ITR भरने वालों के लिए महत्वपूर्ण अपडेट
देशभर में आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने वाले करोड़ों करदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अनिवार्य स्क्रूटनी (Mandatory Scrutiny) से संबंधित नई गाइडलाइन जारी की है। इन दिशा-निर्देशों के माध्यम से आयकर विभाग यह निर्धारित करेगा कि किन करदाताओं के आयकर रिटर्न की विस्तृत जांच की जाएगी और किन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सत्यापन के लिए चुना जाएगा।
नई गाइडलाइन उन करदाताओं पर लागू होगी जिन्होंने वित्त वर्ष 2025-26 से संबंधित अपना आयकर रिटर्न दाखिल किया है। कर विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रक्रिया आयकर प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने, कर अनुपालन सुनिश्चित करने और संभावित कर चोरी की पहचान करने के उद्देश्य से लागू की जाती है।
आयकर विभाग हर वर्ष लाखों रिटर्न प्राप्त करता है, लेकिन उनमें से केवल कुछ मामलों को ही विस्तृत जांच के लिए चुना जाता है। यह चयन विशेष मानदंडों, जोखिम मूल्यांकन और उपलब्ध वित्तीय सूचनाओं के आधार पर किया जाता है। CBDT की नई गाइडलाइन यह स्पष्ट करती है कि किन परिस्थितियों में किसी करदाता का मामला अनिवार्य स्क्रूटनी के लिए चयनित हो सकता है।
क्या होती है आयकर स्क्रूटनी?
आयकर स्क्रूटनी वह प्रक्रिया है जिसके तहत आयकर विभाग करदाता द्वारा दाखिल किए गए रिटर्न की विस्तृत जांच करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि रिटर्न में घोषित आय, निवेश, खर्च, कर छूट, कटौतियां और अन्य वित्तीय जानकारी सही एवं पूर्ण हो।
स्क्रूटनी का मतलब यह नहीं है कि करदाता ने कोई गलती अवश्य की है। कई मामलों में यह केवल दस्तावेजों के सत्यापन और वित्तीय आंकड़ों के मिलान के लिए भी की जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रूटनी का मुख्य उद्देश्य करदाताओं को परेशान करना नहीं बल्कि कर कानूनों के सही अनुपालन को सुनिश्चित करना होता है। यदि विभाग को किसी रिटर्न में असामान्यता, विसंगति या आय छिपाने की आशंका दिखाई देती है तो वह उस मामले की गहन जांच कर सकता है।
नई गाइडलाइन क्यों महत्वपूर्ण है?
CBDT द्वारा जारी नई गाइडलाइन इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि किन मामलों को अनिवार्य रूप से जांच के लिए चुना जाएगा। इससे करदाताओं को पहले से यह समझने में मदद मिलेगी कि किन परिस्थितियों में उनका मामला आयकर विभाग की निगरानी में आ सकता है।
इसके अलावा नई व्यवस्था जोखिम-आधारित जांच और लक्षित निगरानी को भी मजबूत बनाती है। इससे विभाग अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा और बड़े कर विवादों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पाएगा।
तलाशी कार्रवाई वाले मामलों पर रहेगी विशेष नजर
नई गाइडलाइन के अनुसार वे करदाता सबसे पहले जांच के दायरे में आ सकते हैं जिनके यहां हाल के वर्षों में आयकर विभाग द्वारा तलाशी अभियान चलाया गया है।
यदि किसी व्यक्ति, कंपनी, साझेदारी फर्म या अन्य संस्था के यहां 1 अप्रैल 2024 या उसके बाद आयकर विभाग ने सर्च ऑपरेशन (Search Action) किया है, तो ऐसे मामलों को अनिवार्य स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
तलाशी कार्रवाई आमतौर पर तब की जाती है जब विभाग के पास कर चोरी, अघोषित संपत्ति या अघोषित आय से संबंधित विश्वसनीय जानकारी होती है। ऐसे मामलों में रिटर्न की गहन जांच लगभग निश्चित मानी जाती है।
