भारत अपनी वायु शक्ति को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़े कदम उठा रहा है। इसी क्रम में 114 मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद को लेकर फ्रांस के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है। इस पूरे मामले पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने ताजा जानकारी साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि अभी दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है और किसी भी अंतिम निर्णय की घोषणा उचित समय पर की जाएगी।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इस विषय पर मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि भारत की प्राथमिकता केवल रक्षा उपकरण खरीदना नहीं है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ाना भी है। उन्होंने दोहराया कि सरकार हर बड़े रक्षा समझौते में इस बात पर विशेष ध्यान दे रही है कि अधिकतम तकनीक, उत्पादन और विनिर्माण भारत के भीतर ही हो।
दरअसल, भारतीय वायु सेना पहले से ही फ्रांसीसी राफेल लड़ाकू विमानों का संचालन कर रही है। ऐसे में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है और इसी आधार पर भविष्य की आवश्यकताओं को लेकर भी बातचीत जारी है। हालांकि सरकार ने अभी तक यह नहीं बताया है कि प्रस्तावित 114 विमानों की खरीद के लिए अंतिम रूप से कौन-सा विकल्प चुना जाएगा, लेकिन राफेल को प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है।
विदेश सचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत ने रक्षा क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट रणनीति अपनाई है। इस रणनीति का केंद्र बिंदु ‘मेक इन इंडिया’ और घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना है। सरकार चाहती है कि विदेशी कंपनियां केवल तैयार उत्पाद बेचने तक सीमित न रहें, बल्कि भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर तकनीक विकसित करें और देश के भीतर उत्पादन इकाइयों को मजबूत बनाएं।
उन्होंने बताया कि भारत की सोच को-डेवलपमेंट, को-डिजाइन, को-प्रोडक्शन और को-मैन्युफैक्चरिंग जैसे मॉडल पर आधारित है। यानी भविष्य के रक्षा सौदों में केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय तकनीकी साझेदारी और संयुक्त उत्पादन को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे न केवल देश की सैन्य क्षमता बढ़ेगी बल्कि घरेलू उद्योग, रोजगार और तकनीकी विशेषज्ञता को भी बड़ा लाभ मिलेगा।
मिस्री ने कहा कि किसी भी रक्षा प्लेटफॉर्म का मूल्यांकन करते समय भारत यह देखता है कि उसमें स्थानीय स्तर पर कितना उत्पादन संभव है। सरकार का प्रयास है कि विदेशी रक्षा कंपनियां भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी कर यहां अधिक से अधिक पुर्जों और प्रणालियों का निर्माण करें। यही कारण है कि चल रही चर्चाओं में स्वदेशीकरण का मुद्दा प्रमुख रूप से शामिल है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत और फ्रांस के बीच केवल लड़ाकू विमानों को लेकर ही नहीं, बल्कि कई अन्य रणनीतिक और रक्षा संबंधी विषयों पर भी चर्चा हुई है। हालांकि राफेल और संभावित लड़ाकू विमान सौदे को लेकर मीडिया में विशेष रुचि है, लेकिन सरकार अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन कर रही है।
भारत लंबे समय से अपनी वायु सेना के बेड़े को आधुनिक बनाने की योजना पर काम कर रहा है। कई पुराने लड़ाकू विमान चरणबद्ध तरीके से सेवा से बाहर हो रहे हैं, जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए आधुनिक और बहुउद्देश्यीय विमानों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा दुनिया के सबसे बड़े सैन्य विमान खरीद कार्यक्रमों में शामिल हो सकता है। इसकी अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसलिए सरकार केवल विमान खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि इस निवेश का उपयोग भारत के रक्षा विनिर्माण ढांचे को मजबूत करने के लिए भी करना चाहती है।
सूत्रों के अनुसार, भारत ने इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न वैश्विक कंपनियों के विकल्पों पर विचार किया है। फ्रांस की ओर से राफेल लड़ाकू विमान को प्रमुख उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में फ्रांस को औपचारिक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (LoR) भी जारी किया है, जिससे बातचीत को औपचारिक दिशा मिली है।
विदेश सचिव ने कहा कि फिलहाल बातचीत और तकनीकी मूल्यांकन की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में किसी भी संभावित खरीद, अनुसंधान सहयोग या उत्पादन व्यवस्था के बारे में अंतिम टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि जब भी कोई ठोस प्रगति होगी, उसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा की जाएगी।
भारत की रक्षा नीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ा बदलाव देखा गया है। पहले जहां विदेशी हथियारों और प्लेटफॉर्म की सीधी खरीद पर अधिक जोर दिया जाता था, वहीं अब सरकार तकनीकी हस्तांतरण और घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दे रही है। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को एक प्रमुख रक्षा निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना है।
फ्रांस के साथ चल रही चर्चा भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। यदि भविष्य में कोई समझौता होता है, तो उसमें स्थानीय उत्पादन, भारतीय उद्योग की भागीदारी और तकनीकी सहयोग जैसे पहलुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की संभावना है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत और फ्रांस के बीच 114 लड़ाकू विमानों से जुड़े मुद्दे पर बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी बाकी है, लेकिन सरकार ने संकेत दिया है कि किसी भी रक्षा सौदे का मूल उद्देश्य भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ देश के भीतर रक्षा निर्माण क्षमता को मजबूत बनाना होगा।



