मनरेगा की जगह नई रोजगार नीति की तैयारी: हिमाचल में 1 जुलाई से लागू हो सकता है ‘वीबी-जीरामजी मिशन’, वित्तीय बोझ को लेकर उठे सवाल

मनरेगा की जगह नई रोजगार नीति की तैयारी: हिमाचल में 1 जुलाई से लागू हो सकता है ‘वीबी-जीरामजी मिशन’, वित्तीय बोझ को लेकर उठे सवाल

हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राज्य सरकार केंद्र द्वारा प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (वीबी-जीरामजी) को लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इस नई योजना को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश सरकार ने योजना का विस्तृत मसौदा तैयार कर लिया है और कानूनी परीक्षण के लिए विधि विभाग को भेज दिया है। विभागीय मंजूरी मिलने के बाद इसे मंत्रिमंडल की बैठक में रखा जाएगा, जहां अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

सरकार का लक्ष्य इस नई योजना को 1 जुलाई से लागू करना है। हालांकि, योजना को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस जारी है। खासकर वित्तीय हिस्सेदारी और रोजगार उपलब्धता से जुड़े मुद्दों पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

ग्रामीण रोजगार ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी

मनरेगा पिछले कई वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की सबसे बड़ी योजना रही है। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाती है और इसका अधिकांश वित्तीय भार केंद्र सरकार उठाती है।

अब प्रस्तावित वीबी-जीरामजी योजना केवल मजदूरी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे आजीविका आधारित विकास कार्यक्रम के रूप में विकसित किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूती मिलेगी और लोगों को रोजगार के साथ-साथ आय बढ़ाने के अवसर भी प्राप्त होंगे।

नई योजना में रोजगार सृजन के अलावा कृषि, बागवानी, जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के विकास और ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण पर विशेष फोकस रखा गया है।

सालाना 1800 करोड़ रुपये तक मिलने की संभावना

ग्रामीण विकास विभाग के अनुमान के अनुसार नई योजना लागू होने के बाद हिमाचल प्रदेश को हर वर्ष मजदूरी और सामग्री मद के तहत लगभग 1600 करोड़ से 1800 करोड़ रुपये तक की राशि प्राप्त हो सकती है।

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि इस फंड का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास, रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा।

हालांकि योजना के समर्थकों का तर्क है कि इससे ग्रामीण विकास परियोजनाओं को नई गति मिलेगी, लेकिन आलोचक इसके वित्तीय ढांचे को लेकर चिंतित हैं।

सबसे बड़ा विवाद: राज्य को देना होगा 10 प्रतिशत योगदान

नई योजना को लेकर सबसे अधिक विरोध उसके वित्तीय मॉडल को लेकर सामने आ रहा है।

मनरेगा के तहत केंद्र सरकार अधिकांश खर्च वहन करती है और राज्यों पर अपेक्षाकृत कम वित्तीय दबाव पड़ता है। जबकि वीबी-जीरामजी योजना में केंद्र और राज्यों की साझेदारी का मॉडल अपनाया गया है, जिसके तहत राज्य सरकारों को भी 10 प्रतिशत तक वित्तीय योगदान देना होगा।

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह अतिरिक्त खर्च महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारी आकलनों के अनुसार राज्य को हर वर्ष लगभग 160 करोड़ रुपये या उससे अधिक का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ सकता है।

राज्य सरकार का कहना है कि पहले से आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हिमाचल के लिए यह अतिरिक्त बोझ चिंता का विषय है। यही कारण है कि कांग्रेस और प्रदेश सरकार के कई प्रतिनिधि इस मॉडल पर अपनी आपत्तियां पहले भी दर्ज कर चुके हैं।

मजदूरों के रोजगार पर भी उठ रहे सवाल

योजना के विरोध का दूसरा बड़ा कारण ग्रामीण श्रमिकों के रोजगार दिवसों को लेकर है।

हालांकि योजना में पात्र परिवारों को अधिकतम 150 दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान रखा गया है, लेकिन इसके साथ कुछ नई शर्तें भी जोड़ी गई हैं।

योजना के अनुसार कृषि और बागवानी सीजन के दौरान श्रमिकों को विशेष अवकाश दिया जाएगा ताकि खेतों और बागानों में श्रम की कमी न हो। सरकार का मानना है कि खेती के महत्वपूर्ण समय में मजदूरों का सरकारी योजनाओं में व्यस्त रहना कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि लंबे समय तक कार्य स्थगित रहता है तो कई परिवारों को निर्धारित 150 दिनों का रोजगार प्राप्त नहीं हो पाएगा। इससे उन ग्रामीण परिवारों की आय प्रभावित हो सकती है जो मुख्य रूप से सरकारी रोजगार योजनाओं पर निर्भर रहते हैं।

