होर्मुज संकट के बीच भारत ने बदली एनर्जी रणनीति, अमेरिका से बढ़ी LPG-LNG सप्लाई; कतर को बड़ा झटका

होर्मुज संकट के बीच भारत ने बदली एनर्जी रणनीति, अमेरिका से बढ़ी LPG-LNG सप्लाई; कतर को बड़ा झटका

मध्य पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के जरिए ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। संकट के दौरान भारत ने उन देशों पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए, जहां से समुद्री मार्गों के जरिए तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। इसका सबसे बड़ा असर भारत के LPG और LNG आयात के स्रोतों में दिखाई दे रहा है।

अमेरिका अब भारत के लिए LPG का सबसे बड़ा सप्लायर बन चुका है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने शुक्रवार को CII के एक कार्यक्रम में बताया कि होर्मुज संकट के बाद भारत की कुकिंग गैस जरूरत का करीब 67 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से पूरा हो रहा है। यानी जिस ऊर्जा आपूर्ति के लिए भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर था, उसमें अब अमेरिका की भूमिका तेजी से बढ़ गई है।

इतना ही नहीं, LNG के मामले में भी तस्वीर बदल गई है। इक्विरस सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच अमेरिका ने कतर को पीछे छोड़ते हुए भारत को LNG की सबसे ज्यादा मात्रा उपलब्ध कराई। इस अवधि में भारत के LNG आयात में कतर की हिस्सेदारी में भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि अमेरिका से आने वाली गैस में कई गुना वृद्धि हुई।

LNG आयात में अमेरिका सबसे आगे

भारत ने मई से जुलाई 2026 के दौरान कुल 7.08 मिलियन टन LNG का आयात किया। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले यह मात्रा करीब 15 प्रतिशत अधिक है। हालांकि कुल आयात बढ़ा है, लेकिन इस दौरान भारत के LNG सप्लाई नेटवर्क में बड़ा बदलाव आया है। इक्विरस सिक्योरिटीज के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका ने तीन महीनों में भारत को करीब 2.19 मिलियन टन LNG भेजी। इसके साथ ही वह भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर बन गया। नाइजीरिया 1.31 मिलियन टन की सप्लाई के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

दूसरी ओर, कतर की स्थिति काफी कमजोर हुई है। मई-जुलाई के दौरान कतर से भारत को केवल 0.23 मिलियन टन LNG मिली। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 91 प्रतिशत की भारी गिरावट है।

इस बदलाव से साफ है कि भारत ने LNG की खरीद को एक ही क्षेत्र या कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित रखने के बजाय सप्लायर बेस को ज्यादा व्यापक करने की कोशिश की है। अमेरिका, अफ्रीका और गैर-कतरी मिडिल ईस्ट के देशों से आयात बढ़ना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

ओमान की LNG सप्लाई में 341 प्रतिशत उछाल

LNG आयात के आंकड़ों में ओमान भी तेजी से उभरता हुआ सप्लायर रहा। मई से जुलाई के बीच ओमान से भारत की LNG सप्लाई में सालाना आधार पर 341 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह इस अवधि में किसी प्रमुख सप्लायर की सबसे तेज बढ़ोतरी में से एक रही।

भारत के लिए सप्लाई के स्रोतों का इस तरह बदलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा आयात के लिए समुद्री रास्तों पर किसी एक क्षेत्र की निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी अनिश्चितताओं के बाद भारत ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाकर इस जोखिम को कम करने का प्रयास किया है।

देश में प्राकृतिक गैस की मांग भी बढ़ी

आयात स्रोतों में बदलाव के साथ भारत में प्राकृतिक गैस की मांग में भी सुधार देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार जून 2026 में देश की कुल गैस मांग 197 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन यानी mmscmd तक पहुंच गई। यह मई की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक और पिछले साल के मुकाबले 2 प्रतिशत ज्यादा है। यदि पावर सेक्टर को अलग कर दिया जाए तो गैस की मांग 176 mmscmd रही। यह आंकड़ा संकट से पहले के स्तर के आसपास पहुंचने का संकेत देता है।

LNG की खपत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मई की तुलना में LNG की खपत करीब 13 प्रतिशत बढ़ी और सालाना आधार पर इसमें 10 प्रतिशत का इजाफा हुआ। कुल LNG खपत लगभग 110 mmscmd रही। वहीं घरेलू स्तर पर उपलब्ध गैस की खपत करीब 87 mmscmd रही।

भारत की गैस आयात निर्भरता इस दौरान लगभग 56 प्रतिशत दर्ज की गई। इसका मतलब है कि देश की प्राकृतिक गैस जरूरत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी विदेशी सप्लाई से पूरा होता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों और समुद्री मार्गों में होने वाले बदलाव भारत के ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित कर सकते हैं।

CGD और फर्टिलाइजर सेक्टर में सबसे ज्यादा गैस इस्तेमाल

भारत में गैस की खपत को अलग-अलग क्षेत्रों में देखें तो सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन यानी CGD सेक्टर सबसे बड़ा उपभोक्ता बना हुआ है। जून में इस क्षेत्र ने करीब 58 mmscmd गैस का इस्तेमाल किया।

इसके बाद फर्टिलाइजर उद्योग का स्थान रहा, जहां गैस की खपत करीब 55 mmscmd रही। अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 41 mmscmd गैस का उपयोग हुआ।

पावर सेक्टर की मांग भी सुधरकर 21 mmscmd तक पहुंची। रिफाइनरी क्षेत्र ने करीब 15 mmscmd गैस इस्तेमाल की। वहीं पेट्रोकेमिकल उद्योग की खपत लगभग 7 mmscmd रही। हालांकि पेट्रोकेमिकल सेक्टर में गैस की मांग अभी भी पिछले साल के मुकाबले 48 प्रतिशत कम है।

