रुपया कितना गिरे, इसे बाजार पर छोड़ना चाहिए : PM की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल की राय

रुपया कितना गिरे, इसे बाजार पर छोड़ना चाहिए : PM की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल की राय

भारतीय अर्थव्यवस्था में रुपए की चाल को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और केंद्रीय बैंक को उसकी गिरती कीमत को रोकने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल का मानना है कि रुपए के स्तर को कृत्रिम तरीके से बनाए रखने की कोशिश करने के बजाय उसे बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तय होने देना चाहिए। उनके मुताबिक भारत की आर्थिक नीति का असली लक्ष्य करेंसी के किसी निश्चित स्तर को बचाना नहीं, बल्कि महंगाई को नियंत्रण में रखना होना चाहिए।

सान्याल ने स्पष्ट किया कि रुपए में उतार-चढ़ाव अपने आप में अर्थव्यवस्था की कमजोरी का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी खुले बाजार वाली अर्थव्यवस्था में करेंसी की कीमत कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों से प्रभावित होती है। ऐसे में हर बार रुपए में गिरावट आने पर उसे रोकने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करना लंबे समय के लिए उचित रणनीति नहीं हो सकती।

रुपए की कीमत तय करने में बाजार की भूमिका अहम

संजीव सान्याल के मुताबिक भारत को रुपए की विनिमय दर के लिए कोई निश्चित स्तर तय करके उसे बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर करेंसी की कीमत में बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार, पूंजी के प्रवाह, व्यापार या दूसरे आर्थिक कारणों से रुपए की कीमत में बदलाव आता है, तो उसे पूरी तरह रोकने की कोशिश करने के बजाय उसके प्रभावों को समझना जरूरी है।

उनका तर्क है कि भारत ने जब महंगाई को लक्ष्य बनाकर मौद्रिक नीति का ढांचा अपनाया था, तब उसने करेंसी एक्सचेंज रेट को स्थिर रखने के मुकाबले मूल्य स्थिरता को प्राथमिकता देने का रास्ता चुना था। इसलिए मौजूदा नीति के साथ रुपए के किसी खास स्तर को हर हाल में बनाए रखना तार्किक नहीं होगा।

एक साथ सब कुछ नियंत्रित करना संभव नहीं

सान्याल ने खुले पूंजी खाते वाली अर्थव्यवस्थाओं के सामने आने वाली चुनौती का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक किसी देश के लिए एक साथ स्वतंत्र मौद्रिक नीति चलाना, अपनी मुद्रा की विनिमय दर को सख्ती से नियंत्रित करना और पूंजी के मुक्त प्रवाह को बनाए रखना आसान नहीं है।

अर्थशास्त्र में इसे कई बार नीति संबंधी एक महत्वपूर्ण दुविधा के रूप में देखा जाता है। यदि भारत अपनी मौद्रिक नीति को घरेलू परिस्थितियों के हिसाब से चलाना चाहता है, तो उसे करेंसी के स्तर को पूरी तरह नियंत्रित करने की कोशिश से बचना होगा। इसी वजह से सान्याल के अनुसार भारत जैसे बड़े घरेलू बाजार वाली अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई पर ध्यान केंद्रित करना ज्यादा व्यावहारिक विकल्प है।

महंगाई कम रखना क्यों है ज्यादा जरूरी?

रुपए की कीमत में गिरावट का सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसका असर घरेलू कीमतों पर कितना पड़ता है। यदि कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं और कच्चे माल की कीमत बढ़ाता है और इसका असर देश में महंगाई पर पड़ने लगता है, तो स्थिति चिंता का विषय बन सकती है।

लेकिन यदि घरेलू महंगाई नियंत्रण में बनी रहती है, तो केवल रुपए के कमजोर होने को आर्थिक संकट मानना जरूरी नहीं है। सान्याल का मानना है कि नीति निर्माताओं को इसी अंतर को समझना चाहिए। करेंसी का स्तर बचाने की बजाय यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उसकी चाल से देश के भीतर कीमतों पर कितना दबाव बन रहा है।

इन्फ्लेशन टारगेटिंग ने बदली आर्थिक नीति की दिशा

भारत ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए इन्फ्लेशन टारगेटिंग यानी मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण व्यवस्था को अपनाया है। इस व्यवस्था के तहत मौद्रिक नीति का प्रमुख उद्देश्य कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है। सान्याल ने इस व्यवस्था को भारत के लिए प्रभावी बताया है।

उनके अनुसार एक समय भारत में महंगाई काफी ऊंचे स्तर पर रहती थी और यह दर कई बार 8 से 12 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाती थी। इसके मुकाबले पिछले करीब एक दशक में महंगाई को 2 से 6 प्रतिशत के दायरे में रखने में सफलता मिली है। यही वजह है कि उनके मुताबिक अब आर्थिक नीति का ध्यान रुपए के किसी खास स्तर की रक्षा करने के बजाय महंगाई को स्थिर रखने पर होना चाहिए।

इस नजरिए से देखें तो करेंसी में गिरावट और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है। कमजोर रुपया तभी बड़ी समस्या बनता है, जब उससे अर्थव्यवस्था में व्यापक असंतुलन या महंगाई का दबाव पैदा होने लगे।

विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कब किया जाना चाहिए?

