कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज चोपड़ा ने जीता सिल्वर, गोल्ड से चूकने के पीछे मौसम और चोट बने बड़ी चुनौती

कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज चोपड़ा ने जीता सिल्वर, गोल्ड से चूकने के पीछे मौसम और चोट बने बड़ी चुनौती

ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा ने खेल प्रेमियों को रोमांच से भर दिया। भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए पदक जीतने में सफल रहे, लेकिन इस बार उनके खाते में स्वर्ण नहीं बल्कि रजत पदक आया। नीरज ने अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर 85.83 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया और दूसरे स्थान पर रहते हुए सिल्वर मेडल अपने नाम किया। हालांकि देशभर के खेल प्रेमियों को उनसे गोल्ड की उम्मीद थी, लेकिन कठिन मौसम, पुरानी चोट और कड़ी प्रतिस्पर्धा ने उनके अभियान को प्रभावित किया।

प्रतियोगिता की शुरुआत से ही माहौल बेहद चुनौतीपूर्ण था। तेज ठंडी हवाओं और लगातार बदलते मौसम ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर असर डाला। ऐसे हालात में हर थ्रो बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा था। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर का थ्रो करते हुए मजबूत बढ़त बनाई और अंत तक उसी प्रदर्शन के दम पर रजत पदक हासिल किया। वहीं श्रीलंका के रुमेश पथिराजे ने 89.75 मीटर का शानदार थ्रो करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम प्रतियोगिता में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सके और शुरुआती तीन प्रयासों के बाद ही बाहर हो गए।

नीरज के सिल्वर मेडल की खबर मिलते ही हरियाणा के पानीपत जिले के गांव खंडरा में खुशी की लहर दौड़ गई। उनके पैतृक घर पर देर रात तक ग्रामीण, रिश्तेदार और शुभचिंतक जुटे रहे। जैसे ही यह तय हुआ कि नीरज ने भारत के लिए एक और अंतरराष्ट्रीय पदक जीत लिया है, लोगों ने मिठाइयां बांटीं और एक-दूसरे को बधाई दी। पूरे गांव में जश्न का माहौल देखने को मिला। हालांकि परिवार के सदस्यों का मानना था कि इस बार स्वर्ण पदक की उम्मीद अधिक थी, लेकिन सिल्वर भी देश के लिए गर्व की बात है।

नीरज के पिता सतीश चोपड़ा ने बेटे के प्रदर्शन पर खुशी जताते हुए कहा कि पदक जीतना हमेशा सम्मान की बात होती है। उन्होंने माना कि स्वर्ण पदक से चूकने के पीछे दो बड़े कारण रहे। पहला कारण ग्लासगो का मौसम था। उनके अनुसार प्रतियोगिता के दौरान तेज हवा और ठंड के कारण खिलाड़ियों को लगातार समान लय बनाए रखना मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि जिसने शुरुआती दौर में अच्छा प्रदर्शन कर लिया, उसके बाद मौसम इतना कठिन हो गया कि अधिकांश खिलाड़ी अपनी दूरी में सुधार नहीं कर पाए।

सतीश चोपड़ा ने दूसरी वजह के रूप में नीरज की हालिया चोट का जिक्र किया। उनका कहना था कि चोट से पूरी तरह उबरने में समय लगता है और बड़े मुकाबलों में शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके बावजूद नीरज ने हार नहीं मानी और भारत के लिए पदक जीतकर अपनी प्रतिबद्धता साबित की। उन्होंने कहा कि हर खिलाड़ी के जीवन में ऐसे दौर आते हैं, लेकिन असली पहचान कठिन परिस्थितियों में भी देश के लिए प्रदर्शन करने से होती है। बेटे के सिल्वर मेडल पर उन्हें पूरा गर्व है।

मुकाबले के बाद नीरज चोपड़ा ने भी अपने प्रदर्शन का विश्लेषण किया। उन्होंने स्वीकार किया कि शुरुआत में मौसम अपेक्षाकृत बेहतर था, लेकिन जैसे-जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ी, ठंडी हवाएं तेज हो गईं और परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बनती चली गईं। उन्होंने कहा कि ऐसे मौसम में तकनीक और संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। इसके अलावा उन्होंने यह भी माना कि हालिया चोट से पूरी तरह उबरने की प्रक्रिया अभी जारी है, जिसका असर प्रदर्शन पर महसूस हुआ।

