केंद्र सरकार की ओर से प्रत्यक्ष कर मामलों में विभागीय अपील दाखिल करने की मौद्रिक सीमा बढ़ाने का निर्णय अब असर दिखाने लगा है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, इस बदलाव के बाद कर विवादों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। सरकार का कहना है कि नई सीमा लागू होने के बाद आयकर विभाग ने बड़ी संख्या में पुराने मामलों में अपीलें वापस लीं, जबकि कई मामलों में अपील दाखिल ही नहीं की गई। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न अपीलीय मंचों पर लंबित टैक्स विवाद कम हुए और कुल विवादित कर मांग में करीब 16,690 करोड़ रुपये की अनुमानित कमी आई। सरकार का मानना है कि यह कदम न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने और करदाताओं को अनावश्यक मुकदमेबाजी से राहत देने की दिशा में अहम साबित हुआ है।
लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि केंद्रीय बजट 2024-25 में घोषित नई मौद्रिक सीमाओं को अधिसूचित किए जाने के बाद आयकर विभाग ने अपनी अपील नीति में बदलाव किया। इसके तहत ऐसे मामलों में विभागीय अपील नहीं की गई जिनमें विवादित कर राशि निर्धारित सीमा से कम थी। कई मामलों में पहले से दायर अपीलें भी वापस ले ली गईं। इससे न केवल अदालतों का बोझ कम हुआ बल्कि करदाताओं और विभाग दोनों को लंबे समय तक चलने वाले विवादों से राहत मिली।
सरकार के अनुसार, सबसे पहले इसका असर आयकर अपीलीय अधिकरण (आईटीएटी) में देखने को मिला। यहां विभाग ने सैकड़ों मामलों में पहले से दायर अपीलें वापस लीं, जबकि हजारों नए मामलों में अपील दाखिल करने से परहेज किया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 443 अपीलें वापस ली गईं, जबकि 11,390 मामलों में विभाग ने अपील दायर नहीं की। इस कदम से अकेले आईटीएटी स्तर पर विवादित कर मांग में लगभग 3,662.82 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। इससे अधिकरण के समक्ष लंबित मामलों का दबाव भी घटा है और अन्य महत्वपूर्ण मामलों के निस्तारण में तेजी आने की संभावना जताई जा रही है।
वित्त मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि नई नीति का प्रभाव केवल आयकर अपीलीय अधिकरण तक सीमित नहीं रहा। उच्च न्यायालयों में भी इसका व्यापक असर देखने को मिला। विभाग ने वहां बड़ी संख्या में लंबित अपीलों को वापस लेने का फैसला किया। आंकड़ों के अनुसार, 4,791 मामलों में विभाग ने अपील वापस ली, जबकि 5,565 मामलों में नई अपील दाखिल नहीं की गई। इसके कारण उच्च न्यायालयों में लंबित कर विवादों का बोझ कम हुआ और लगभग 9,218.71 करोड़ रुपये की विवादित कर मांग समाप्त होने का अनुमान लगाया गया। सरकार का कहना है कि इससे न्यायालयों को अधिक महत्वपूर्ण और बड़े मामलों की सुनवाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी।
सर्वोच्च न्यायालय में भी नई अपील नीति का प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आया। सरकार के मुताबिक, 744 मामलों में विभाग ने अपनी अपीलें वापस ले लीं, जबकि 534 मामलों में अपील दाखिल नहीं की गई। इस फैसले से सर्वोच्च न्यायालय में भी टैक्स विवादों की संख्या में कमी आई और लगभग 3,807.15 करोड़ रुपये की विवादित कर मांग कम होने का अनुमान है। सरकार का कहना है कि शीर्ष अदालत में केवल महत्वपूर्ण और उच्च मूल्य वाले मामलों को ही आगे बढ़ाने की नीति से न्यायिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।
यदि तीनों प्रमुख अपीलीय मंचों—आयकर अपीलीय अधिकरण, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय—के आंकड़ों को एक साथ देखा जाए, तो कुल विवादित कर मांग में लगभग 16,690 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई है। वित्त मंत्री ने संसद में कहा कि यह अनुमान विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य कर प्रशासन को अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाना है। सरकार का मानना है कि इससे करदाताओं और विभाग के बीच अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी तथा न्यायिक प्रक्रिया अधिक संतुलित बनेगी।
