त्योहारी खरीदारी से पहले बढ़ेगा महंगाई का असर: टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, पेंट, टायर समेत कई जरूरी सामान होंगे महंगे

त्योहारी खरीदारी से पहले बढ़ेगा महंगाई का असर: टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, पेंट, टायर समेत कई जरूरी सामान होंगे महंगे

त्योहारों के मौसम की शुरुआत से पहले आम लोगों की जेब पर महंगाई का एक और बोझ पड़ने वाला है। देश की कई प्रमुख उपभोक्ता कंपनियों ने संकेत दिए हैं कि आने वाले महीनों में उनके कई उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की जाएगी। इस फैसले का असर रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं से लेकर घर की मरम्मत और निर्माण में काम आने वाले उत्पादों तक दिखाई देगा।

कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल और ऊर्जा की लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च लगातार ऊपर जा रहा है। ऐसे में बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाना उनकी मजबूरी बन गया है। यही कारण है कि टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, डिशवॉश बार, पेंट, टायर, नमक, घरेलू उपकरण और डेयरी उत्पादों जैसी कई वस्तुएं आने वाले समय में महंगी हो सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर हो रही है जब अगस्त से नवंबर तक देश में त्योहारों का लंबा दौर शुरू होता है। इस दौरान बाजार में खरीदारी सामान्य दिनों की तुलना में काफी ज्यादा रहती है। कंपनियां मानती हैं कि मजबूत मांग के कारण कीमतों में बढ़ोतरी का असर बिक्री पर सीमित रहेगा।

देश की प्रमुख एफएमसीजी कंपनियों में शामिल हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) ने भी संकेत दिए हैं कि वह अपने होम केयर पोर्टफोलियो के कुछ उत्पादों की कीमतों में बदलाव करेगी। कंपनी के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल से जुड़े डेरिवेटिव्स महंगे होने के कारण उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ा है। इसी वजह से डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग उत्पादों की कीमतों में चरणबद्ध तरीके से संशोधन किया जाएगा।

कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने निवेशकों के साथ बातचीत में कहा कि वैश्विक बाजार में जारी अस्थिरता का सीधा असर लागत पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में कीमतों को पूरी तरह स्थिर रखना संभव नहीं है। हालांकि कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ग्राहकों पर अचानक अधिक बोझ डालने के बजाय जरूरत के अनुसार संतुलित तरीके से कीमतों में बदलाव करेगी।

केवल एफएमसीजी कंपनियां ही नहीं, बल्कि कई अन्य सेक्टर की कंपनियां भी अपने उत्पाद महंगे कर चुकी हैं या जल्द करने की तैयारी में हैं। हैवेल्स इंडिया ने अपने विभिन्न उत्पादों की कीमतों में करीब 8 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है। वहीं टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने टाटा साल्ट के दाम लगभग 7 प्रतिशत तक बढ़ा दिए हैं। इसके अलावा एशियन पेंट्स, डोडला डेयरी सहित कई कंपनियां भी लागत बढ़ने का हवाला देते हुए मूल्य संशोधन की योजना पर काम कर रही हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि कई प्रकार के औद्योगिक कच्चे माल और ऊर्जा लागत भी प्रभावित हुई है। ईंधन महंगा होने से परिवहन खर्च बढ़ जाता है, जिसका असर अंततः तैयार उत्पादों की कीमत पर दिखाई देता है। यही वजह है कि कंपनियां लगातार दूसरी तिमाही में अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही हैं।

त्योहारी सीजन भारतीय बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। रक्षाबंधन, गणेश उत्सव, नवरात्रि, दशहरा, करवा चौथ और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान उपभोक्ता खर्च में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है। कई उद्योगों की सालाना बिक्री का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी अवधि में आता है। इसलिए कंपनियों को उम्मीद है कि कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद मांग बनी रहेगी।

आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि बाजार में खरीदारी मजबूत रहती है तो कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत की भरपाई आसानी से कर सकेंगी। हालांकि इसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ सकता है, क्योंकि रोजमर्रा की कई आवश्यक वस्तुएं पहले से ही महंगी हो रही हैं।

