घाटे से जूझ रहे सरकारी होटलों को मिलेगा नया जीवन, हिमाचल सरकार ने निजी भागीदारी मॉडल की दिशा में बढ़ाया बड़ा कदम

घाटे से जूझ रहे सरकारी होटलों को मिलेगा नया जीवन, हिमाचल सरकार ने निजी भागीदारी मॉडल की दिशा में बढ़ाया बड़ा कदम

हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य पर्यटन विकास निगम (एचपीटीडीसी) की आर्थिक स्थिति को सुधारने और लंबे समय से घाटे में चल रही होटल इकाइयों को पुनर्जीवित करने के लिए महत्वपूर्ण फैसला लिया है। सरकार ने निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से पर्यटन निगम की चुनिंदा होटल संपत्तियों के संचालन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लगभग 50 लाख रुपये की कंसल्टेंसी राशि मंजूर कर दी है।

इस निर्णय के साथ राज्य में पर्यटन क्षेत्र से जुड़ी उन संपत्तियों के पुनर्गठन का रास्ता साफ हो गया है जो वर्षों से अपेक्षित आय नहीं दे पा रही थीं। सरकार का मानना है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के जरिए इन होटलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस कर उनकी व्यावसायिक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

आर्थिक संकट के कारण निगम ने जताई थी असमर्थता

राज्य पर्यटन विकास निगम लंबे समय से वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। निगम प्रबंधन ने सरकार को लिखित रूप से अवगत कराया था कि मौजूदा आर्थिक हालात में वह ट्रांजेक्शन एडवाइजर की नियुक्ति के लिए निर्धारित लगभग 49.56 लाख रुपये की फीस का भुगतान करने में सक्षम नहीं है।

प्रबंधन ने सुझाव दिया था कि या तो सरकार इस राशि की व्यवस्था करे अथवा भुगतान को किस्तों में करने का कोई विकल्प तलाशा जाए। इसके बाद सचिवालय स्तर पर पर्यटन निगम की वित्तीय स्थिति की समीक्षा की गई और विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के बाद राज्य सरकार ने स्वयं इस राशि को जारी करने का निर्णय लिया।

सरकार की मंजूरी के बाद निगम प्रबंधन को बड़ी राहत मिली है और अब होटल पुनर्गठन योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकेगा।

विशेषज्ञ एजेंसी करेगी पूरी प्रक्रिया का मार्गदर्शन

सरकार द्वारा स्वीकृत राशि का उपयोग लेनदेन सलाहकार यानी ट्रांजेक्शन एडवाइजर की सेवाएं लेने के लिए किया जाएगा। यह एजेंसी परियोजना की वित्तीय, तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया का अध्ययन कर निजी भागीदारी मॉडल के लिए उपयुक्त ढांचा तैयार करेगी।

पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन विभाग की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार इस भुगतान की व्यवस्था राज्य अवसंरचना विकास बोर्ड के माध्यम से की जाएगी। विशेषज्ञ एजेंसी होटलों के मूल्यांकन, संचालन मॉडल, निविदा प्रक्रिया और निवेशकों के चयन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग करेगी।

सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक संपत्तियों का उपयोग पारदर्शी और व्यावसायिक दृष्टिकोण से किया जाए ताकि राज्य को दीर्घकालिक लाभ मिल सके।

पहले चरण में आठ होटलों को निजी भागीदारी मॉडल पर सौंपने की तैयारी

राज्य पर्यटन विकास निगम के पास कुल 56 होटल और पर्यटन इकाइयां हैं। इनमें से 14 होटल लंबे समय से घाटे में चल रहे हैं और बार-बार प्रयासों के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया।

इसी कारण निगम के निदेशक मंडल ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद सरकार को सुझाव दिया था कि इन संपत्तियों के संचालन का नया मॉडल अपनाया जाए। सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए पहले चरण में आठ होटलों को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने का निर्णय लिया है।

इन होटलों का संचालन ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस (ओएंडएम) व्यवस्था के तहत किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि होटल के दैनिक संचालन, रखरखाव, सेवाओं के उन्नयन और प्रबंधन की जिम्मेदारी निजी भागीदार के पास होगी।

सरकार और निगम पर नहीं आएगा अतिरिक्त खर्च

नई व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह माना जा रहा है कि पर्यटन निगम को इन होटलों के संचालन पर अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ेगा।

वर्तमान में निगम को कर्मचारियों, रखरखाव, मरम्मत, बिजली, पानी और अन्य प्रशासनिक खर्चों पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। कई होटल पर्याप्त आय नहीं जुटा पा रहे थे, जिसके कारण निगम की वित्तीय स्थिति लगातार प्रभावित हो रही थी।

पीपीपी मॉडल लागू होने के बाद निजी भागीदार संचालन और रखरखाव का खर्च वहन करेगा। इससे निगम के संसाधनों पर दबाव कम होगा और वह अपनी अन्य लाभकारी परियोजनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा।

भविष्य की आय से वसूली जाएगी कंसल्टेंसी लागत

सरकार ने स्पष्ट किया है कि ट्रांजेक्शन एडवाइजर की नियुक्ति पर खर्च की जा रही राशि स्थायी वित्तीय बोझ नहीं बनेगी।