सर्वे कार्रवाई वाले करदाता भी जांच के दायरे में
CBDT ने अपनी नई गाइडलाइन में सर्वे मामलों को भी विशेष महत्व दिया है। आयकर अधिनियम की धारा 133A के तहत विभाग किसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान या अन्य स्थान पर सर्वे कर सकता है।
यदि किसी करदाता के यहां 1 अप्रैल 2024 के बाद सर्वे किया गया है और उस दौरान वित्तीय अनियमितताओं, रिकॉर्ड में अंतर या अन्य संदिग्ध गतिविधियों के संकेत मिले हैं, तो उसके रिटर्न को स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
कर विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वे के दौरान एकत्र की गई जानकारी बाद में रिटर्न के आंकड़ों से मिलाई जाती है। यदि दोनों में अंतर पाया जाता है तो जांच और गहन हो सकती है।
धारा 148 के नोटिस वाले मामलों की होगी समीक्षा
आयकर अधिनियम की धारा 148 उन मामलों में लागू होती है जहां विभाग को लगता है कि करदाता की कुछ आय कराधान से बच गई है या उसका सही खुलासा नहीं किया गया है।
नई गाइडलाइन के अनुसार जिन करदाताओं को धारा 148 के तहत नोटिस जारी किए गए हैं, उनके मामलों को भी प्राथमिकता के आधार पर स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
विशेष रूप से वे मामले अधिक महत्वपूर्ण माने जाएंगे जो तलाशी या सर्वे कार्रवाई से जुड़े हुए हैं। हालांकि कुछ ऐसे मामले भी जांच के लिए चयनित हो सकते हैं जिनमें बिना सर्च या सर्वे के धारा 148 का नोटिस जारी किया गया हो और जिनका मूल्यांकन 31 मार्च 2027 तक पूरा किया जाना हो।
ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर भी फोकस
CBDT ने गैर-लाभकारी संस्थाओं, धर्मार्थ ट्रस्टों और धार्मिक संगठनों से संबंधित मामलों को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
यदि किसी संस्था की कर छूट संबंधी मान्यता रद्द कर दी गई है या उसे मिलने वाली कर छूट अस्वीकार कर दी गई है, लेकिन इसके बावजूद संस्था ने अपने आयकर रिटर्न में छूट का दावा किया है, तो उसका मामला स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
विशेष रूप से ITR-7 दाखिल करने वाली संस्थाओं के दावों की बारीकी से समीक्षा की जाएगी। विभाग यह जांच करेगा कि संस्था वास्तव में संबंधित कर छूट के लिए पात्र थी या नहीं।
पुराने कर विवाद भी बन सकते हैं जांच का आधार
नई गाइडलाइन में उन मामलों को भी शामिल किया गया है जिनमें पिछले वर्षों के मूल्यांकन के दौरान आयकर विभाग ने करदाता की आय में महत्वपूर्ण संशोधन किए थे।
यदि किसी करदाता की घोषित आय को पूर्व वर्षों में काफी बढ़ाया गया था और वही मुद्दा वर्तमान वर्ष के रिटर्न में भी मौजूद है, तो विभाग उस मामले को दोबारा जांच के लिए चुन सकता है।
इसका उद्देश्य बार-बार सामने आने वाली वित्तीय विसंगतियों की पहचान करना और कर अनुपालन सुनिश्चित करना है।
बड़े शहरों के लिए बदली गई राशि सीमा
CBDT ने स्क्रूटनी चयन से संबंधित राशि सीमा में भी बदलाव किया है।
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे जैसे प्रमुख महानगरों में विवादित राशि की सीमा अब 50 लाख रुपये कर दी गई है।
यदि किसी मामले में विवादित आय या कर प्रभाव 50 लाख रुपये से अधिक है और वही मुद्दा वर्तमान रिटर्न में भी मौजूद है, तो स्क्रूटनी की संभावना बढ़ जाती है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहले यह सीमा 25 लाख रुपये थी।
अन्य शहरों के लिए क्या है नियम?
