भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बार फिर देशभर के करोड़ों लोन धारकों और निवेशकों को राहत देते हुए नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। लगातार चौथी बार केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही बरकरार रखने का फैसला लिया है। यह निर्णय आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक के बाद सामने आया, जिसकी जानकारी आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी।
इस फैसले के बाद फिलहाल होम लोन, कार लोन और अन्य फ्लोटिंग ब्याज दर वाले कर्ज लेने वाले लोगों की मासिक ईएमआई (EMI) में कोई बदलाव नहीं होगा। यानी जिन लोगों को उम्मीद थी कि ब्याज दर बढ़ने से उनकी किस्त महंगी हो सकती है, उन्हें फिलहाल राहत मिली है। वहीं नए लोन लेने की योजना बना रहे ग्राहकों के लिए भी यह संकेत सकारात्मक माना जा रहा है।
लगातार चौथी बैठक में दरें स्थिर
आरबीआई ने इससे पहले फरवरी 2026, अप्रैल 2026 और जून 2026 में हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठकों में भी रेपो रेट को स्थिर रखा था। आखिरी बार दिसंबर 2025 में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में बदलाव करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत से घटाकर 5.25 प्रतिशत किया था। उसके बाद से ब्याज दरों में कोई फेरबदल नहीं किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान दे रहा है। महंगाई नियंत्रित रहने, विकास दर में मजबूती और वित्तीय परिस्थितियों के संतुलित रहने के कारण आरबीआई ने ब्याज दरों में बदलाव की जरूरत नहीं समझी।
आखिर क्या होती है रेपो रेट?
रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक जरूरत पड़ने पर वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है और इसका असर ग्राहकों तक पहुंचता है। ऐसे में होम लोन, ऑटो लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।
इसके उलट यदि रेपो रेट घटाई जाती है तो बैंकों की उधारी सस्ती होती है और वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करा सकते हैं। इसलिए रेपो रेट का सीधा असर आम लोगों की ईएमआई, निवेश और बाजार की गतिविधियों पर पड़ता है।
EMI पर फिलहाल नहीं पड़ेगा कोई असर
इस बार रेपो रेट को यथावत रखने का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को मिलेगा जिन्होंने पहले से फ्लोटिंग ब्याज दर पर होम लोन, वाहन ऋण या अन्य कर्ज लिया हुआ है। क्योंकि ब्याज दर में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, इसलिए उनकी मासिक ईएमआई में भी तत्काल कोई वृद्धि नहीं होगी।
हाल के वर्षों में महंगाई और अन्य घरेलू खर्चों के चलते आम परिवारों पर पहले से ही आर्थिक दबाव बना हुआ है। ऐसे में ईएमआई स्थिर रहने से परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। यही वजह है कि बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के जानकार इस फैसले को आम उपभोक्ताओं के लिए राहत भरा मान रहे हैं।
नए कर्ज लेने वालों को भी मिला सकारात्मक संकेत
जो लोग आने वाले समय में घर, कार या व्यवसाय के लिए लोन लेने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण है। रेपो रेट में बढ़ोतरी नहीं होने से फिलहाल बैंकों के लिए ब्याज दर बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि अलग-अलग बैंक अपनी कारोबारी रणनीति के अनुसार ब्याज दरों में सीमित बदलाव कर सकते हैं, लेकिन केंद्रीय बैंक की ओर से कोई अतिरिक्त दबाव नहीं होने के कारण लोन की लागत फिलहाल स्थिर रहने की संभावना है।
उद्योग और कारोबार को मिलेगा फायदा
आरबीआई के इस फैसले का असर केवल आम ग्राहकों तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि उद्योग जगत और कारोबारी क्षेत्र को भी इसका लाभ मिल सकता है। कंपनियां जब विस्तार, नए प्रोजेक्ट या पूंजी निवेश के लिए बैंकों से ऋण लेती हैं तो ब्याज दर उनके खर्च का बड़ा हिस्सा होती है।
यदि ब्याज दरें स्थिर रहती हैं तो कंपनियों की उधारी लागत नियंत्रित रहती है, जिससे निवेश योजनाओं को आगे बढ़ाने में आसानी होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिर ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों को गति देने में मददगार साबित हो सकती हैं।
न्यूट्रल पॉलिसी बरकरार
मौद्रिक नीति समिति ने केवल रेपो रेट को ही स्थिर नहीं रखा बल्कि अपनी नीति का रुख भी “तटस्थ” यानी न्यूट्रल बनाए रखने का फैसला किया है। इसका अर्थ यह है कि आरबीआई फिलहाल भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए किसी एक दिशा में जल्दबाजी नहीं करना चाहता।
अगर आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ती है तो केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाने का विकल्प अपना सकता है, जबकि आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आने पर दरों में कटौती भी संभव हो सकती है। फिलहाल समिति ने दोनों संभावनाओं के लिए संतुलित रुख अपनाया है।
क्यों पहले से थी इसी फैसले की उम्मीद?
मौद्रिक नीति की घोषणा से पहले अधिकांश अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का अनुमान था कि इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इसकी सबसे बड़ी वजह हाल के महीनों में सामने आए सकारात्मक आर्थिक संकेत रहे।
देश में महंगाई आरबीआई के अनुमान के अनुरूप नियंत्रण में बनी हुई है। वहीं औद्योगिक गतिविधियों और उपभोग में भी सुधार देखने को मिला है। इसके अलावा बाहरी क्षेत्र से जुड़े कई आर्थिक संकेतक भी अपेक्षाकृत मजबूत रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञ पहले से ही रेपो रेट स्थिर रहने का अनुमान लगा रहे थे।
वैश्विक चुनौतियों पर भी जताई चिंता
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वैश्विक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को प्रभावित कर रहे हैं। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री परिवहन और वैश्विक व्यापार पर इन घटनाओं का असर पड़ने की आशंका बनी हुई है। ऐसे हालात में दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं दबाव महसूस कर रही हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद आरबीआई ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया है। गवर्नर ने कहा कि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है।
सरकारी निवेश, निजी क्षेत्र की गतिविधियों और उपभोक्ता खर्च में सुधार से आर्थिक विकास को समर्थन मिल रहा है। इसी कारण केंद्रीय बैंक को भरोसा है कि भारत आने वाले समय में भी विकास की मजबूत रफ्तार बनाए रख सकता है।
जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया
मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास का अनुमान भी संशोधित किया है। केंद्रीय बैंक ने अब वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह पहले के अनुमान की तुलना में 10 बेसिस प्वाइंट अधिक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर मानसून, नियंत्रित महंगाई, मजबूत खपत और निवेश गतिविधियों में सुधार के कारण आर्थिक विकास को समर्थन मिल सकता है। यदि वैश्विक परिस्थितियां अधिक खराब नहीं होती हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विकास लक्ष्य के करीब रह सकती है।
आगे क्या रहेगी नजर?
अब बाजार, बैंकिंग सेक्टर और आम लोगों की नजर आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति बैठक पर रहेगी। यदि आने वाले महीनों में महंगाई, वैश्विक हालात या घरेलू आर्थिक आंकड़ों में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है तो केंद्रीय बैंक अपनी रणनीति बदल सकता है।
फिलहाल रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखने के फैसले से लोन लेने वालों, उद्योगों और वित्तीय बाजारों को स्थिरता का संदेश मिला है। ईएमआई में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं होने से लाखों परिवारों को राहत मिलेगी, जबकि व्यवसायों को भी निवेश और विस्तार की योजनाएं जारी रखने में सहूलियत मिलने की उम्मीद है।