सान्याल ने यह भी स्पष्ट किया कि बाजार को रुपए की कीमत तय करने देने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय रिजर्व बैंक या सरकार को करेंसी बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाना चाहिए। केंद्रीय बैंक के पास मौजूद विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर किया जा सकता है।

हालांकि इसका उद्देश्य रुपए की कीमत को किसी मनचाहे स्तर पर रोकना नहीं होना चाहिए। विदेशी मुद्रा भंडार का बेहतर इस्तेमाल अचानक होने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और बाजार में पैदा होने वाले असामान्य दबाव को कम करने के लिए किया जा सकता है।

दूसरे शब्दों में, अगर रुपए में अचानक बहुत तेज गिरावट या अस्थिरता आती है, तो केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करके बाजार को स्थिरता दे सकता है। लेकिन सामान्य बाजार परिस्थितियों में करेंसी को उसके आर्थिक आधार के अनुसार आगे बढ़ने देना ज्यादा उचित होगा।

कमजोर रुपया एक्सपोर्ट के लिए बन सकता है फायदा

रुपए में गिरावट को आमतौर पर नकारात्मक खबर के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। कमजोर घरेलू मुद्रा से भारतीय निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है।

यदि भारत में उत्पादन लागत और घरेलू कीमतें नियंत्रण में हैं, तो रुपए के कमजोर होने से भारतीय उत्पाद विदेशी खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकते हैं। इससे निर्यातकों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है।

सान्याल का कहना है कि दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में उनकी मुद्राओं की कीमत समय-समय पर बदलती रहती है। इसलिए केवल करेंसी में गिरावट को देखकर अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का आकलन करना सही नहीं होगा। घरेलू महंगाई, उत्पादन, रोजगार, व्यापार और आर्थिक विकास जैसे दूसरे संकेतकों को भी साथ में देखना जरूरी है।

भारत की नीति चीन से अलग

सान्याल ने रुपए में होने वाले बदलाव की तुलना चीन की मुद्रा नीति से अलग तरीके से देखने की बात कही। उनके अनुसार भारत जानबूझकर अपनी करेंसी को कमजोर करने की रणनीति नहीं अपना रहा है। भारतीय रुपए की चाल को बाजार की परिस्थितियों और आर्थिक बुनियादी कारकों के आधार पर समझा जाना चाहिए।

उनके मुताबिक लंबे समय में करेंसी की वास्तविक क्रय शक्ति और देशों के बीच कीमतों का अंतर भी उसकी दिशा को प्रभावित करता है। यहीं परचेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या है इन्फ्लेशन टारगेटिंग फ्रेमवर्क?

इन्फ्लेशन टारगेटिंग एक ऐसी मौद्रिक नीति व्यवस्था है, जिसमें केंद्रीय बैंक महंगाई को एक तय सीमा के भीतर रखने का लक्ष्य रखता है। भारत में मौद्रिक नीति का उद्देश्य कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है, ताकि महंगाई बहुत ज्यादा बढ़कर आम लोगों की क्रय शक्ति और अर्थव्यवस्था पर दबाव न डाले।

इस व्यवस्था में ब्याज दरों जैसे मौद्रिक नीति के साधनों का इस्तेमाल महंगाई की स्थिति के अनुसार किया जाता है। इसलिए यदि रुपए में कमजोरी आती भी है, तो नीति निर्माताओं का पहला सवाल यह होना चाहिए कि क्या इसका असर घरेलू महंगाई पर पड़ रहा है।

PPP यानी परचेजिंग पावर पैरिटी क्या है?

परचेजिंग पावर पैरिटी यानी क्रय शक्ति समता एक आर्थिक अवधारणा है, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग देशों की मुद्राओं की वास्तविक खरीद क्षमता की तुलना करने के लिए किया जाता है। इसका मूल विचार यह है कि लंबे समय में समान प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग देशों की मुद्राओं के बीच एक संतुलित संबंध बन सकता है।

यही कारण है कि सान्याल के नजरिए में रुपए की हर गिरावट को तुरंत रोकने की जरूरत नहीं है। यदि देश के भीतर महंगाई नियंत्रण में है, आर्थिक गतिविधियां मजबूत हैं और जरूरत पड़ने पर मौद्रिक नीति के जरिए कीमतों पर दबाव संभाला जा सकता है, तो बाजार को करेंसी का स्तर तय करने देना अधिक स्वाभाविक नीति हो सकती है।

संजीव सान्याल का संदेश यह है कि रुपए की कीमत को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता करने के बजाय भारत को अर्थव्यवस्था के उन संकेतकों पर ध्यान देना चाहिए, जिनका सीधा असर आम लोगों और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है। करेंसी में सामान्य उतार-चढ़ाव को रोकने के बजाय अचानक आने वाले झटकों को संभालना, विदेशी मुद्रा भंडार का समझदारी से इस्तेमाल करना और महंगाई को नियंत्रण में रखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। उनके अनुसार मजबूत और बड़े घरेलू बाजार वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यही दीर्घकालिक नीति ज्यादा उपयुक्त दिखाई देती है।