सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है। पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को वैश्विक मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे अब तक वह समर्थन नहीं मिल पाया जिसकी उसे उम्मीद थी। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। इसी बीच भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की मौजूदा रणनीति उसके सैन्य नेतृत्व की सोच का परिणाम है, जिसका असर उसकी विदेश नीति से लेकर घरेलू राजनीति तक दिखाई दे रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सेना की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। फील्ड मार्शल असीम मुनीर को देश की सबसे प्रभावशाली शख्सियत माना जा रहा है और कई महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका निर्णायक बताई जाती है। ऐसे में भारत के खिलाफ लगातार आक्रामक बयानबाजी और सिंधु जल संधि को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
भारत ने हालांकि इस पूरे विवाद पर अपना रुख पहले की तरह स्पष्ट रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कदम नहीं उठाता, तब तक सामान्य संबंधों की उम्मीद नहीं की जा सकती। भारतीय नेतृत्व कई मौकों पर यह दोहरा चुका है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। यही कारण है कि भारत ने पाकिस्तान की ओर से आने वाली तीखी प्रतिक्रियाओं का जवाब भी संयमित लेकिन स्पष्ट भाषा में दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार और भू-राजनीतिक मामलों के जानकार जग्गी भसीन ने अपने एक विश्लेषण में पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति का विस्तृत आकलन किया है। उनके अनुसार पाकिस्तान की राजनीतिक दिशा अब काफी हद तक सैन्य नेतृत्व तय कर रहा है। उनका मानना है कि देश में लोकप्रियता हासिल करने और आंतरिक चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए भारत विरोधी मुद्दों को लगातार हवा दी जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में पाकिस्तान की लोकतांत्रिक संस्थाएं पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रह गई हैं।
विश्लेषण में यह भी दावा किया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के जेल में रहने के पीछे भी राजनीतिक और सैन्य समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। माना जाता है कि इमरान खान और असीम मुनीर के बीच पुराने मतभेद आज भी दोनों पक्षों के संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। इसी वजह से पाकिस्तान की राजनीति में ध्रुवीकरण और अधिक गहरा होता जा रहा है।
जग्गी भसीन के मुताबिक पाकिस्तान के प्रमुख राजनीतिक दलों की स्थिति भी पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ जैसी बड़ी पार्टियों का प्रभाव सीमित होता दिखाई दे रहा है, जबकि कई अन्य राजनीतिक और धार्मिक संगठन सेना के नेतृत्व के साथ खड़े नजर आते हैं। उनका कहना है कि सत्ता के समीकरणों के चलते अनेक नेता और प्रभावशाली वर्ग सैन्य नेतृत्व का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, जिससे देश में वैकल्पिक राजनीतिक आवाजें कमजोर पड़ रही हैं।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत को लेकर पाकिस्तान में लगातार तीखे बयान दिए जा रहे हैं। असीम मुनीर कई सार्वजनिक मंचों से भारत की आलोचना कर चुके हैं और उन्होंने अपने भाषणों में धार्मिक संदर्भों का भी उपयोग किया है। जानकारों के अनुसार इससे पाकिस्तान के भीतर राष्ट्रवाद और धार्मिक भावनाओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है, ताकि घरेलू समर्थन मजबूत किया जा सके।
भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सैन्य नेतृत्व ने पहले के सेना प्रमुखों की तुलना में अधिक आक्रामक सार्वजनिक रुख अपनाया है। भारत के खिलाफ कड़े बयान, सीमा पार घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रियाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अभियान चलाना इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि भारत ने इस पूरी अवधि में अपने आधिकारिक रुख में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया और आतंकवाद को सबसे बड़ा मुद्दा बताते हुए अपनी बात दोहराई।
कुछ विश्लेषणों में यह दावा भी किया गया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई ने पाकिस्तान की रणनीति को झटका दिया। भारतीय सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने यह संदेश दिया कि भारत सुरक्षा से जुड़े मामलों में पहले की तुलना में अधिक सख्त नीति अपना रहा है और सीमा पार आतंकी गतिविधियों को लेकर किसी प्रकार की नरमी दिखाने के पक्ष में नहीं है।
रिपोर्टों के अनुसार इसके बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विभिन्न वैश्विक मंचों पर अपनी बात अधिक मजबूती से रखने की कोशिश की। कुछ विदेशी मीडिया संस्थानों में पाकिस्तान के पक्ष को प्रमुखता मिलने की भी चर्चा रही, लेकिन इसके बावजूद भारत के खिलाफ व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में इस्लामाबाद को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कई देशों ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया और द्विपक्षीय बातचीत पर जोर दिया।
इसी दौरान असीम मुनीर और अमेरिका के बीच बढ़ते संपर्क भी चर्चा का विषय बने। विभिन्न कूटनीतिक बैठकों और क्षेत्रीय घटनाक्रमों के दौरान पाकिस्तान ने खुद को महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में पेश करने का प्रयास किया। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की दिशा में भी पाकिस्तान सक्रिय दिखाई दिया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे अतिरिक्त राजनीतिक समर्थन मिलेगा।
अमेरिका और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के दौरान भी पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया। इस्लामाबाद ने कहा कि उसने दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने में योगदान दिया, हालांकि बाद के घटनाक्रमों में क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ गया और दोनों पक्षों के बीच टकराव दोबारा सामने आया। ऐसे में पाकिस्तान की मध्यस्थता संबंधी दावों को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
जानकारों का कहना है कि असीम मुनीर की सबसे बड़ी उम्मीद यह थी कि अमेरिका सिंधु जल संधि के मुद्दे पर भारत के खिलाफ खुलकर बयान देगा या नई दिल्ली पर दबाव बनाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका ने इस विषय पर कोई ऐसा रुख नहीं अपनाया जिससे भारत की स्थिति कमजोर होती दिखाई दे। विशेषज्ञों के अनुसार वॉशिंगटन ने इस मुद्दे पर संतुलित नीति बनाए रखी और सार्वजनिक रूप से भारत की आलोचना करने से परहेज किया।
हालांकि आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को कुछ राहत जरूर मिली। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आर्थिक सहायता और राहत पैकेज को लेकर अमेरिका की सकारात्मक भूमिका की चर्चा होती रही। पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय सहयोग जारी रहा, लेकिन सिंधु जल संधि जैसे संवेदनशील विषय पर उसे वह कूटनीतिक समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान की रणनीति को बड़ा झटका लगा है। उनका कहना है कि केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आलोचना करने से इस विवाद का समाधान नहीं निकल सकता। यदि पाकिस्तान वास्तव में वैश्विक समुदाय का भरोसा हासिल करना चाहता है तो उसे आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने होंगे।
भारत की ओर से लगातार यही संदेश दिया जा रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंध उसकी प्राथमिकता हैं, लेकिन आतंकवाद के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। नई दिल्ली का मानना है कि विश्वास बहाली के लिए सबसे पहले पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी। फिलहाल सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की सक्रिय कूटनीति जारी है, लेकिन अब तक उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैसा समर्थन नहीं मिल पाया है जिसकी वह लगातार उम्मीद कर रहा था। वहीं भारत अपने घोषित रुख पर कायम है और सुरक्षा तथा आतंकवाद के मुद्दे को किसी भी बातचीत का सबसे अहम आधार मान रहा है।