महंगाई के मोर्चे पर भी हाल के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले रहे हैं। जून महीने में खुदरा महंगाई दर एक बार फिर भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई। खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में आई तेजी को इसका प्रमुख कारण माना गया। हालांकि यह दर अभी भी रिजर्व बैंक के निर्धारित 2 से 6 प्रतिशत के सहनीय दायरे के भीतर बनी हुई है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में कंपनियां बड़े पैमाने पर कीमतें बढ़ाती हैं और मानसून उम्मीद के अनुरूप नहीं रहता, तो खाद्य महंगाई और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है। इससे आम लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होने की संभावना भी जताई जा रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए औसत महंगाई दर लगभग 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया है। ऐसे में केंद्रीय बैंक की आगामी मौद्रिक नीति बैठक पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल यह उम्मीद जताई जा रही है कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर बनाए रखेगा।

सरकार भी महंगाई के बदलते स्वरूप पर लगातार नजर रख रही है। वित्त मंत्रालय का मानना है कि अब महंगाई केवल खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं रही है। वैश्विक स्तर पर ईंधन की ऊंची कीमतें और मौसम से जुड़ी चुनौतियां अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की लागत को भी प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में महंगाई को नियंत्रित रखना नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

उद्योग जगत का तर्क है कि उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी के कारण कीमतों में संशोधन करना आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चा माल, बिजली, पैकेजिंग, मजदूरी और परिवहन जैसी सभी लागतों में वृद्धि का असर कंपनियों के लाभ पर पड़ता है। यदि कीमतें नहीं बढ़ाई जाएं तो मार्जिन पर भारी दबाव आता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कंपनियां लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत खुद वहन नहीं कर सकतीं। इसलिए धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक इसका असर पहुंचना स्वाभाविक है। उनका मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों में सुधार होने तक कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

खाद्य एवं रेस्तरां कारोबार से जुड़ी कंपनियां भी भविष्य को लेकर सतर्क हैं। उद्योग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अभी तक उपभोक्ता मांग स्थिर बनी हुई है, लेकिन यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है और ‘अल नीनो’ का प्रभाव बढ़ता है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव आगे चलकर उपभोग पर भी दिखाई दे सकता है।

इसके बावजूद वर्तमान में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बाजार की स्थिति सकारात्मक मानी जा रही है। रिटेल सेक्टर से जुड़े सर्वे बताते हैं कि जून महीने में खुदरा बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत बढ़ी है। यह संकेत देता है कि उपभोक्ताओं की खरीदारी क्षमता फिलहाल बनी हुई है।

आर्थिक गतिविधियों से जुड़े अन्य संकेतक भी मांग मजबूत रहने की ओर इशारा करते हैं। जीएसटी संग्रह, राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल से होने वाली आय और कई अन्य आर्थिक आंकड़ों में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे स्पष्ट होता है कि बाजार में उपभोग का स्तर अभी संतोषजनक बना हुआ है।

विशेषज्ञों ने ‘अल नीनो’ को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है। यह प्रशांत महासागर में समुद्री जल के असामान्य रूप से गर्म होने की प्राकृतिक घटना है, जिसका असर भारत के मानसून पर पड़ सकता है। यदि बारिश कम होती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना रहती है।

वहीं ‘इनपुट कॉस्ट’ उस कुल खर्च को कहा जाता है जो किसी उत्पाद को तैयार करने में कच्चे माल, ऊर्जा, परिवहन, पैकेजिंग और श्रम के रूप में लगता है। जब यह लागत बढ़ती है तो कंपनियों के सामने या तो अपना लाभ कम करने या फिर उत्पादों की कीमत बढ़ाने का विकल्प बचता है। मौजूदा परिस्थितियों में अधिकांश कंपनियां दूसरा रास्ता चुन रही हैं।

आने वाले त्योहारी सीजन में बाजार में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है, लेकिन इसके साथ ही उपभोक्ताओं को कई जरूरी सामानों के लिए पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। यदि वैश्विक हालात और कच्चे माल की लागत में जल्द राहत नहीं मिलती है तो आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।