आज से शुरू हुई RBI की अहम MPC बैठक, 5 जून को आएगा ब्याज दरों पर फैसला

आज से शुरू हुई RBI की अहम MPC बैठक, 5 जून को आएगा ब्याज दरों पर फैसला

RBI मॉनेटरी पॉलिसी बैठक शुरू, रेपो रेट पर बाजार की नजरें; 5 जून को आएगा फैसला

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिवसीय बैठक 3 जून से शुरू हो गई है। यह बैठक देश की मौद्रिक नीति और ब्याज दरों की दिशा तय करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक 5 जून तक चलेगी, जिसके बाद RBI गवर्नर समिति द्वारा लिए गए फैसलों की घोषणा करेंगे।

मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार केंद्रीय बैंक रेपो रेट में कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकता है। संभावना जताई जा रही है कि RBI वर्तमान रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत के स्तर पर बनाए रख सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय महंगाई, आर्थिक विकास, वैश्विक परिस्थितियों और बाजार की स्थिति को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा।

RBI की मौद्रिक नीति बैठक पर उद्योग जगत, बैंकिंग सेक्टर, निवेशकों और आम लोगों की नजरें बनी हुई हैं, क्योंकि ब्याज दरों में बदलाव का सीधा असर होम लोन, ऑटो लोन, पर्सनल लोन और बचत योजनाओं पर पड़ता है।

हर दो महीने में होती है मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक

भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी देश की ब्याज दरों और मौद्रिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेती है। इस समिति में कुल छह सदस्य होते हैं। इनमें तीन सदस्य RBI की ओर से शामिल होते हैं, जबकि तीन सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।

MPC की बैठक आमतौर पर हर दो महीने में आयोजित की जाती है। इन बैठकों में देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई दर, विकास दर, तरलता की स्थिति और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रमों का विश्लेषण किया जाता है। इसके आधार पर रेपो रेट और अन्य नीतिगत दरों को लेकर निर्णय लिया जाता है।

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित छह मौद्रिक नीति बैठकों में यह दूसरी बैठक है। इससे पहले अप्रैल में पहली बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें आर्थिक परिस्थितियों और बाजार की स्थिति की समीक्षा की गई थी।

RBI के फैसलों का असर आम लोगों और बाजार पर पड़ता है

मौद्रिक नीति के फैसले केवल बैंकिंग क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। यदि RBI ब्याज दरों में बदलाव करता है तो इसका असर बैंकों की ऋण दरों, निवेश गतिविधियों और उपभोक्ता खर्च पर पड़ सकता है।

रेपो रेट में कटौती होने पर बैंकों को RBI से कम लागत पर धन उपलब्ध होता है। ऐसे में बैंक ग्राहकों को कम ब्याज दर पर ऋण देने की स्थिति में आ सकते हैं। इससे घर खरीदने, वाहन खरीदने और कारोबार में निवेश करने वाले लोगों को राहत मिल सकती है।

वहीं, यदि रेपो रेट बढ़ाया जाता है तो कर्ज महंगा हो सकता है और बाजार में नकदी की उपलब्धता कम हो सकती है। RBI आमतौर पर महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सहारा लेता है।

पिछले साल RBI ने कई बार बदली ब्याज दरों की दिशा

साल 2025 के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने के उद्देश्य से रेपो रेट में कई बदलाव किए थे। उस दौरान केंद्रीय बैंक ने विकास को गति देने और वित्तीय परिस्थितियों को आसान बनाने के लिए ब्याज दरों में कटौती का रास्ता अपनाया।

फरवरी 2025 में RBI ने रेपो रेट को 6.50 प्रतिशत से घटाकर 6.25 प्रतिशत किया था। यह कटौती लगभग पांच वर्षों के अंतराल के बाद हुई थी और इसे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

इसके बाद अप्रैल में 0.25 प्रतिशत, जून में 0.50 प्रतिशत और दिसंबर में 0.25 प्रतिशत की अतिरिक्त कटौती की गई। इन बदलावों के बाद रेपो रेट घटकर 5.25 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया।

रेपो रेट क्या है और इसका अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?

रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक देश के वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। यह दर बैंकिंग प्रणाली में पैसे की लागत को प्रभावित करती है और इसके आधार पर बैंक अपने ग्राहकों के लिए ऋण की ब्याज दरें तय करते हैं।

जब देश में महंगाई बढ़ने लगती है, तो RBI रेपो रेट बढ़ाकर बाजार में उपलब्ध नकदी को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। ब्याज दर बढ़ने से बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो जाता है, जिसके बाद बैंक भी ग्राहकों के लिए लोन की दरें बढ़ा सकते हैं।

महंगे कर्ज के कारण लोगों का खर्च और कंपनियों का निवेश कम हो सकता है। इससे मांग में कमी आती है और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

आर्थिक सुस्ती में रेपो रेट कटौती से मिलती है राहत

जब अर्थव्यवस्था में सुस्ती दिखाई देती है या विकास की गति कमजोर पड़ती है, तब RBI ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। कम रेपो रेट से बैंकों को सस्ता धन मिलता है और वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करा सकते हैं।

इससे घर, वाहन और कारोबार से जुड़े कर्ज की मांग बढ़ सकती है। साथ ही बाजार में निवेश और उपभोक्ता खर्च को बढ़ावा मिलता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिल सकती है।

हालांकि RBI को ब्याज दरों का फैसला लेते समय विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना होता है। यही कारण है कि MPC हर बैठक में आर्थिक आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करती है।

इस बार रेपो रेट पर क्या हो सकता है फैसला?

अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में रेपो रेट में बड़ी कटौती की संभावना कम दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI महंगाई के स्तर, आर्थिक विकास की गति और वैश्विक बाजार की स्थिति को देखते हुए सावधानीपूर्वक निर्णय ले सकता है।

यदि RBI रेपो रेट को स्थिर रखता है, तो यह संकेत होगा कि केंद्रीय बैंक मौजूदा ब्याज दरों को अर्थव्यवस्था के लिए संतुलित मान रहा है। वहीं, किसी भी बदलाव का सीधा असर बैंकिंग सेक्टर और वित्तीय बाजारों पर दिखाई देगा।

5 जून के फैसले पर टिकी हैं बाजार और उपभोक्ताओं की नजरें

RBI MPC बैठक के परिणाम का इंतजार निवेशकों, उद्योग जगत और आम उपभोक्ताओं को है। खासतौर पर बैंकिंग, रियल एस्टेट और ऑटो सेक्टर से जुड़े लोग इस फैसले को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

मौद्रिक नीति का अंतिम निर्णय देश की आर्थिक दिशा, महंगाई नियंत्रण और विकास की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा। 5 जून को RBI गवर्नर द्वारा की जाने वाली घोषणा से यह स्पष्ट होगा कि केंद्रीय बैंक आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर किस रणनीति के साथ आगे बढ़ेगा।