सनातन धर्म में भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नृसिंह की जयंती अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है और इसे धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश तथा भक्तों की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। देशभर के मंदिरों और घरों में इस दिन भगवान नृसिंह की विशेष पूजा-अर्चना, व्रत, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
हर वर्ष की तरह इस बार भी नृसिंह जयंती की सही तारीख को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई लोग 29 अप्रैल को पर्व मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग 30 अप्रैल को नृसिंह जयंती मनाने की बात कर रहे हैं। ऐसे में वैदिक पंचांग और उदया तिथि के आधार पर सही तिथि जानना आवश्यक है।
नृसिंह जयंती 2026 कब है?
वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि का आरंभ 29 अप्रैल 2026 को शाम 7 बजकर 51 मिनट पर होगा। यह तिथि 30 अप्रैल 2026 को रात 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगी।
हिंदू धर्म में अधिकांश व्रत और पर्व उदया तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) के आधार पर मनाए जाते हैं। चूंकि 30 अप्रैल को सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए नृसिंह जयंती 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को मनाना शास्त्रसम्मत माना गया है।
इसी कारण धार्मिक विद्वान और पंचांगों के अनुसार इस वर्ष नृसिंह जयंती का मुख्य पर्व 30 अप्रैल को ही मनाया जाएगा।
प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान नृसिंह का प्राकट्य न दिन में हुआ था और न ही पूरी रात में। उनका अवतार संध्याकाल, अर्थात प्रदोष काल में हुआ था। इसी कारण इस दिन प्रदोष काल में भगवान की पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
मान्यता है कि इसी समय भगवान विष्णु ने आधे सिंह और आधे मनुष्य का रूप धारण कर अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी तथा अत्याचारी हिरण्यकशिपु का वध किया था।
इसी कारण नृसिंह जयंती पर संध्या समय विशेष पूजा का विधान बताया गया है।
नृसिंह जयंती 2026 पूजा का शुभ समय
पंचांग के अनुसार इस वर्ष भगवान नृसिंह की पूजा के लिए शुभ समय—
- तिथि: 30 अप्रैल 2026, गुरुवार
- पूजा का शुभ समय: शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक (स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में हल्का अंतर संभव है)
इस अवधि में विधि-विधान से भगवान नृसिंह की पूजा करने को विशेष फलदायी माना जाता है।
भगवान नृसिंह कौन हैं?
भगवान नृसिंह भगवान विष्णु के दशावतारों में चौथे अवतार माने जाते हैं। उनका स्वरूप आधा मनुष्य और आधा सिंह का है।
पुराणों के अनुसार जब असुर राजा हिरण्यकशिपु ने अपने अत्याचारों से तीनों लोकों में आतंक फैला दिया और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया, तब उसके पुत्र प्रह्लाद ने केवल भगवान विष्णु की भक्ति की।
हिरण्यकशिपु ने अनेक बार प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार भगवान ने अपने भक्त की रक्षा की।
अंततः जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में पूछा कि यदि तुम्हारे भगवान हर जगह हैं तो क्या इस खंभे में भी हैं, तब भगवान विष्णु खंभे से नृसिंह रूप में प्रकट हुए।
उन्होंने संध्या समय, महल की चौखट पर, न हथियार से और न ही किसी मनुष्य या पशु के रूप में हिरण्यकशिपु का वध किया। इस प्रकार ब्रह्मा से प्राप्त उसके वरदान की सभी शर्तें पूर्ण हुईं।
नृसिंह जयंती का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में नृसिंह जयंती केवल भगवान के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह धर्म, सत्य और भक्तों की रक्षा का प्रतीक भी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान नृसिंह की पूजा करने से—
- भय दूर होता है।
- शत्रुओं से रक्षा होती है।
- नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है।
- परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
- जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है।
- आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
भक्त इस दिन भगवान नृसिंह से अपने परिवार की सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
नृसिंह जयंती व्रत का महत्व
कई श्रद्धालु इस दिन उपवास भी रखते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार नृसिंह जयंती का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक आचरण का पालन करते हैं, भगवान विष्णु एवं भगवान नृसिंह का ध्यान करते हैं और संध्या समय पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।
हालांकि स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या या विशेष परिस्थिति में व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित माना जाता है।
नृसिंह जयंती की पूजा विधि
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार मानी जाती है—
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के मंदिर या पूजा स्थल की सफाई करें।
- भगवान विष्णु और भगवान नृसिंह की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- दीपक जलाकर पूजा का प्रारंभ करें।
- भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
- फल, पंचामृत और सात्विक नैवेद्य अर्पित करें।
- नृसिंह मंत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- नृसिंह कवच या श्रीमद्भागवत के संबंधित प्रसंग का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।
- अंत में आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि और सुरक्षा की प्रार्थना करें।
पूजा की विस्तृत विधि स्थानीय परंपराओं, परिवार की धार्मिक मान्यताओं और अपने गुरु या पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
नृसिंह जयंती क्या संदेश देती है?
भगवान नृसिंह की कथा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्यों की भी शिक्षा देती है।
यह पर्व बताता है कि—
- सत्य और धर्म की रक्षा अंततः होती है।
- अहंकार का अंत निश्चित है।
- अन्याय और अत्याचार अधिक समय तक टिक नहीं सकते।
- सच्ची श्रद्धा और विश्वास व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी मजबूत बनाए रखते हैं।
- ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
इसी कारण नृसिंह जयंती को धर्म की विजय और अधर्म के अंत का प्रतीक पर्व माना जाता है।
किन मंदिरों में होती है विशेष पूजा?
देशभर के अनेक विष्णु और नृसिंह मंदिरों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई स्थानों पर भगवान का अभिषेक, विशेष श्रृंगार, हवन, भजन-कीर्तन, धार्मिक प्रवचन और प्रसाद वितरण का आयोजन होता है।
श्रद्धालु बड़ी संख्या में मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं और भगवान नृसिंह से अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक की गई पूजा का विशेष महत्व होता है। यदि आप भी नृसिंह जयंती का व्रत या पूजा करने की योजना बना रहे हैं, तो 30 अप्रैल 2026 को उदया तिथि के अनुसार पर्व मनाया जाएगा। प्रदोष काल में विधि-विधान से भगवान नृसिंह की आराधना करना विशेष शुभ माना जाता है। स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा के समय में क्षेत्रीय अंतर हो सकता है, इसलिए अपने नगर के पंचांग या विद्वान पुरोहित से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।