योजना के अनुसार पीपीपी मॉडल के माध्यम से होटलों के संचालन से जो राजस्व प्राप्त होगा, उसी से भविष्य में इस खर्च की भरपाई की जाएगी। यानी सरकार इसे निवेश के रूप में देख रही है, जिसका लाभ आने वाले वर्षों में प्राप्त होने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होटलों का सफलतापूर्वक आधुनिकीकरण और बेहतर प्रबंधन किया गया तो राज्य को नियमित राजस्व प्राप्त हो सकता है।

कोरोना काल के बाद नहीं संभल पाया पर्यटन निगम

हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम लंबे समय तक राज्य पर्यटन उद्योग का प्रमुख चेहरा रहा है। देश और विदेश से आने वाले पर्यटकों के बीच निगम के होटलों की विशेष पहचान रही है।

हालांकि कोविड-19 महामारी के दौरान पर्यटन गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं। इसके बाद पर्यटन क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार तो हुआ, लेकिन निगम की कई इकाइयां आर्थिक रूप से पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकीं।

निजी होटल श्रृंखलाओं और आधुनिक आतिथ्य सेवाओं से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भी निगम की चुनौतियों को बढ़ाया। कई स्थानों पर निजी क्षेत्र ने बेहतर सुविधाएं, आधुनिक प्रबंधन और आक्रामक विपणन रणनीतियों के जरिए बाजार में मजबूत पकड़ बना ली।

इसके विपरीत सरकारी ढांचे में संचालित होटल अपेक्षित गति से बदलाव नहीं कर पाए, जिससे उनकी आय प्रभावित होती रही।

कौन-कौन से होटल होंगे शामिल?

पहले चरण में जिन होटलों को पीपीपी मॉडल पर देने की योजना बनाई गई है, उनमें राज्य के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर स्थित प्रमुख संपत्तियां शामिल हैं।

बिलासपुर जिले में स्थित होटल लेक व्यू, जो गोबिंद सागर झील क्षेत्र में पर्यटकों के बीच लोकप्रिय माना जाता है, इस सूची में शामिल है। इस होटल में लगभग 25 कमरे उपलब्ध हैं।

मंडी जिले का होटल ममलेश्वर भी निजी भागीदारी मॉडल के लिए चयनित संपत्तियों में शामिल किया गया है। धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में स्थित होटल में लगभग 10 कमरे हैं।

राजधानी शिमला में स्थित होटल एप्पल ब्लॉसम भी इस सूची का हिस्सा है। यह होटल अपने स्थान और पर्यटन संभावनाओं के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसके अतिरिक्त कुल्लू का होटल सरवरी, कसौली का होटल ओल्ड रोसकॉमन, परवाणू का होटल शिवालिक तथा रोहड़ू क्षेत्र के होटल चांशल और होटल गिरिगंगा को भी पहले चरण की योजना में शामिल किया गया है।

पर्यटन ढांचे को आधुनिक बनाने की कोशिश

सरकार का मानना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी से इन होटलों में आधुनिक सुविधाओं का विकास होगा। इससे पर्यटकों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी और राज्य की पर्यटन छवि को भी मजबूती मिलेगी।

निजी निवेशक आमतौर पर होटलों में तकनीकी उन्नयन, आधुनिक कमरे, बेहतर भोजन व्यवस्था, डिजिटल बुकिंग सिस्टम, प्रचार-प्रसार और ग्राहक सेवाओं में सुधार पर विशेष ध्यान देते हैं। इससे होटल की व्यावसायिक क्षमता बढ़ सकती है।

यदि यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में अन्य घाटे वाले पर्यटन प्रतिष्ठानों के लिए भी इसी तरह की रणनीति अपनाई जा सकती है।

विपक्ष और कर्मचारियों की नजर भी इस प्रक्रिया पर

हालांकि सरकार इस निर्णय को आर्थिक सुधार और व्यावसायिक पुनर्गठन का कदम बता रही है, लेकिन इस प्रक्रिया पर विभिन्न पक्षों की नजर बनी हुई है।

कर्मचारी संगठनों और कुछ सामाजिक समूहों की चिंता यह है कि निजी भागीदारी के दौरान कर्मचारियों के हित सुरक्षित रहने चाहिए। वहीं सरकार का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमों और पारदर्शिता के साथ पूरी की जाएंगी तथा राज्य के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

पर्यटन अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। लाखों पर्यटक हर वर्ष राज्य के पर्वतीय स्थलों, धार्मिक केंद्रों और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों का रुख करते हैं।

ऐसे में सरकार चाहती है कि राज्य की पर्यटन संपत्तियां केवल विरासत का हिस्सा बनकर न रहें, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी मजबूत और आत्मनिर्भर बनें।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चयनित होटलों का संचालन पेशेवर तरीके से किया गया और पर्यटन बाजार की जरूरतों के अनुरूप सुविधाएं विकसित की गईं, तो यह पहल राज्य के पर्यटन क्षेत्र में एक बड़े सुधार की शुरुआत साबित हो सकती है।

अब ट्रांजेक्शन एडवाइजर की नियुक्ति और आगे की निविदा प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि निजी क्षेत्र इस परियोजना में कितना निवेश करता है और घाटे में चल रही इन सरकारी संपत्तियों को लाभदायक इकाइयों में बदलने की योजना कितनी सफल साबित होती है।