कैबिनेट बैठक में कितने मंत्री जरूरी? सुप्रीम कोर्ट में जज के सवाल पर SG और अफसर भी रह गए चुप

कैबिनेट बैठक में कितने मंत्री जरूरी? सुप्रीम कोर्ट में जज के सवाल पर SG और अफसर भी रह गए चुप

सुप्रीम कोर्ट में कैबिनेट बैठक के कोरम पर उठा सवाल, आखिर कितने मंत्रियों की मौजूदगी जरूरी होती है? जानिए संविधान और नियम क्या कहते हैं

सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान पूछा गया एक सवाल इन दिनों कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालत में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल और उपस्थित वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा कि कैबिनेट बैठक (Cabinet Meeting) के लिए न्यूनतम कितने मंत्रियों की उपस्थिति आवश्यक होती है। दूसरे शब्दों में, कैबिनेट बैठक का कोरम (Quorum) क्या है?

बताया जाता है कि सवाल सुनते ही कुछ समय के लिए अदालत में सन्नाटा छा गया। मौजूद अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस प्रश्न पर विचार किया, लेकिन तत्काल कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया। बाद में इस घटनाक्रम से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किया जाने लगा, जिसके बाद आम लोगों के बीच भी यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या वास्तव में भारतीय संविधान में कैबिनेट बैठकों के लिए किसी न्यूनतम संख्या का उल्लेख किया गया है।

यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश लोगों को लगता है कि जिस प्रकार संसद की कार्यवाही के लिए संविधान में कोरम निर्धारित किया गया है, उसी प्रकार मंत्रिमंडल की बैठकों के लिए भी कोई निश्चित संवैधानिक प्रावधान होगा। हालांकि संवैधानिक व्यवस्था और प्रशासनिक नियमों का अध्ययन करने पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

कोरम क्या होता है और इसका महत्व क्यों है?

किसी भी समिति, सदन या निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक वैध मानी जाए, इसके लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्यों की उपस्थिति को कोरम कहा जाता है। यदि निर्धारित कोरम पूरा नहीं होता तो सामान्यतः बैठक की कार्यवाही या निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं में कोरम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि महत्वपूर्ण निर्णय पर्याप्त प्रतिनिधित्व और भागीदारी के साथ लिए जाएं। संसद, विधानसभाओं, निगमों और विभिन्न संस्थाओं के अपने-अपने नियम होते हैं, जिनमें कई स्थानों पर कोरम स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है।

इसी कारण जब सुप्रीम कोर्ट में कैबिनेट बैठक के कोरम को लेकर प्रश्न पूछा गया, तो यह केवल कानूनी जिज्ञासा का विषय नहीं रहा बल्कि संवैधानिक व्यवस्था को समझने का भी महत्वपूर्ण अवसर बन गया।

क्या भारतीय संविधान में कैबिनेट बैठक के कोरम का उल्लेख है?

भारतीय संविधान का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि कैबिनेट बैठकों के लिए किसी निश्चित कोरम का उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है। संविधान यह नहीं बताता कि कैबिनेट बैठक वैध माने जाने के लिए कम से कम कितने मंत्रियों की उपस्थिति आवश्यक होगी।

यही कारण है कि इस विषय पर अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। कई लोग यह मान लेते हैं कि संसद की तरह मंत्रिमंडल के लिए भी कोई निश्चित प्रतिशत या संख्या निर्धारित होगी, जबकि संवैधानिक व्यवस्था में ऐसा प्रावधान उपलब्ध नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार कैबिनेट सरकार की कार्यपालिका का हिस्सा है और उसके संचालन की व्यवस्था अलग नियमों के माध्यम से निर्धारित की जाती है।

1950 के संविधान में ‘कैबिनेट’ शब्द ही नहीं था

एक रोचक तथ्य यह भी है कि जब 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था, तब उसमें ‘कैबिनेट’ शब्द का उल्लेख ही नहीं था। संविधान के अनुच्छेद 74 में केवल ‘मंत्रिपरिषद’ (Council of Ministers) का उल्लेख किया गया था, जो राष्ट्रपति को सलाह देने वाली संस्था है और जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं।

मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री तथा अन्य श्रेणी के मंत्री शामिल हो सकते हैं। संविधान ने मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी और उसकी भूमिका का उल्लेख किया, लेकिन कैबिनेट बैठकों की प्रक्रिया और कोरम के संबंध में कोई अलग व्यवस्था निर्धारित नहीं की।

इसलिए प्रारंभिक संवैधानिक व्यवस्था में कैबिनेट की कार्यप्रणाली प्रशासनिक नियमों और परंपराओं के आधार पर संचालित होती रही।

44वें संविधान संशोधन के बाद जुड़ा ‘कैबिनेट’ शब्द, लेकिन कोरम का प्रावधान आज भी नहीं

1978 में पहली बार संविधान में शामिल हुआ ‘कैबिनेट’

