यूरोप की तपती गर्मी से भारत को बड़ा मौका, 10 अरब डॉलर के एसी बाजार में एंट्री की तैयारी में कंपनियां

यूरोप की तपती गर्मी से भारत को बड़ा मौका, 10 अरब डॉलर के एसी बाजार में एंट्री की तैयारी में कंपनियां

यूरोप में बढ़ती गर्मी और लगातार बदलते मौसम के पैटर्न ने भारतीय एसी और कूलिंग उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए एक नया अवसर पैदा कर दिया है। रिकॉर्ड तापमान और ग्लोबल वार्मिंग के असर के चलते यूरोप के कई देशों में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस बढ़ती जरूरत को देखते हुए भारतीय कंपनियां अब यूरोप के बड़े बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही हैं।

यूरोप का रूम एयर कंडीशनर बाजार करीब 10 अरब डॉलर सालाना का बताया जा रहा है। लंबे समय तक इस बाजार पर चीन और दक्षिण कोरिया की कंपनियों का दबदबा रहा है, लेकिन अब भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को इसमें अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका दिखाई दे रहा है। हालांकि यूरोप में एसी बेचने के लिए भारतीय कंपनियों के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं, जिनमें सख्त नियम, प्रोडक्ट स्टैंडर्ड और लागत का अंतर सबसे अहम हैं।

भारतीय कंपनियां सीधे यूरोपीय बाजार में उतरने से पहले वहां की जरूरतों और नियमों को समझ रही हैं। कई कंपनियों का मानना है कि यूरोप में इस साल की तेज गर्मी ने कूलिंग सेक्टर की संभावनाओं को और मजबूत कर दिया है। मांग बढ़ने के कारण भारतीय कंपनियां अब एक्सपोर्ट को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं।

गर्मी ने बदला यूरोप का बाजार

यूरोप में पिछले कुछ वर्षों से गर्मी के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। जिन देशों में पहले एयर कंडीशनर की जरूरत कम महसूस होती थी, वहां भी अब लोग कूलिंग सिस्टम खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। तापमान बढ़ने और हीटवेव की घटनाएं बढ़ने के कारण घरों, ऑफिसों और कमर्शियल जगहों पर एसी की मांग बढ़ रही है।

भारतीय कंपनियों के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पहले से ही बड़े पैमाने पर एयर कंडीशनर का उत्पादन करता है। देश में मौजूद मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का इस्तेमाल करके कंपनियां यूरोप जैसे प्रीमियम बाजारों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर सकती हैं।

गोदरेज एंटरप्राइजेज ग्रुप के अप्लायंसेज बिजनेस से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, कंपनी काफी समय से यूरोप में संभावनाएं तलाश रही थी, लेकिन इस साल की रिकॉर्ड गर्मी ने इस बाजार की अहमियत को और बढ़ा दिया है। कंपनी का मानना है कि यूरोप में कूलिंग सॉल्यूशन की जरूरत आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है।

2027 से शुरू हो सकती है भारतीय कंपनियों की बड़ी एंट्री

हालांकि भारतीय कंपनियां तुरंत यूरोप में बड़े स्तर पर एसी बिक्री शुरू नहीं कर पाएंगी। इसकी सबसे बड़ी वजह यूरोपीय बाजार के सख्त नियम और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया है।

यूरोप में किसी भी कूलिंग प्रोडक्ट को बेचने के लिए वहां के एनर्जी एफिशिएंसी मानकों, सुरक्षा नियमों और पर्यावरण से जुड़े दिशानिर्देशों को पूरा करना जरूरी होता है। भारतीय कंपनियों को अपने उत्पादों में कुछ बदलाव करने होंगे ताकि वे यूरोप की जरूरतों के अनुसार फिट हो सकें।

इसी कारण कई भारतीय कंपनियां 2027 के आसपास यूरोपीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की योजना बना रही हैं। कंपनियों का मानना है कि तैयारी के बाद ही वहां मजबूत तरीके से उतरना बेहतर होगा, क्योंकि यूरोप में ग्राहकों की पसंद और खरीदारी के तरीके भारत से काफी अलग हैं।

सरकार भी चाहती है एसी एक्सपोर्ट बढ़ाना

भारत सरकार भी एयर कंडीशनर और अन्य हाई-वैल्यू अप्लायंसेज के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना चाहती है। केंद्र सरकार की नजर में एसी सेक्टर सिर्फ घरेलू मांग पूरी करने वाला उद्योग नहीं बल्कि निर्यात बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी कंपनियों को वैश्विक बाजारों में विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित कर चुके हैं। एसी कैटेगरी को सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना के तहत भी शामिल किया है। इसका उद्देश्य देश में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनाना है।

हालांकि अभी भारतीय एसी कंपनियों का निर्यात बहुत तेज गति से नहीं बढ़ पाया है। घरेलू बाजार में भी भारतीय ब्रांड्स की हिस्सेदारी करीब 10-11 फीसदी के आसपास बताई जाती है। ऐसे में यूरोप जैसे बाजार में सफलता हासिल करना कंपनियों के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

