भारत-पाक तनाव पर फिर बोले डोनाल्ड ट्रंप, टैरिफ की चेतावनी देकर युद्ध रुकवाने का दोहराया दावा; भारत पहले भी कर चुका है खारिज

भारत-पाक तनाव पर फिर बोले डोनाल्ड ट्रंप, टैरिफ की चेतावनी देकर युद्ध रुकवाने का दोहराया दावा; भारत पहले भी कर चुका है खारिज

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य तनाव को लेकर खुद को शांति स्थापित कराने वाला नेता बताया है। ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच संघर्ष उस समय बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच चुका था, लेकिन उन्होंने व्यापारिक टैरिफ का दबाव बनाकर हालात को नियंत्रण में लाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि भारत पहले भी ऐसे सभी दावों को सार्वजनिक रूप से नकार चुका है और स्पष्ट कर चुका है कि सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्णय पूरी तरह द्विपक्षीय सैन्य संवाद के बाद लिया गया था।

कैंप डेविड में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने अपने कार्यकाल की विदेश नीति का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने दुनिया के कई बड़े संघर्षों को समाप्त कराने में भूमिका निभाई। इसी दौरान उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए टकराव का उदाहरण देते हुए कहा कि यह संघर्ष तेजी से युद्ध का रूप ले रहा था और स्थिति बेहद चिंताजनक थी।

ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच संघर्ष के दौरान कुल 11 लड़ाकू विमान मार गिराए गए थे। उनके अनुसार हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके थे कि यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया जाता तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने दोनों देशों को साफ संदेश दिया था कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रही तो अमेरिका दोनों पर भारी व्यापारिक टैरिफ लगाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति के मुताबिक उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों को आर्थिक परिणामों के बारे में आगाह किया था। ट्रंप ने कहा कि यदि युद्ध नहीं रुका तो दोनों देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर कड़ा असर पड़ेगा और 250 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। उनका कहना था कि इस चेतावनी के बाद दोनों देशों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई और दोनों सरकारें इस प्रस्ताव से नाराज हो गई थीं।

ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि शुरुआत में दोनों देशों ने उनकी बात का विरोध किया, लेकिन बाद में स्थिति बदल गई। उन्होंने दावा किया कि अगले ही दिन दोनों पक्षों ने संपर्क किया और बताया कि वे सैन्य टकराव को आगे नहीं बढ़ाएंगे। ट्रंप ने इस घटनाक्रम को अपनी कूटनीतिक सफलता बताते हुए कहा कि आर्थिक दबाव कई बार हथियारों से अधिक प्रभावी साबित होता है।

अपने संबोधन में ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने उनसे बातचीत के दौरान कहा था कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच संभावित बड़े युद्ध को रोकने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही और इससे करोड़ों लोगों की जान बच गई। ट्रंप के अनुसार यह उनकी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ऐसा दावा किया हो। इससे पहले भी वे कई सार्वजनिक कार्यक्रमों, चुनावी सभाओं और मीडिया इंटरव्यू में बार-बार कह चुके हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को रोकने में उनकी भूमिका निर्णायक रही थी। उन्होंने अनेक अवसरों पर यह भी कहा कि व्यापार और आर्थिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल कर उन्होंने दोनों देशों को बातचीत की राह पर लौटने के लिए प्रेरित किया।

दूसरी ओर भारत लगातार इस पूरे दावे का खंडन करता आया है। भारत सरकार का स्पष्ट रुख रहा है कि किसी भी तीसरे देश ने युद्धविराम या सैन्य कार्रवाई रोकने की प्रक्रिया में मध्यस्थता नहीं की। नई दिल्ली ने कई बार दोहराया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य गतिविधियां रोकने का फैसला दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच स्थापित संवाद तंत्र के माध्यम से हुआ था।

भारतीय पक्ष का कहना है कि जब सैन्य अभियान अपने निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त कर चुका था, तब पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने भारतीय DGMO से संपर्क किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत हुई और उसी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई तय की गई। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले में किसी बाहरी शक्ति की भूमिका नहीं थी।

भारत ने यह भी कहा है कि उसकी सुरक्षा और सैन्य नीति पूरी तरह स्वतंत्र है तथा राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं। सरकार ने पहले भी संसद और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट किया है कि भारत किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता और पाकिस्तान से जुड़े सभी मुद्दों पर उसका रुख लंबे समय से यही रहा है।

जिस सैन्य कार्रवाई का जिक्र ट्रंप अपने बयान में करते हैं, उसकी शुरुआत भारत द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से हुई थी। यह अभियान पिछले वर्ष 7 मई की सुबह शुरू किया गया था। भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में मौजूद उन आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था, जिनका संबंध भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों से बताया गया था।

भारत सरकार के अनुसार यह कार्रवाई पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में की गई थी। उस हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी, जिनमें बड़ी संख्या पर्यटकों की थी। भारतीय एजेंसियों ने जांच के बाद कहा था कि हमले में शामिल आतंकवादियों को पाकिस्तान से प्रशिक्षण और समर्थन मिला था। इसी आधार पर भारत ने आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाते हुए सीमापार कार्रवाई की थी।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने कई रणनीतिक लक्ष्यों पर सटीक हमले किए। सरकार ने उस समय कहा था कि अभियान का उद्देश्य केवल आतंकवादी ढांचे को नुकसान पहुंचाना था, न कि किसी नागरिक या गैर-सैन्य लक्ष्य को निशाना बनाना। भारत ने इसे आतंकवाद के खिलाफ सीमित और लक्षित सैन्य कार्रवाई बताया था।

ऑपरेशन के बाद दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था और सीमा पर सैन्य गतिविधियों में भी तेजी देखी गई थी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उस समय संयम बरतने की अपील की थी। हालांकि भारत ने साफ किया था कि उसकी कार्रवाई आत्मरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कदम थी।

इसी घटनाक्रम को लेकर अब ट्रंप एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उन्होंने अपने हालिया बयान में दावा किया कि यदि उन्होंने आर्थिक दबाव का विकल्प नहीं अपनाया होता तो स्थिति बड़े युद्ध में बदल सकती थी। हालांकि उनके इस दावे की पुष्टि भारत की ओर से कभी नहीं की गई है।

विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप अक्सर अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए अंतरराष्ट्रीय विवादों में अपनी भूमिका को प्रमुखता से प्रस्तुत करते रहे हैं। भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर भी वे कई बार समान दावे दोहरा चुके हैं, जबकि भारत का आधिकारिक रुख शुरू से अब तक अपरिवर्तित बना हुआ है।

इस पूरे मामले में फिलहाल दोनों देशों के आधिकारिक रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। जहां ट्रंप लगातार आर्थिक दबाव के जरिए युद्ध टलने का दावा दोहरा रहे हैं, वहीं भारत यह स्पष्ट करता रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर की समाप्ति और सैन्य गतिविधियों में कमी पूरी तरह दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच स्थापित संवाद के बाद हुई थी। ऐसे में ट्रंप के ताजा बयान ने एक बार फिर उस पुराने विवाद को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है, जिस पर भारत पहले ही अपना स्पष्ट और सार्वजनिक पक्ष रख चुका है।