शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार की सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को नि:शुल्क स्टील की पानी की बोतलें उपलब्ध कराने की योजना के दौरान शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में बड़ा अंतर सामने आया है। विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग स्तरों से तीन अलग-अलग आंकड़े सामने आने के बाद विभाग को पूरे प्रदेश में छात्र नामांकन का दोबारा सत्यापन कराना पड़ा। कई दौर की जांच और जिलों से संशोधित रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद करीब 7.37 लाख विद्यार्थियों की अंतिम संख्या तय की गई, जिसके आधार पर अब स्टील की बोतलों की खरीद और वितरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
यह मामला केवल एक सरकारी योजना तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे शिक्षा विभाग की डेटा प्रबंधन प्रणाली, स्कूल स्तर पर रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं के लिए उपयोग किए जाने वाले आंकड़ों की सटीकता पर भी सवाल खड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि छात्र संख्या से जुड़े रिकॉर्ड में इस तरह का अंतर बना रहता है तो भविष्य में छात्रवृत्ति, मिड-डे मील, पाठ्यपुस्तक वितरण, यूनिफॉर्म, डिजिटल शिक्षा सामग्री और अन्य सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद शुरू हुई योजना
हिमाचल प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को स्टील की पानी की बोतल उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। इस योजना का उद्देश्य छात्रों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना, प्लास्टिक की बोतलों के उपयोग को कम करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।
सरकार का मानना है कि स्टील की बोतलें प्लास्टिक की तुलना में अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग में आने वाली होती हैं। इसके अलावा यह पहल स्कूलों में सिंगल-यूज प्लास्टिक को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
योजना के क्रियान्वयन से पहले शिक्षा निदेशालय को यह तय करना था कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कुल कितने विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, ताकि उसी आधार पर बोतलों की खरीद की जा सके। इसी प्रक्रिया के दौरान छात्र संख्या से जुड़े आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया।
पहली रिपोर्ट में बताए गए 7.68 लाख विद्यार्थी
शिक्षा निदेशालय ने सबसे पहले सभी जिला उपनिदेशकों से सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत विद्यार्थियों की संख्या मांगी। जिलों से प्राप्त पहली रिपोर्ट में पूरे प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 7,68,037 विद्यार्थियों का नामांकन बताया गया।
इसी आंकड़े के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर योजना तैयार की जा रही थी, लेकिन जब अधिकारियों ने इन आंकड़ों का मिलान शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड से किया तो स्थिति पूरी तरह अलग दिखाई दी।
यू-डाइस पोर्टल पर मिले अलग आंकड़े
जब जिला स्तर से प्राप्त रिपोर्ट की तुलना शिक्षा मंत्रालय के यू-डाइस (UDISE) पोर्टल पर उपलब्ध डेटा से की गई तो वहां विद्यार्थियों की संख्या केवल 7,18,559 दर्ज मिली।
दोनों आंकड़ों के बीच लगभग 50 हजार विद्यार्थियों का अंतर सामने आने के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने पूरी प्रक्रिया पर दोबारा समीक्षा शुरू की।
इतना बड़ा अंतर देखकर अधिकारियों ने आशंका जताई कि कहीं न कहीं डेटा संकलन, रिकॉर्ड अपडेट करने या रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। इसके बाद पूरे राज्य में छात्र नामांकन का दोबारा सत्यापन कराने का निर्णय लिया गया।
सभी जिलों को दोबारा भेजे गए निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्कूल शिक्षा निदेशालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों, जिला उपनिदेशकों और संबंधित अधिकारियों को तत्काल संशोधित रिपोर्ट भेजने के निर्देश जारी किए।
प्रत्येक जिले में ब्लॉक स्तर और स्कूल स्तर पर छात्र नामांकन का दोबारा मिलान कराया गया। स्कूलों से वास्तविक नामांकन सूची प्राप्त की गई और उसके बाद संशोधित रिपोर्ट तैयार कर निदेशालय को भेजी गई।
इस विस्तृत सत्यापन प्रक्रिया के बाद सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की अंतिम संख्या लगभग 7.37 लाख निर्धारित की गई। अब इसी संख्या के आधार पर स्टील की पानी की बोतलों की खरीद और वितरण किया जाएगा।
आखिर क्यों आया इतना बड़ा अंतर?
