चातुर्मास 2026: भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद किस देवता के हाथों में रहती है सृष्टि की कमान? जानिए पौराणिक रहस्य

चातुर्मास 2026: भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद किस देवता के हाथों में रहती है सृष्टि की कमान? जानिए पौराणिक रहस्य

सनातन परंपरा में चातुर्मास का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह वह पवित्र अवधि होती है जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा के लिए प्रस्थान करते हैं और चार महीने तक विश्राम करते हैं। चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी देवशयनी एकादशी से होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान भगवान विष्णु सृष्टि के नियमित संचालन से कुछ समय के लिए अलग हो जाते हैं। ऐसे में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब पालनहार भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तो पूरे संसार की व्यवस्था कौन संभालता है?

पौराणिक ग्रंथों में इस प्रश्न का उत्तर मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी स्वयं भगवान शिव संभालते हैं। इसी कारण चातुर्मास के पहले महीने सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना का महत्व बढ़ जाता है। शिव भक्त इस पूरे महीने में भोलेनाथ की आराधना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्रत रखते हैं।

देवशयनी एकादशी से शुरू होता है चातुर्मास

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। साल 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विश्राम करने चले जाते हैं।

कहा जाता है कि भगवान विष्णु के चार महीने तक योगनिद्रा में रहने के कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों को करने की परंपरा नहीं है। भक्त इस समय को आध्यात्मिक साधना, पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए शुभ मानते हैं।

चातुर्मास का समापन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन होता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और इसके बाद फिर से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है।

विष्णु जी के विश्राम के दौरान शिव संभालते हैं सृष्टि

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु को संसार का पालनकर्ता माना जाता है। जब वे चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब ब्रह्मांड की व्यवस्था को बनाए रखने का कार्य भगवान शिव करते हैं। शिव पुराण में भगवान शिव के इस स्वरूप और उनके द्वारा सृष्टि के संचालन का उल्लेख मिलता है।

मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान शिव जगत की रक्षा और संतुलन बनाए रखने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि इस अवधि में भगवान शिव की पूजा का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। विशेष रूप से सावन का महीना पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित माना जाता है।

शिव पुराण की रुद्र संहिता और कोटिरुद्र संहिता में भगवान शिव की महिमा और उनके विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु विश्राम करते हैं, तब महादेव संसार के कल्याण के लिए सक्रिय रहते हैं।

क्यों खास माना जाता है सावन का महीना?

चातुर्मास का पहला महीना सावन होता है। यह महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दौरान देशभर में लाखों श्रद्धालु भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं और कांवड़ यात्रा भी निकालते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। भक्त सोमवार के दिन व्रत रखते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास के दौरान प्रकृति में भी बदलाव आता है। बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और जीव-जंतुओं की संख्या भी अधिक हो जाती है। इसी वजह से पुराने समय में ऋषि-मुनि एक स्थान पर रहकर साधना करते थे। इस अवधि को आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना गया है।

देवशयनी एकादशी 2026 की तिथि और शुभ समय

वैदिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 25 जुलाई को सुबह 11 बजकर 34 मिनट पर होगा।

उदयातिथि के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026 को रखा जाएगा। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत भी मानी जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने का विशेष महत्व बताया गया है।

श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं, भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उन्हें पीले वस्त्र, फल, फूल और तुलसी अर्पित करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया देवशयनी एकादशी का व्रत व्यक्ति को पुण्य प्रदान करता है।

कब होगा देवशयनी एकादशी व्रत का पारण?

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि को करने की परंपरा है। साल 2026 में देवशयनी एकादशी व्रत का पारण 26 जुलाई को किया जाएगा।

पंचांग के अनुसार, व्रत खोलने का शुभ समय सुबह 5 बजकर 39 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद व्रत का पारण किया जा सकता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वादशी के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

चातुर्मास में क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य?

चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को करने से बचने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय भगवान विष्णु विश्राम की अवस्था में होते हैं, इसलिए शुभ कार्यों के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो पाता।

हालांकि, इस अवधि में पूजा-पाठ, मंत्र जाप, धार्मिक यात्राएं और दान-पुण्य जैसे कार्यों को विशेष फलदायी माना गया है। भक्त इस समय भगवान शिव, भगवान विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की आराधना करते हैं।

चातुर्मास केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समय मन को शांत करने, बुरी आदतों को छोड़ने और ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगाने का अवसर देता है।

भगवान शिव के भरोसे रहती है सृष्टि की व्यवस्था

धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव को संहार के साथ-साथ कल्याणकारी देवता भी बताया गया है। वे संसार में संतुलन बनाए रखने वाले देवताओं में प्रमुख माने जाते हैं। चातुर्मास के दौरान भगवान शिव द्वारा सृष्टि की जिम्मेदारी संभालने की मान्यता भक्तों के बीच उनकी महिमा को और बढ़ाती है।

इस तरह देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाला चातुर्मास केवल भगवान विष्णु के विश्राम का समय नहीं है, बल्कि भगवान शिव की सक्रिय भूमिका और आध्यात्मिक साधना का भी महत्वपूर्ण काल माना जाता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में इन चार महीनों को बेहद पवित्र और विशेष स्थान दिया गया है।

(Photo : Adobe Stock)