हर माता-पिता अपने बच्चे के पहले शब्द का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जब बच्चा “मम्मा” या “पापा” कहना शुरू करता है तो वह पल पूरे परिवार के लिए खास बन जाता है। लेकिन कुछ बच्चों में बोलने की शुरुआत अपेक्षा से देर से होती है। ऐसे समय में अक्सर रिश्तेदार या आसपास के लोग यह कहकर दिलासा देते हैं कि “अभी छोटा है, कुछ समय बाद अपने आप बोलने लगेगा।” हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हर मामले में ऐसा मान लेना सही नहीं है। यदि बच्चे की भाषा और बोलने की क्षमता उम्र के हिसाब से विकसित नहीं हो रही है तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते जांच कराना जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के शुरुआती साल उसके मस्तिष्क के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दौरान भाषा समझने, शब्द सीखने और दूसरों से संवाद करने की क्षमता तेजी से विकसित होती है। यदि इस अवधि में किसी तरह की समस्या सामने आती है और उसका समय पर इलाज नहीं होता, तो आगे चलकर सीखने और सामाजिक व्यवहार पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए माता-पिता को केवल इंतजार करने के बजाय बच्चे के विकास पर नियमित नजर रखनी चाहिए।
हर बच्चे का विकास एक जैसा नहीं होता। कोई बच्चा जल्दी बोलना शुरू कर देता है तो कोई थोड़ा समय लेता है। फिर भी कुछ ऐसे विकासात्मक पड़ाव हैं जिन्हें ध्यान में रखना जरूरी माना जाता है। यदि बच्चा लगभग एक वर्ष की उम्र तक अपना नाम सुनकर प्रतिक्रिया नहीं देता, आसपास की आवाजों पर ध्यान नहीं देता या कुछ सामान्य शब्द बोलने की कोशिश भी नहीं करता, तो यह संकेत हो सकता है कि उसे अतिरिक्त मूल्यांकन की जरूरत है।
दो साल की उम्र तक अधिकांश बच्चों के पास अच्छी-खासी शब्दावली विकसित होने लगती है। सामान्य तौर पर इस उम्र तक बच्चे करीब 50 या उससे अधिक शब्द बोल सकते हैं और दो शब्द जोड़कर छोटे-छोटे वाक्य भी बनाने लगते हैं। जैसे “मम्मी पानी”, “पापा आओ” या “मुझे खिलौना” जैसी सरल अभिव्यक्तियां इस उम्र में देखने को मिलती हैं। यदि बच्चा अभी भी बहुत कम बोल रहा है या दूसरों की साधारण बातें समझने में कठिनाई महसूस करता है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर माना जाता है।
कई बार बोलने में देरी का कारण केवल भाषा सीखने की गति नहीं होती। विशेषज्ञ बताते हैं कि सुनने में किसी प्रकार की समस्या भी स्पीच डिले की बड़ी वजह बन सकती है। यदि बच्चा ठीक से सुन नहीं पा रहा है तो उसके लिए शब्दों को पहचानना और उन्हें दोहराना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए ऐसे मामलों में सबसे पहले सुनने की क्षमता की जांच कराना बेहद जरूरी माना जाता है।
इसके अलावा कुछ अन्य चिकित्सीय स्थितियां भी बच्चे की भाषा के विकास को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें भाषा विकास से जुड़ी समस्याएं, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, बौद्धिक विकास में कमी, न्यूरोलॉजिकल विकार या मस्तिष्क से संबंधित कुछ अन्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं। कई बार घर का माहौल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि बच्चे के साथ पर्याप्त बातचीत नहीं होती, उसे कहानियां नहीं सुनाई जातीं या परिवार के लोग उसके साथ संवाद कम करते हैं, तो भाषा विकास की गति प्रभावित हो सकती है।
डॉक्टरों का कहना है कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा वास्तव में केवल देर से बोल रहा है या उसे किसी प्रकार का स्पीच या लैंग्वेज डिसऑर्डर है। दोनों स्थितियां एक जैसी नहीं होतीं और इनके इलाज का तरीका भी अलग-अलग हो सकता है।
कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें विशेषज्ञ “लेट टॉकर” की श्रेणी में रखते हैं। ये बच्चे आमतौर पर 18 से 30 महीने की उम्र के बीच अपेक्षाकृत कम बोलते हैं, लेकिन वे अपने आसपास की बातें अच्छी तरह समझते हैं। वे आंखों से संपर्क बनाते हैं, इशारों के जरिए अपनी जरूरत बताते हैं, लोगों से जुड़ने की कोशिश करते हैं और सामाजिक गतिविधियों में सामान्य रूप से भाग लेते हैं। ऐसे बच्चों में समय के साथ भाषा कौशल में सुधार देखने को मिल सकता है और कई बच्चे बाद में अपनी उम्र के अन्य बच्चों की बराबरी भी कर लेते हैं।
दूसरी ओर यदि समस्या स्पीच या लैंग्वेज डिसऑर्डर की है तो स्थिति अलग हो सकती है। स्पीच डिसऑर्डर में बच्चा शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाता या आवाजें स्पष्ट रूप से निकालने में कठिनाई महसूस करता है। वहीं लैंग्वेज डिसऑर्डर में बच्चा दूसरों की बात समझने और अपने विचारों को शब्दों में व्यक्त करने दोनों में संघर्ष कर सकता है। ऐसे मामलों में केवल इंतजार करने से समस्या दूर होने की संभावना कम रहती है और विशेषज्ञ की मदद आवश्यक हो जाती है।
माता-पिता को कुछ ऐसे संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो सामान्य स्पीच डिले से आगे की समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं। यदि बच्चा लोगों से आंख मिलाने से बचता है, बार-बार बुलाने पर भी प्रतिक्रिया नहीं देता, पहले किए जाने वाले इशारे जैसे बाय-बाय करना या उंगली से किसी चीज की ओर इशारा करना बंद कर देता है, दूसरों के साथ खेलने या मिलने-जुलने में रुचि नहीं दिखाता या पहले सीखे हुए शब्द और सामाजिक व्यवहार भूलने लगता है, तो यह गंभीर संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि माता-पिता घर में बच्चे के साथ अधिक से अधिक बातचीत करें। बच्चे को कहानी सुनाना, चित्रों वाली किताबें दिखाना, गाने सुनाना, खेल-खेल में सवाल पूछना और उसकी छोटी-छोटी प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहित करना भाषा विकास में मददगार साबित हो सकता है। टीवी, मोबाइल या अन्य स्क्रीन के सामने लंबे समय तक बैठाने के बजाय परिवार के सदस्यों के साथ प्रत्यक्ष संवाद बच्चे के लिए अधिक लाभकारी माना जाता है।
यदि डॉक्टर को किसी प्रकार की आशंका होती है तो वह बच्चे की सुनने की क्षमता, मानसिक विकास और भाषा कौशल का विस्तृत मूल्यांकन कराने की सलाह दे सकते हैं। जरूरत पड़ने पर स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट द्वारा विशेष परीक्षण किए जाते हैं, जिनके आधार पर यह तय किया जाता है कि बच्चे को किस तरह की सहायता की आवश्यकता है।
इलाज पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या की असली वजह क्या है। कई बच्चों में स्पीच थेरेपी के माध्यम से अच्छे परिणाम मिलते हैं। थेरेपी के दौरान बच्चे को उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार भाषा सीखने के अलग-अलग अभ्यास कराए जाते हैं। साथ ही माता-पिता को भी ऐसे तरीके बताए जाते हैं जिनकी मदद से वे घर पर नियमित अभ्यास कराकर बच्चे के बोलने और समझने की क्षमता को बेहतर बना सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती पहचान और समय पर हस्तक्षेप से कई बच्चों में उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है। इसलिए केवल इस उम्मीद में महीनों या वर्षों तक इंतजार करना कि बच्चा अपने आप बोलने लगेगा, हमेशा सही फैसला नहीं माना जाता। यदि आपको अपने बच्चे के भाषा विकास को लेकर थोड़ा भी संदेह है तो बिना देर किए योग्य डॉक्टर या स्पीच-लैंग्वेज विशेषज्ञ से परामर्श लेना बेहतर रहेगा। सही समय पर उठाया गया एक कदम बच्चे के भविष्य की सीखने, समझने और संवाद करने की क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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