जांच के दौरान शिक्षा विभाग को कई कारणों का पता चला, जिनकी वजह से अलग-अलग रिपोर्टों में छात्रों की संख्या में बड़ा अंतर दिखाई दिया।
कुछ जिलों ने बताया कि पहली रिपोर्ट तैयार करते समय प्री-प्राइमरी कक्षाओं के विद्यार्थियों को शामिल नहीं किया गया था।
वहीं कुछ जिलों में पिछले शैक्षणिक सत्र के 11वीं और 12वीं कक्षा के वे छात्र भी रिकॉर्ड में बने हुए थे, जिन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद स्कूल छोड़ दिया था।
कुछ स्थानों पर स्कूलों ने नया नामांकन अपडेट कर दिया था, जबकि कुछ संस्थानों में पुराने रिकॉर्ड ही भेज दिए गए। इससे विभिन्न स्तरों पर तैयार की गई रिपोर्टों में असमानता पैदा हो गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डेटा अपडेट करने की प्रक्रिया एक समान न हो तो राज्य स्तर पर बड़ी योजनाओं के लिए सटीक संख्या तैयार करना कठिन हो जाता है।
केवल स्टील की बोतल योजना तक सीमित नहीं है मामला
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह समस्या केवल स्टील की पानी की बोतल वितरण योजना तक सीमित नहीं है।
सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या के आधार पर ही अनेक योजनाओं का बजट तैयार किया जाता है। इनमें शामिल हैं—
- छात्रवृत्ति योजनाएं
- मिड-डे मील
- मुफ्त पाठ्यपुस्तक वितरण
- स्कूल यूनिफॉर्म
- स्टेशनरी सामग्री
- खेल सामग्री
- डिजिटल शिक्षा उपकरण
- अन्य छात्र कल्याण योजनाएं
यदि इनमें किसी भी योजना के लिए गलत छात्र संख्या का उपयोग किया जाए तो इससे सरकारी धन का गलत आकलन, संसाधनों का असमान वितरण और प्रशासनिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं।
डेटा की शुद्धता पर दिया गया विशेष जोर
स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने सभी जिला उपनिदेशकों, ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारियों (बीपीईओ) और स्कूल प्रमुखों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि भविष्य में किसी भी योजना के लिए भेजे जाने वाले आंकड़ों में पूर्ण पारदर्शिता और सटीकता सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने अधिकारियों से कहा है कि छात्र नामांकन से जुड़ी प्रत्येक जानकारी का विद्यालय स्तर पर सत्यापन करने के बाद ही उसे जिला कार्यालय और शिक्षा निदेशालय को भेजा जाए।
इसके अलावा यह भी निर्देश दिए गए हैं कि यू-डाइस पोर्टल पर दर्ज जानकारी और विभागीय रिकॉर्ड में किसी प्रकार का अंतर नहीं होना चाहिए।
यू-डाइस पोर्टल की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
यू-डाइस (Unified District Information System for Education) देशभर के स्कूलों से संबंधित जानकारी का एक प्रमुख डिजिटल डेटाबेस है।
इसी पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा से जुड़ी अनेक योजनाओं की रूपरेखा तैयार करती हैं। स्कूलों की संख्या, विद्यार्थियों का नामांकन, शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत सुविधाएं और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी इसी प्रणाली के माध्यम से संकलित की जाती है।
यदि इस पोर्टल पर गलत या अधूरी जानकारी दर्ज होती है तो उसका प्रभाव केवल एक योजना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भविष्य की शिक्षा नीतियों, बजट आवंटन और संसाधनों के वितरण पर भी पड़ सकता है।
स्कूल स्तर पर फिर से कराया गया सत्यापन
डेटा में अंतर सामने आने के बाद प्रत्येक स्कूल से वास्तविक नामांकन की सूची दोबारा मंगाई गई।
ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारियों की निगरानी में स्कूलवार रिकॉर्ड का मिलान किया गया। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारियों ने संशोधित रिपोर्ट तैयार कर शिक्षा निदेशालय को भेजी।
पूरी प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि प्रत्येक विद्यार्थी का नाम केवल एक बार ही दर्ज हो और पुराने रिकॉर्ड को अपडेट कर दिया जाए।
पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ी है योजना
सरकार का कहना है कि स्टील की पानी की बोतलें उपलब्ध कराने का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को सुविधा देना नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा देना है।
प्लास्टिक की बोतलों के उपयोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए कई राज्यों में इस तरह की पहल की जा रही है। स्टील की बोतलें लंबे समय तक उपयोग में आती हैं और इन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके अलावा स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी स्टील के बर्तनों और बोतलों को कई परिस्थितियों में प्लास्टिक की तुलना में अधिक सुरक्षित मानते हैं।
अब जिलावार तय होगी बोतलों की संख्या
शिक्षा विभाग अब अंतिम रूप से तय किए गए छात्र नामांकन के आधार पर प्रत्येक जिले के लिए स्टील की बोतलों की संख्या निर्धारित करेगा।
इसके बाद खरीद प्रक्रिया पूरी की जाएगी और संबंधित जिलों के माध्यम से सरकारी स्कूलों तक बोतलों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
अधिकारियों का कहना है कि वितरण प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी पात्र विद्यार्थी योजना के लाभ से वंचित न रहे।
डेटा प्रबंधन प्रणाली को और मजबूत बनाने की तैयारी
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल रिकॉर्ड को नियमित रूप से अपडेट करना और विभिन्न सरकारी पोर्टलों के बीच समन्वय बनाए रखना बेहद आवश्यक है।
यदि स्कूल स्तर से लेकर जिला और राज्य स्तर तक छात्र नामांकन का रिकॉर्ड समय-समय पर सत्यापित किया जाता रहे, तो सरकारी योजनाओं के लिए अलग-अलग आंकड़ों की स्थिति से बचा जा सकता है। इससे न केवल संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा बल्कि योजनाओं का लाभ भी सही समय पर वास्तविक पात्र विद्यार्थियों तक पहुंचाना आसान होगा।
शिक्षा विभाग अब केवल स्टील की बोतल वितरण योजना पर ही ध्यान नहीं दे रहा है, बल्कि छात्र नामांकन से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी, अद्यतन और विश्वसनीय बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है। विभाग का उद्देश्य भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, जहां एक ही योजना के लिए तीन अलग-अलग छात्र संख्या सामने आए और पूरी प्रक्रिया को दोबारा सत्यापित करना पड़े।