अगर प्रतियोगिता के दौरान नीरज के सभी प्रयासों पर नजर डालें तो उनका प्रदर्शन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। पहले प्रयास में उन्होंने 80.97 मीटर का थ्रो किया, जिससे अच्छी शुरुआत मिली लेकिन यह उनकी क्षमता के अनुरूप नहीं था। दूसरे प्रयास में उन्होंने जब 85.83 मीटर की दूरी तय की तो स्टेडियम में मौजूद भारतीय समर्थकों के बीच उत्साह की लहर दौड़ गई। यही थ्रो अंततः उन्हें रजत पदक दिलाने वाला साबित हुआ। तीसरे प्रयास में उनका भाला 81.29 मीटर तक पहुंचा जबकि चौथे प्रयास में दूरी घटकर 80.73 मीटर रह गई।

चौथे प्रयास के बाद नीरज के चेहरे पर निराशा साफ दिखाई दी। वह अपने प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और लगातार बेहतर दूरी हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि बदलते मौसम और शरीर पर पड़ रहे दबाव के कारण वह अपनी लय दोबारा हासिल नहीं कर सके। अंतिम दो प्रयासों में जब उन्हें लगा कि अपेक्षित दूरी हासिल करना संभव नहीं होगा, तब उन्होंने अपने थ्रो को आगे नहीं बढ़ाया। इसके बावजूद दूसरे प्रयास की बदौलत उनका सिल्वर मेडल सुरक्षित रहा।

नीरज के चाचा भीम चोपड़ा ने भी इस उपलब्धि पर खुशी जताई। उनका कहना था कि भारत के लिए हर अंतरराष्ट्रीय पदक बेहद महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में भारतीय जैवलिन थ्रो विश्व स्तर पर नई पहचान बनाएगा। उनके अनुसार अब देश में 80 से 85 मीटर तक भाला फेंकने वाले कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार हो चुके हैं। पहले जिस तरह इस खेल में यूरोपीय देशों का दबदबा माना जाता था, भविष्य में भारत भी इस स्पर्धा में प्रमुख ताकत के रूप में उभरेगा।

उन्होंने कहा कि नीरज चोपड़ा ने भारतीय एथलेटिक्स को नई दिशा दी है। उनके बाद कई युवा खिलाड़ी इस खेल को करियर के रूप में अपना रहे हैं और लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। यही कारण है कि अब भारत के पास अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगामी वैश्विक प्रतियोगिताओं में भारतीय जैवलिन थ्रोअर और भी बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

गांव खंडरा में लोगों ने देर रात तक मुकाबले का आनंद लिया। नीरज के दूसरे थ्रो के बाद घर में मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। जब यह स्पष्ट हो गया कि भारत के खाते में सिल्वर मेडल आ चुका है, तब ग्रामीणों ने मिठाइयां बांटीं और जश्न मनाया। कई लोगों ने कहा कि नीरज ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी वह देश की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं।

इस दौरान नीरज के पैतृक घर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। उनके चाचा भीम चोपड़ा पूरे मुकाबले के दौरान लोगों के साथ बैठकर हर थ्रो पर नजर बनाए हुए थे। हालांकि इस बार उनके पिता सतीश चोपड़ा और दादा धर्म सिंह किसी कारणवश मुकाबला देखने के लिए वहां मौजूद नहीं थे, लेकिन उन्होंने बाद में बेटे की उपलब्धि पर खुशी व्यक्त की।

कॉमनवेल्थ गेम्स का यह मुकाबला भारतीय खेल इतिहास में एक और यादगार अध्याय जोड़ गया। भले ही इस बार स्वर्ण पदक भारत के हाथ नहीं लगा, लेकिन नीरज चोपड़ा ने यह साबित कर दिया कि वह लगातार विश्व स्तर पर शीर्ष खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाए हुए हैं। कठिन मौसम, चोट और कड़ी प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों के बावजूद उन्होंने देश के लिए रजत पदक जीतकर करोड़ों भारतीयों को गर्व महसूस कराया। अब खेल प्रेमियों की नजरें उनकी आगामी प्रतियोगिताओं पर टिकी हैं, जहां उनसे एक बार फिर स्वर्णिम प्रदर्शन की उम्मीद की जाएगी।