चीन और दक्षिण कोरिया से मुकाबला आसान नहीं

यूरोप के एसी बाजार में सबसे बड़ी चुनौती चीन और दक्षिण कोरिया की कंपनियां हैं। इन देशों की कंपनियां पहले से ही वहां मजबूत नेटवर्क बना चुकी हैं। भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा अंतर उत्पादन लागत का है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार चीनी कंपनियों की उत्पादन लागत भारतीय कंपनियों के मुकाबले करीब 15 से 18 फीसदी कम है। यही वजह है कि कीमत के मामले में भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने में मुश्किल आ सकती है।

इसके अलावा चीन और दक्षिण कोरिया की कंपनियों के पास लंबे समय से यूरोपीय बाजार का अनुभव है। उनके पास सप्लाई चेन, सर्विस नेटवर्क और स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार किए गए उत्पाद मौजूद हैं।

भारतीय कंपनियों को इस मुकाबले में टिकने के लिए उत्पादन लागत कम करने, तकनीक सुधारने और यूरोपीय ग्राहकों की पसंद के अनुसार प्रोडक्ट तैयार करने होंगे।

हीट पंप एसी बनेगा सबसे बड़ा फोकस

यूरोप और भारत के एसी बाजार में एक बड़ा अंतर यह है कि यूरोप में हीट पंप एसी की मांग ज्यादा है। ये सिस्टम सिर्फ गर्मी में ठंडक नहीं देते बल्कि सर्दियों में हीटिंग का काम भी करते हैं। जानकारी के मुताबिक यूरोप के रेजिडेंशियल एसी बाजार में हीट पंप एसी की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी तक है। भारत में भी जम्मू-कश्मीर, दिल्ली-एनसीआर और कुछ ठंडे इलाकों में ऐसे मॉडल इस्तेमाल किए जाते हैं।

भारतीय कंपनियों को यूरोप में सफल होने के लिए अपने उत्पादों को इसी तरह की जरूरतों के अनुसार डिजाइन करना होगा। सिर्फ सामान्य कूलिंग एसी बनाकर यूरोपीय बाजार में बड़ी सफलता हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

हैवल्स, एम्बर और दूसरी कंपनियां तलाश रहीं रास्ते

भारतीय कंपनियों में कई नाम यूरोप के बाजार को लेकर सक्रिय हैं। हैवल्स यूरोप में एसी और पंखों के निर्यात की संभावनाओं पर काम कर रही है। कंपनी अपने डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के जरिए वहां पहुंच बनाने की योजना बना रही है। इसके अलावा एम्बर एंटरप्राइजेज भी यूरोपीय बाजार में अवसर तलाश रही है। यह कंपनी पहले से ही कई बड़े ब्रांड्स के लिए एसी कंपोनेंट और सप्लाई से जुड़ी हुई है।

वहीं एलजी, डाइकिन, सैमसंग, हायर और ब्लू स्टार जैसी ग्लोबल कंपनियां भी भारत में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं। इन कंपनियों का लक्ष्य भारत को सिर्फ घरेलू बाजार नहीं बल्कि एक्सपोर्ट हब के रूप में इस्तेमाल करना है।

अगर भारत में उत्पादन बढ़ता है तो कंपनियां यहां से यूरोप समेत अन्य देशों में सीधे सप्लाई कर सकती हैं।

यूरोप की जरूरतों के हिसाब से बदलना होगा डिजाइन

भारतीय कंपनियों के लिए सिर्फ उत्पादन करना ही काफी नहीं होगा। उन्हें यूरोप की इमारतों और ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से एसी डिजाइन करने होंगे। यूरोप में कई पुरानी इमारतें ऐसी हैं जहां पारंपरिक आउटडोर स्प्लिट एसी यूनिट लगाना आसान नहीं होता। कई जगहों पर बिल्डिंग नियमों के कारण बाहरी यूनिट लगाने पर प्रतिबंध होता है।

इसके अलावा यूरोप में इंस्टॉलेशन का खर्च भी काफी ज्यादा है। इसलिए कंपनियों को ऐसे उत्पाद बनाने होंगे जो आसानी से लगाए जा सकें और जिनकी मेंटेनेंस लागत कम हो।

भारत के लिए बड़ा एक्सपोर्ट अवसर

यूरोप में बढ़ती गर्मी भारतीय एसी कंपनियों के लिए एक नया दरवाजा खोल रही है। 10 अरब डॉलर के बाजार में जगह बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन भारत की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और सरकार की नीतियां कंपनियों को मदद दे सकती हैं।

आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि भारतीय कंपनियां चीन और दक्षिण कोरिया के मजबूत दबदबे को कितना चुनौती दे पाती हैं। अगर कंपनियां लागत कम करने, तकनीक सुधारने और यूरोप की जरूरतों के अनुसार उत्पाद बनाने में सफल होती हैं तो यह भारत के अप्लायंसेज सेक्टर के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

(Photo : AI Generated)