलब्धता में और कमी आ सकती है। इसके विपरीत, तनाव कम होने और सप्लाई सामान्य होने पर यह जोखिम प्रीमियम घट सकता है, जिससे कीमतों में राहत मिलने की गुंजाइश बनेगी।
कमजोर मांग भी कीमतों को नीचे ला सकती है
तेल बाजार में संभावित सरप्लस के पीछे सिर्फ उत्पादन और निर्यात में सुधार ही नहीं, बल्कि मांग में आई कमजोरी भी एक महत्वपूर्ण वजह है। गोल्डमैन सैक्स के आकलन के मुताबिक, 2026 की तीसरी तिमाही में वैश्विक तेल खपत पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले प्रतिदिन करीब 33 लाख बैरल कम रही।
मांग में इस गिरावट का असर मुख्य रूप से चीन, मिडिल ईस्ट और विकसित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में देखा गया। जब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेल की खपत कमजोर पड़ती है, तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त तेल को खपाना मुश्किल हो सकता है। इससे उत्पादकों और निर्यातकों पर कीमतों को लेकर दबाव बढ़ता है।
बैंक को उम्मीद है कि रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता बेहतर होने और उनकी कीमतें उपभोक्ताओं की पहुंच के भीतर आने पर मांग में धीरे-धीरे सुधार हो सकता है। हालांकि, इसके बावजूद 2027 की चौथी तिमाही में वैश्विक तेल मांग उस संभावित स्तर से प्रतिदिन करीब 7 लाख बैरल कम रहने का अनुमान है, जो संघर्ष से पैदा हुए व्यवधान नहीं होने की स्थिति में हो सकती थी।
इलेक्ट्रिक वाहनों का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल भी तेल की मांग के भविष्य को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल है। इसके अलावा, चीन में ईंधन की खपत के तौर-तरीकों में बदलाव आने से भी पेट्रोलियम उत्पादों की मांग की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
भारत को कैसे मिल सकती है राहत?
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट कई स्तरों पर राहत देने वाली हो सकती है। देश की तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है, इसलिए क्रूड के दाम में कमी आने पर तेल खरीदने के लिए विदेशों में खर्च की जाने वाली रकम घट सकती है। इससे देश के कुल आयात बिल पर दबाव कम हो सकता है और विदेशी मुद्रा की बचत में मदद मिल सकती है।
सस्ता कच्चा तेल पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की लागत को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का पूरा लाभ आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करेगा। इनमें रुपये और डॉलर की विनिमय दर, घरेलू कर, तेल कंपनियों की लागत और कीमतों से जुड़े फैसले शामिल हैं। इसलिए क्रूड सस्ता होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में तुरंत और उतनी ही मात्रा में गिरावट आएगी।
दूसरी तरफ, यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो भारत के आयात खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है। परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी दबाव पड़ सकता है। ऐसे में तेल की कीमतें घरेलू अर्थव्यवस्था, कारोबार और उपभोक्ताओं के खर्च को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे की दिशा तीन प्रमुख बातों पर निर्भर
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, आने वाले समय में तेल बाजार की दिशा तय करने में तीन कारक विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे। पहला, मिडिल ईस्ट और अन्य क्षेत्रों से आपूर्ति में सुधार कितनी तेजी से होता है। दूसरा, वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल की मांग कितनी तेजी से सामान्य होती है। तीसरा, अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष सहित क्षेत्रीय तनाव से जुड़े जोखिम किस दिशा में जाते हैं।
यदि निर्यात में सुधार जारी रहता है, उत्पादन बढ़ता है और मांग अपेक्षाकृत कमजोर बनी रहती है, तो 2027 में तेल की कीमतें औसतन 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं। लेकिन संघर्ष बढ़ने, सप्लाई बाधित होने या भंडार में और कमी आने की स्थिति में कीमतें उम्मीद से अधिक समय तक ऊंची रह सकती हैं।
कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल को लेकर तस्वीर फिलहाल मिली-जुली है। एक ओर सप्लाई में सुधार और कमजोर मांग कीमतों में गिरावट की संभावना पैदा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक तनाव और कम भंडार बाजार को अस्थिर बनाए हुए हैं। भारत के लिए तेल की कीमतों में संभावित नरमी राहत का संकेत जरूर है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।