महंगी LNG के बावजूद भारत की खरीद जारी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में LNG की कीमतें ऊंची रहने के बावजूद भारत ने आयात में कमी नहीं आने दी। एशियाई स्पॉट LNG की कीमतें 20 डॉलर प्रति MMBtu से ऊपर बनी हुई थीं, फिर भी भारत में आयात मजबूत रहा।

मई में LNG के करीब 2.4 मिलियन टन बर्थ अराइवल्स दर्ज किए गए, जबकि जून में यह आंकड़ा लगभग 2.3 मिलियन टन रहा। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में कुल LNG अराइवल्स करीब 6.2 मिलियन टन रहे। जुलाई के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इस महीने करीब 2.1 मिलियन टन LNG भारत पहुंची।

इक्विरस सिक्योरिटीज का अनुमान है कि जुलाई में भारत की गैस मांग मजबूत बनी रह सकती है। हालांकि अगस्त में मोरबी से जुड़े औद्योगिक कारणों और मौसमी प्रभावों के चलते मांग में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी LNG बाजार में दबाव बना हुआ है। चीन का LNG आयात मौसमी औसत से ऊपर पहुंचा है। वहीं यूरोप में सर्दियों से पहले गैस स्टोरेज लगभग 58 प्रतिशत है, जो ऐतिहासिक औसत से नीचे बताया गया है। ऐसे माहौल में एशियाई बाजार में LNG की कीमतों पर दबाव बने रहने की संभावना है।

होर्मुज संकट में भी पेट्रोल-डीजल की कमी नहीं होने दी: पुरी

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि मध्य पूर्व में संकट और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी बाधाओं के बावजूद भारत में पेट्रोलियम उत्पादों और LPG की उपलब्धता प्रभावित नहीं होने दी गई। उन्होंने बताया कि युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने से पहले भारत अपने कच्चे तेल का करीब 50 प्रतिशत, LPG का लगभग 90 प्रतिशत और अन्य गैस का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा ऐसे मार्ग से हासिल करता था, जो होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था।

सप्लाई में जोखिम बढ़ते ही भारत ने आयात के वैकल्पिक स्रोत तलाशने शुरू कर दिए। इसके साथ ही घरेलू LPG उत्पादन को भी बढ़ाने पर जोर दिया गया। पुरी के मुताबिक इसका परिणाम यह रहा कि देश में कहीं भी LPG या ईंधन की ऐसी स्थिति नहीं बनी, जिससे बड़े पैमाने पर कमी पैदा हो।

उन्होंने कहा कि देश के 1.07 लाख से ज्यादा फ्यूल आउटलेट्स में से एक भी आउटलेट सूखा नहीं रहा। तुलना करें तो 2014 में देश में लगभग 52 हजार फ्यूल आउटलेट्स थे। यानी पिछले वर्षों में वितरण नेटवर्क का आकार भी काफी बढ़ा है।

27 से बढ़कर 41 देशों से कच्चा तेल खरीद रहा भारत

ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारत ने केवल गैस के क्षेत्र में ही सप्लायर नहीं बदले हैं। कच्चे तेल की खरीद के मामले में भी देश ने स्रोतों का दायरा बढ़ाया है।

भारत पहले करीब 27 देशों से क्रूड ऑयल खरीदता था, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 41 देशों तक पहुंच चुकी है। सरकार की रणनीति का उद्देश्य किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम करना है।

पुरी के अनुसार भारत के पास लगभग 60 दिनों का क्रूड ऑयल कवर भी बना रहा। इस तरह देश ने तत्काल संकट से निपटने के साथ-साथ भविष्य में सप्लाई बाधित होने की स्थिति के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रखने की कोशिश की है।

इसी दिशा में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन का नेटवर्क भी तेजी से बढ़ाया गया है। CGD की पहुंच 55 भौगोलिक क्षेत्रों से बढ़कर 309 क्षेत्रों तक हो गई है। इससे देश के ज्यादा हिस्सों में पाइप्ड गैस और अन्य गैस आधारित सुविधाओं का विस्तार संभव हुआ है।

गहरे समुद्र में तेल-गैस खोज पर 84 हजार करोड़ रुपये का दांव

भारत अब केवल आयात स्रोतों को बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहता। सरकार घरेलू स्तर पर तेल और प्राकृतिक गैस की खोज बढ़ाने की दिशा में भी बड़ा निवेश करने की तैयारी कर रही है।

इसके लिए ₹84,000 करोड़ के समुद्र मंथन कार्यक्रम को मंजूरी दी गई है। इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस के नए भंडार तलाशना है। सरकार का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने से लंबे समय में आयात पर निर्भरता घटाई जा सकती है और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है।

पुरी ने स्पष्ट किया कि गहरे समुद्र में ड्रिलिंग का काम सरकार खुद नहीं करेगी। इसमें निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। ऑफशोर एक्सप्लोरेशन में निवेश काफी जोखिम भरा होता है, इसलिए सरकार निजी कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सहायता देने की योजना पर काम कर रही है। इसके तहत एक कुएं पर अधिकतम ₹650 करोड़ या ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत तक आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा।

कुल मिलाकर, होर्मुज संकट ने भारत की ऊर्जा नीति को एक तरह से नई दिशा दी है। LPG और LNG के लिए अमेरिका जैसे नए स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने, कच्चे तेल के सप्लायर देशों की संख्या बढ़ाने, घरेलू गैस उत्पादन को प्रोत्साहित करने और समुद्र की गहराइयों में नए तेल-गैस भंडार तलाशने की कोशिशें इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। कतर से LNG आयात में 91 प्रतिशत की गिरावट और अमेरिका की सप्लाई में 253 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करती है।

(Photo : AI Generated)