महानगरों के अलावा देश के अन्य क्षेत्रों और शहरों के लिए यह सीमा 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
यदि विवादित राशि इस सीमा से अधिक है और मामला पहले से कर विवाद से जुड़ा हुआ है, तो विभाग उस रिटर्न की विस्तृत जांच कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटे कर विवादों वाले करदाताओं को कुछ राहत मिल सकती है जबकि विभाग बड़े और महत्वपूर्ण मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा।
कर चोरी से जुड़ी सूचना भी बन सकती है कारण
नई गाइडलाइन के अनुसार यदि किसी करदाता के बारे में कर चोरी से जुड़ी विश्वसनीय और सत्यापित जानकारी प्राप्त होती है, तो उसका मामला स्क्रूटनी के लिए चुना जा सकता है।
यह जानकारी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त हो सकती है, जिनमें शामिल हैं:
- पुलिस विभाग
- प्रवर्तन निदेशालय (ED)
- नियामक संस्थाएं
- वित्तीय खुफिया इकाइयां
- अन्य सरकारी एजेंसियां
यदि इन एजेंसियों से प्राप्त जानकारी कर चोरी या अघोषित आय की ओर संकेत करती है, तो आयकर विभाग विस्तृत जांच शुरू कर सकता है।
डिजिटल डेटा और वित्तीय लेन-देन पर बढ़ी निगरानी
पिछले कुछ वर्षों में आयकर विभाग ने डेटा एनालिटिक्स और तकनीक का उपयोग काफी बढ़ाया है।
अब विभाग बैंक खातों, उच्च मूल्य के लेन-देन, संपत्ति खरीद, शेयर बाजार निवेश, विदेशी लेन-देन और अन्य वित्तीय गतिविधियों से संबंधित डेटा का विश्लेषण करता है।
यदि रिटर्न में घोषित आय और उपलब्ध वित्तीय जानकारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो मामला जांच के लिए चयनित हो सकता है।
ईमानदार करदाताओं को क्यों नहीं घबराना चाहिए?
कर विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश ईमानदार करदाताओं को स्क्रूटनी से घबराने की आवश्यकता नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति ने अपनी आय सही तरीके से घोषित की है, सभी निवेशों और खर्चों का उचित रिकॉर्ड रखा है तथा वैध कर छूट का ही दावा किया है, तो सामान्यतः किसी प्रकार की समस्या नहीं होती।
स्क्रूटनी के दौरान विभाग केवल दस्तावेजों और दावों का सत्यापन करता है। यदि रिकॉर्ड सही हैं तो प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल रहती है।
करदाताओं को कौन-कौन से रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सभी करदाता निम्नलिखित दस्तावेज व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखें:
- फॉर्म 16 और फॉर्म 16A
- बैंक स्टेटमेंट
- निवेश संबंधी दस्तावेज
- बीमा पॉलिसी रिकॉर्ड
- संपत्ति खरीद-बिक्री के दस्तावेज
- पूंजीगत लाभ से जुड़े रिकॉर्ड
- व्यवसायिक खातों के दस्तावेज
- दान और कर छूट संबंधी प्रमाणपत्र
- टीडीएस और टीसीएस से संबंधित विवरण
इन दस्तावेजों की उपलब्धता किसी भी संभावित जांच के दौरान काफी मददगार साबित हो सकती है।
कर अनुपालन पर बढ़ रहा है जोर
CBDT की नई गाइडलाइन यह संकेत देती है कि आयकर विभाग कर अनुपालन को और मजबूत बनाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। विभाग का ध्यान अब केवल पारंपरिक जांच पर नहीं बल्कि डेटा-आधारित निगरानी, जोखिम विश्लेषण और लक्षित स्क्रूटनी पर भी है।
इसी कारण करदाताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे रिटर्न दाखिल करते समय प्रत्येक वित्तीय जानकारी का सही खुलासा करें, दस्तावेजों का उचित रिकॉर्ड बनाए रखें और केवल उन्हीं छूटों एवं कटौतियों का दावा करें जिनके लिए वे वास्तव में पात्र हैं। गलत जानकारी, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे या आय छिपाने जैसी गतिविधियां भविष्य में विस्तृत जांच और अतिरिक्त कर देनदारी का कारण बन सकती हैं।
(Photo : AI Generated)




