शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार की सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को नि:शुल्क स्टील की पानी की बोतलें उपलब्ध कराने की योजना के दौरान शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में बड़ा अंतर सामने आया है। विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या को लेकर विभाग के पास तीन अलग-अलग आंकड़े पहुंचने से अधिकारियों को दोबारा पूरे प्रदेश का नामांकन सत्यापित कराना पड़ा। आखिरकार सभी जिलों से संशोधित रिपोर्ट मंगवाने के बाद लगभग 7.37 लाख विद्यार्थियों की संख्या तय की गई, जिनके लिए अब स्टील की पानी की बोतलों की व्यवस्था की जाएगी।
दरअसल, मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुसार सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र-छात्रा को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्टील की बोतलें वितरित की जानी हैं। योजना के क्रियान्वयन से पहले जब शिक्षा निदेशालय ने जिलों से विद्यार्थियों की संख्या मांगी तो अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आ गया। इससे विभाग की डेटा प्रबंधन प्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए।
सबसे पहले जिला उपनिदेशकों के माध्यम से जो रिपोर्ट निदेशालय को भेजी गई, उसमें सरकारी स्कूलों में कुल 7,68,037 विद्यार्थियों के नामांकन का उल्लेख था। लेकिन जब इसी संख्या का मिलान शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक यू-डाइस (UDISE) पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों से किया गया तो वहां विद्यार्थियों की संख्या केवल 7,18,559 दर्ज मिली। दोनों आंकड़ों के बीच करीब 50 हजार छात्रों का अंतर देखकर अधिकारी भी हैरान रह गए।
इतना बड़ा अंतर सामने आने के बाद स्कूल शिक्षा निदेशालय ने सभी जिलों को तत्काल दोबारा सत्यापन करने के निर्देश जारी किए। प्रत्येक जिला, ब्लॉक और स्कूल स्तर पर नामांकन का पुन: मिलान कराया गया। संशोधित रिपोर्ट आने के बाद विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग 7.37 लाख निर्धारित की गई, जिसके आधार पर अब स्टील की बोतलों की खरीद और वितरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि अलग-अलग जिलों में डेटा तैयार करने का तरीका एक समान नहीं था। कुछ जिलों ने बताया कि उनकी पहली रिपोर्ट में प्री-प्राइमरी कक्षाओं के विद्यार्थियों का विवरण शामिल नहीं किया गया था। वहीं कुछ स्थानों पर पिछले शैक्षणिक सत्र के 11वीं और 12वीं कक्षा के वे छात्र भी रिकॉर्ड में बने रहे, जो परीक्षा पास कर स्कूल छोड़ चुके थे। इसी कारण विभिन्न रिपोर्टों में आंकड़ों का बड़ा अंतर देखने को मिला।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विद्यार्थियों की संख्या में इस प्रकार का अंतर केवल स्टील की बोतल योजना तक सीमित नहीं है। यदि सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्ति, पाठ्यपुस्तक वितरण, मिड-डे मील, स्कूल यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाओं के लिए भी गलत आंकड़ों का उपयोग किया जाए तो इससे वित्तीय और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए भविष्य में सभी आंकड़ों को एक समान और अद्यतन रखने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने सभी जिला उपनिदेशकों, ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारियों (बीपीईओ) और स्कूल प्रमुखों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी योजना के लिए भेजे जाने वाले आंकड़ों में पूर्ण पारदर्शिता और शुद्धता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि छात्र नामांकन से संबंधित प्रत्येक जानकारी का सत्यापन करने के बाद ही उसे निदेशालय और यू-डाइस पोर्टल पर अपलोड किया जाए।
निदेशक ने यह भी कहा कि यू-डाइस पोर्टल सरकार के लिए शिक्षा क्षेत्र से जुड़े निर्णय लेने का प्रमुख आधार है। यदि इस पोर्टल पर गलत या अधूरी जानकारी दर्ज होगी तो न केवल योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ेगा बल्कि भविष्य की नीतियों और बजट निर्धारण में भी गलत आंकड़ों का उपयोग हो सकता है।
इसी उद्देश्य से सभी जिलों को दोबारा छात्र नामांकन की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारियों की निगरानी में ब्लॉक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारियों ने स्कूलवार नामांकन का सत्यापन कराया। संशोधित रिपोर्ट तैयार कर निदेशालय को भेजी गई, जिससे अंतिम संख्या तय की जा सकी।
सरकार का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप सरकारी स्कूलों के प्रत्येक विद्यार्थी को स्टील की पानी की बोतल उपलब्ध कराई जाएगी। इसका उद्देश्य प्लास्टिक की बोतलों के उपयोग को कम करना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और विद्यार्थियों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना है। स्टील की बोतलें लंबे समय तक उपयोग में आने वाली, टिकाऊ और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर मानी जाती हैं।
शिक्षा विभाग अब विद्यार्थियों की अंतिम सूची के आधार पर जिलावार बोतलों की संख्या तय करेगा। इसके बाद खरीद प्रक्रिया पूरी कर संबंधित स्कूलों तक वितरण सुनिश्चित किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी पात्र विद्यार्थी को इस योजना से वंचित नहीं रहने दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल स्टील की बोतलों के वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की सटीकता की आवश्यकता को भी उजागर करता है। शिक्षा विभाग के लिए यह अनुभव भविष्य में डेटा प्रबंधन प्रणाली को और मजबूत बनाने का अवसर माना जा रहा है। यदि स्कूल स्तर से लेकर राज्य स्तर तक नामांकन का रिकॉर्ड नियमित रूप से अपडेट किया जाए और सभी पोर्टलों में समान जानकारी दर्ज हो, तो सरकारी योजनाओं का लाभ सही समय पर सही विद्यार्थियों तक पहुंचाना अधिक आसान होगा।
अब विभाग का फोकस केवल स्टील की बोतलों के वितरण पर ही नहीं, बल्कि छात्र नामांकन के डिजिटल रिकॉर्ड को भी पूरी तरह सटीक और पारदर्शी बनाने पर रहेगा, ताकि आने वाले समय में किसी भी योजना के क्रियान्वयन के दौरान इस तरह की स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।