सरकार ने यह भी बताया कि नई मौद्रिक सीमाएं 17 सितंबर 2024 से प्रभावी हैं। केंद्रीय बजट 2024-25 में इस बदलाव की घोषणा की गई थी ताकि छोटे और मध्यम स्तर के कर विवादों को अदालतों तक ले जाने के बजाय विभागीय स्तर पर ही समाप्त किया जा सके। नई व्यवस्था के अनुसार अब आयकर अपीलीय अधिकरण में विभागीय अपील तभी दायर होगी जब विवादित कर राशि 60 लाख रुपये से अधिक होगी। इसी तरह उच्च न्यायालय में अपील के लिए सीमा 2 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में विभागीय अपील केवल उन मामलों में होगी जिनमें विवादित कर राशि 5 करोड़ रुपये या उससे अधिक हो।
वित्त मंत्रालय का मानना है कि इन सीमाओं में वृद्धि से विभाग अपनी ऊर्जा और संसाधनों को बड़े और महत्वपूर्ण मामलों पर केंद्रित कर सकेगा। पहले अपेक्षाकृत कम राशि वाले मामलों में भी अपीलें दाखिल होने के कारण अदालतों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता था। अब नई नीति के कारण न्यायिक संस्थानों को राहत मिलने के साथ-साथ करदाताओं को भी वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया से बचने का अवसर मिलेगा।
निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि पिछले एक दशक से अधिक समय में सरकार ने कर व्यवस्था को अधिक सरल, डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए कई सुधार लागू किए हैं। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने करदाताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अनेक नई व्यवस्थाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य अनुपालन को आसान बनाना और विवादों को कम करना है।
सरकार द्वारा लागू किए गए प्रमुख सुधारों में प्री-फिल्ड आयकर रिटर्न (आईटीआर) की सुविधा शामिल है, जिसके माध्यम से कई जानकारियां पहले से ही रिटर्न में उपलब्ध रहती हैं और करदाता को उन्हें दोबारा भरने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अलावा संशोधित फॉर्म 26एएस के जरिए करदाताओं को अपने वित्तीय लेन-देन और टैक्स से जुड़ी अधिक विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है। सरकार ने अपडेटेड आयकर रिटर्न दाखिल करने की सुविधा भी शुरू की है, जिससे करदाता निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी त्रुटियों को सुधार सकते हैं।
इसी क्रम में फेसलेस असेसमेंट और फेसलेस अपील प्रणाली लागू की गई, जिससे करदाताओं और अधिकारियों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क कम हुआ और प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी। सरकार ने उन प्रावधानों में भी बदलाव किया है जिनके तहत रिटर्न दाखिल नहीं करने वालों पर अधिक टीडीएस और टीसीएस लगाया जाता था। इसके अलावा सेफ हार्बर नियमों का युक्तिकरण तथा अनुमानित कराधान योजना के विस्तार जैसे कदम भी उठाए गए हैं ताकि छोटे व्यवसायों और पेशेवरों के लिए कर अनुपालन आसान बनाया जा सके।
सरकार का कहना है कि इन सभी सुधारों का उद्देश्य केवल कर संग्रह बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें करदाता और विभाग के बीच भरोसा मजबूत हो तथा अनावश्यक मुकदमेबाजी कम हो। नई अपील सीमा भी इसी व्यापक सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकार का दावा है कि इससे अदालतों में लंबित मामलों की संख्या घटेगी, न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी और विभाग अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा। वहीं, करदाताओं को भी कम मूल्य वाले मामलों में लंबे कानूनी विवादों का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिससे समय और धन दोनों की बचत होगी।