वर्ष 1978 में किए गए 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से पहली बार ‘कैबिनेट’ शब्द को भारतीय संविधान में जोड़ा गया। यह संशोधन मुख्य रूप से राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित अनुच्छेद 352 में किया गया था।

संशोधन के बाद यह व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तभी करेंगे जब प्रधानमंत्री और कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की ओर से लिखित रूप में इसकी सिफारिश की जाएगी। इस बदलाव का उद्देश्य आपातकाल जैसी गंभीर संवैधानिक प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह और संस्थागत बनाना था।

हालांकि इस संशोधन में भी कैबिनेट बैठकों के लिए किसी न्यूनतम उपस्थिति या कोरम का उल्लेख नहीं किया गया।

संसद और कैबिनेट के नियमों में क्या अंतर है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 100(3) में संसद के दोनों सदनों के लिए स्पष्ट रूप से कोरम का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार किसी भी सदन की कार्यवाही चलाने के लिए कुल सदस्यों का कम से कम दस प्रतिशत उपस्थित होना आवश्यक माना जाता है।

यदि निर्धारित कोरम पूरा नहीं होता तो सदन की कार्यवाही स्थगित की जा सकती है या आवश्यक प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसलिए संसद में कोरम एक स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।

इसके विपरीत कैबिनेट सरकार की कार्यपालिका का आंतरिक निर्णय लेने वाला निकाय है। इसी कारण उसके लिए संसद जैसी संवैधानिक कोरम व्यवस्था निर्धारित नहीं की गई है।

कैबिनेट बैठकों का संचालन किन नियमों से होता है?

कैबिनेट बैठकों और केंद्र सरकार के प्रशासनिक कार्यों का संचालन मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 77(3) तथा Government of India (Transaction of Business) Rules, 1961 के तहत किया जाता है।

इन नियमों में विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों का बंटवारा, प्रस्तावों की प्रक्रिया, मंत्रियों के बीच जिम्मेदारियों का वितरण और कैबिनेट सचिवालय की भूमिका निर्धारित की गई है।

कैबिनेट सचिवालय इन्हीं नियमों के आधार पर बैठकों का समन्वय करता है और विभिन्न मंत्रालयों के प्रस्तावों को कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया संचालित करता है।

क्या ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स में कोरम निर्धारित है?

Government of India (Transaction of Business) Rules, 1961 का अध्ययन करने पर भी यह स्पष्ट होता है कि इनमें कैबिनेट बैठकों के लिए किसी निश्चित कोरम का उल्लेख नहीं किया गया है।

आमतौर पर जिस विषय या मंत्रालय से संबंधित प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष रखा जाना होता है, उस विभाग के मंत्री की उपस्थिति अपेक्षित मानी जाती है। यदि संबंधित मंत्री किसी कारणवश बैठक में उपस्थित नहीं हो पाते, तो परिस्थितियों के अनुसार प्रधानमंत्री की अनुमति अथवा अन्य स्वीकृत प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्णय आगे बढ़ाए जा सकते हैं।

हालांकि प्रत्येक निर्णय का स्वरूप, विषय और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, इसलिए व्यवहारिक स्तर पर कैबिनेट सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार बैठक का संचालन करते हैं।

कैबिनेट बैठकों में निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती है?

कैबिनेट सरकार के सामूहिक निर्णय लेने की सर्वोच्च कार्यकारी संस्था मानी जाती है। सामान्यतः किसी नीति, विधेयक, अंतरराष्ट्रीय समझौते, प्रशासनिक सुधार या महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय को अंतिम मंजूरी देने से पहले संबंधित मंत्रालय विस्तृत कैबिनेट नोट तैयार करता है।

इस नोट पर विभिन्न मंत्रालयों से टिप्पणियां प्राप्त की जाती हैं और आवश्यक विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष रखा जाता है। बैठक के दौरान संबंधित मंत्री प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं तथा अन्य मंत्री उस पर चर्चा कर अपनी राय रखते हैं।

चूंकि यह प्रक्रिया प्रशासनिक नियमों के अनुसार संचालित होती है, इसलिए व्यवहारिक निर्णय परिस्थितियों, विषय की प्रकृति और सरकार की आंतरिक कार्यप्रणाली के अनुसार लिए जाते हैं।

सोशल मीडिया पर क्यों शुरू हुई बहस?

सुप्रीम कोर्ट में पूछे गए इस प्रश्न का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। अनेक लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि यदि संसद के लिए कोरम निर्धारित है तो कैबिनेट के लिए ऐसा प्रावधान क्यों नहीं है।

कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस अवसर पर स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान और प्रशासनिक नियमों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। संसद एक विधायी संस्था है, जबकि कैबिनेट कार्यपालिका का हिस्सा है और उसकी कार्यप्रणाली अलग संवैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है।

इसी कारण वर्तमान संवैधानिक ढांचे में कैबिनेट बैठकों के लिए किसी निश्चित न्यूनतम संख्या का स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं है, जबकि बैठकों का संचालन स्थापित प्रशासनिक नियमों, परंपराओं और सरकारी प्रक्रियाओं के अनुरूप किया जाता है।