परमा एकादशी 11 जून को: अधिक मास में मिलने वाला दुर्लभ व्रत, तीन साल बाद 2029 में आएगा यह अवसर

परमा एकादशी 11 जून को: अधिक मास में मिलने वाला दुर्लभ व्रत, तीन साल बाद 2029 में आएगा यह अवसर

11 जून, गुरुवार को अधिक ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पड़ रही है। इस विशेष एकादशी को परमा एकादशी, पुरुषोत्तमी एकादशी और कमला एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसका संबंध अधिक मास से होता है। अधिक मास हर तीन वर्ष के आसपास आता है, इसलिए यह एकादशी भी सामान्य एकादशी की तरह हर वर्ष नहीं आती। इस बार के बाद श्रद्धालुओं को इस व्रत के लिए वर्ष 2029 तक इंतजार करना होगा, जब 9 अप्रैल को पुनः परमा एकादशी का संयोग बनेगा।

हिंदू धर्मग्रंथों में इस व्रत को पापों के नाश, आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति देने वाला बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमों के साथ इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करता है, उसके जीवन की अनेक बाधाएं दूर हो सकती हैं। इसी कारण वैष्णव परंपरा में इस एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है।

अधिक मास में बढ़ जाता है व्रत का महत्व

अधिक मास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना जाता है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इसी वजह से इस महीने में आने वाली एकादशी का महत्व सामान्य एकादशी की तुलना में अधिक बताया गया है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस दिन किए गए जप, तप, दान, व्रत और पूजा का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि परमा एकादशी का व्रत केवल सांसारिक सुख ही नहीं देता, बल्कि व्यक्ति के आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करने की परंपरा प्रचलित है।

भविष्योत्तर पुराण में मिलता है उल्लेख

परमा एकादशी का वर्णन भविष्योत्तर पुराण के एकादशी माहात्म्य अध्याय में मिलता है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा और विधि के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली यह एकादशी विशेष फल प्रदान करने वाली है।

कथा के दौरान श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण दंपती और एक ऋषि का प्रसंग सुनाकर इस व्रत के प्रभाव को समझाया। यही कथा आगे चलकर परमा एकादशी की प्रमुख कथा के रूप में प्रसिद्ध हुई।

ऐसे की जाती है भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की पूजा

धार्मिक मान्यता के अनुसार परमा एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस अवसर पर भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की पूजा का विशेष विधान बताया गया है। इस रूप में भगवान चार भुजाओं वाले माने गए हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल सुशोभित रहते हैं।

पूजा के दौरान दीपक जलाकर धूप, पुष्प, तुलसी दल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा और स्वास्थ्य के अनुसार निर्जल व्रत या फलाहार व्रत रख सकते हैं। पूरे दिन सात्विकता और संयम का पालन करने की सलाह दी जाती है। शाम के समय विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भगवद्गीता का अध्ययन, एकादशी कथा का श्रवण और भगवान विष्णु के मंत्रों का जप शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण भी करते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण कर व्रत का समापन किया जाता है। साथ ही जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करने की भी परंपरा है।

सुमेधा और पवित्रा की प्रेरक कथा

परमा एकादशी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा काम्पिल्य नगर के एक ब्राह्मण दंपती की है। वहां सुमेधा नाम के ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहते थे। दोनों धर्मपरायण और अतिथि सेवा में विश्वास रखने वाले थे, लेकिन आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। गरीबी इतनी अधिक थी कि कई बार उन्हें जीवन-यापन में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

एक समय सुमेधा ने यह सोचकर दूसरे प्रदेश जाने का विचार किया कि शायद कहीं बाहर जाकर धन कमाया जा सके। लेकिन उनकी पत्नी पवित्रा ने उन्हें समझाया कि केवल स्थान बदलने से भाग्य नहीं बदलता। उन्होंने धर्म और सदाचार का मार्ग अपनाने की बात कही और धैर्य रखने की सलाह दी। कुछ समय बाद उनके घर कौण्डिन्य ऋषि पधारे। आर्थिक अभाव के बावजूद दंपती ने पूरी श्रद्धा से ऋषि का स्वागत और सेवा की। उनकी विनम्रता और भक्ति देखकर ऋषि प्रसन्न हुए।

ऋषि ने बताया दरिद्रता दूर करने का उपाय

सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि ने उनसे वर मांगने को कहा। तब पवित्रा ने अपनी गरीबी और कष्टों का उल्लेख करते हुए ऐसा उपाय पूछा जिससे उनके जीवन की परेशानियां दूर हो सकें।

कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें अधिक मास की कृष्ण पक्ष एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह परमा एकादशी कहलाती है और भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। यदि श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा, दान और रात्रि जागरण किया जाए तो व्यक्ति के जीवन से दुख, पाप और दरिद्रता दूर हो सकती है। ऋषि के निर्देशानुसार सुमेधा और पवित्रा ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ परमा एकादशी का पालन किया। कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगे और आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।

व्रत के बाद बदली किस्मत

धार्मिक कथा में वर्णन मिलता है कि कुछ समय बाद एक राजकुमार उनके जीवन में सहायता का कारण बना। उसने उन्हें रहने के लिए सुंदर घर उपलब्ध कराया और जीवनयापन के लिए एक गांव भी प्रदान किया। इससे उनकी आर्थिक समस्याएं समाप्त हो गईं। सुमेधा और पवित्रा ने प्राप्त समृद्धि का उपयोग धर्म और सेवा कार्यों में किया। जीवनभर भगवान विष्णु की भक्ति करते हुए उन्होंने सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। कथा के अनुसार अंत समय में उन्हें भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति हुई।

कुबेर और राजा हरिश्चंद्र का भी मिलता है उल्लेख

परमा एकादशी की महिमा बताते समय कौण्डिन्य ऋषि ने अन्य उदाहरणों का भी जिक्र किया है। धार्मिक कथाओं में कहा गया है कि धन के देवता कुबेर ने भी इस व्रत का पालन किया था। व्रत के पुण्य प्रभाव से उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष और धनाध्यक्ष पद प्राप्त हुआ।

इसी प्रकार सत्य और धर्म के प्रतीक माने जाने वाले राजा हरिश्चंद्र का भी उल्लेख मिलता है। कथाओं के अनुसार कठिन परिस्थितियों और दुखों से गुजर रहे हरिश्चंद्र ने इस व्रत का पालन किया था, जिससे उनके जीवन में सुख और सम्मान की पुनः प्राप्ति हुई। हालांकि श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई मुख्य कथा में सुमेधा और पवित्रा की कहानी प्रमुख रूप से वर्णित है, लेकिन कुबेर और हरिश्चंद्र के उदाहरणों के माध्यम से इस व्रत की महिमा को और अधिक स्पष्ट किया गया है।

श्रद्धा, संयम और भक्ति का पर्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परमा एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और सेवा का विशेष अवसर है। अधिक मास में आने वाली यह दुर्लभ तिथि भक्तों को भगवान विष्णु की आराधना के माध्यम से आध्यात्मिक और मानसिक शांति प्राप्त करने का संदेश देती है। यही कारण है कि वैष्णव परंपरा में इस एकादशी को विशेष आदर और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। 11 जून को पड़ने वाली यह तिथि भक्तों के लिए धार्मिक साधना और पुण्य अर्जित करने का महत्वपूर्ण अवसर मानी जा रही है।

(Photo : AI Generated)