कृषि और बागवानी को प्राथमिकता

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि और बागवानी पर आधारित है। सेब उत्पादन, सब्जी खेती और अन्य बागवानी गतिविधियां लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं।

नई योजना में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि सरकारी रोजगार कार्यक्रमों के कारण खेती-बाड़ी प्रभावित न हो। इसी उद्देश्य से बुवाई, रोपाई, कटाई और बागवानी के व्यस्त मौसम में विशेष अवकाश की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।

सरकार का मानना है कि इससे किसानों को समय पर श्रमिक उपलब्ध होंगे और कृषि उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर मजदूर संगठनों का कहना है कि इस व्यवस्था से रोजगार के दिनों में कमी आ सकती है।

डिजिटल निगरानी पर रहेगा जोर

वीबी-जीरामजी योजना में तकनीक के उपयोग को विशेष महत्व दिया गया है।

योजना के तहत कार्यस्थलों पर श्रमिकों की उपस्थिति डिजिटल माध्यम से दर्ज की जाएगी। इसके लिए मोबाइल आधारित एप्लीकेशन और ऑनलाइन निगरानी तंत्र का उपयोग किया जा सकता है।

सरकार का दावा है कि इससे फर्जी उपस्थिति, भुगतान में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की संभावनाओं पर अंकुश लगेगा। साथ ही वास्तविक लाभार्थियों तक योजना का लाभ पहुंचाना आसान होगा।

हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता को लेकर भी कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं।

सामाजिक ऑडिट से बढ़ेगी जवाबदेही

योजना के अंतर्गत सभी कार्यों का नियमित सामाजिक ऑडिट कराया जाएगा।

सामाजिक ऑडिट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजनाओं पर खर्च होने वाला धन पारदर्शी तरीके से उपयोग हो और स्थानीय समुदाय भी इसकी निगरानी में भागीदारी करे।

सरकार का मानना है कि इससे योजना में पारदर्शिता बढ़ेगी और ग्रामीण विकास कार्यों की गुणवत्ता में सुधार होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सामाजिक ऑडिट को प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर लोगों का विश्वास और मजबूत हो सकता है।

मनरेगा और वीबी-जीरामजी में क्या होगा अंतर?

मनरेगा मुख्य रूप से ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने पर केंद्रित रही है। वहीं नई योजना रोजगार के साथ आजीविका विकास को भी जोड़ने का प्रयास करती है।

नई व्यवस्था में ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण, कृषि उत्पादकता बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करने पर विशेष बल दिया जाएगा।

योजना का उद्देश्य केवल मजदूरी देना नहीं बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाने का भी है।

हालांकि यह लक्ष्य कितना सफल होगा, इसका वास्तविक आकलन योजना लागू होने के बाद ही संभव होगा।

कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार

वर्तमान में योजना का मसौदा विधि विभाग के पास विचाराधीन है। कानूनी परीक्षण पूरा होने के बाद इसे राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।

यदि मंत्रिमंडल से मंजूरी मिल जाती है तो हिमाचल प्रदेश 1 जुलाई से नई रोजगार एवं आजीविका योजना लागू करने वाले राज्यों में शामिल हो सकता है।

सरकार इसे ग्रामीण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और विभिन्न संगठनों का कहना है कि वित्तीय बोझ और रोजगार सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का समाधान किए बिना योजना को लागू करना जल्दबाजी हो सकती है।

आने वाले समय में होगी असली परीक्षा

वीबी-जीरामजी योजना को लेकर फिलहाल उम्मीदों और आशंकाओं दोनों का माहौल है। एक ओर सरकार इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाला व्यापक सुधार मान रही है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय दायित्व और रोजगार उपलब्धता को लेकर चिंताएं लगातार सामने आ रही हैं।

अब सबकी निगाहें राज्य मंत्रिमंडल और केंद्र सरकार की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि योजना तय समय पर लागू होती है तो यह हिमाचल प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकती है।

आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि नई योजना ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के अपने लक्ष्यों को किस हद तक पूरा कर पाती है और क्या यह मनरेगा की जगह लेने में सफल साबित होगी या नहीं।