अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता रहा है, लेकिन अब वहां पढ़ाई का सपना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन और वीजा नीतियों का असर भारतीय विद्यार्थियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वर्ष 2025 के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले की तुलना में अधिक संख्या में स्टूडेंट वीजा जारी किए गए हैं।
यह बदलाव केवल स्टूडेंट वीजा तक सीमित नहीं है। अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों की कुल संख्या में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा अवैध और वैध दोनों तरह के इमिग्रेशन पर सख्ती बरतने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। पिछले छह दशकों में पहली बार अमेरिका की प्रवासी आबादी में गिरावट देखी गई है, जिसे इमिग्रेशन इतिहास की बड़ी घटना माना जा रहा है।
भारतीय छात्रों के लिए घटे F-1 स्टूडेंट वीजा
सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (CIS) की रिपोर्ट के अनुसार मई से अगस्त तक का समय विदेशी छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दौरान अधिकांश विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया पूरी होती है। इसी अवधि के दौरान वर्ष 2025 में भारतीय छात्रों को जारी किए गए F-1 स्टूडेंट वीजा की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 62 प्रतिशत कम रही।
यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं रही। चीन के छात्रों को भी पहले की तुलना में कम वीजा मिले और उनके मामले में करीब 34 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। हालांकि, एशिया के सभी देशों के लिए तस्वीर समान नहीं रही।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम को मिला फायदा
जहां भारत और चीन के छात्रों की संख्या में गिरावट आई, वहीं कुछ अन्य एशियाई देशों के छात्रों को पहले से अधिक अवसर मिले। वर्ष 2025 की पहली छमाही में वियतनाम के विद्यार्थियों को 5,324 F-1 स्टूडेंट वीजा जारी किए गए, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 19.6 प्रतिशत अधिक हैं।
बांग्लादेश के छात्रों को भी इस अवधि में 2,098 वीजा मिले, जो करीब 20.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाते हैं। सबसे बड़ी वृद्धि पाकिस्तान के छात्रों के मामले में दर्ज की गई। पाकिस्तान के विद्यार्थियों को 1,928 F-1 वीजा जारी किए गए, जो पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग 44.3 प्रतिशत अधिक हैं।
इन आंकड़ों ने अंतरराष्ट्रीय शिक्षा जगत में नई चर्चा शुरू कर दी है कि अमेरिकी वीजा नीति का प्रभाव अलग-अलग देशों पर अलग तरीके से दिखाई दे रहा है।
यूरोप की ओर बढ़ रहा भारतीय छात्रों का रुझान
अमेरिका में बढ़ती सख्ती के बीच भारतीय छात्रों का झुकाव अब यूरोप की ओर तेजी से बढ़ रहा है। जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देश भारतीय विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपीय देशों की यूनिवर्सिटीज में फीस अपेक्षाकृत कम है। इसके अलावा वहां वीजा प्रक्रिया भी कई मामलों में आसान मानी जाती है। पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी तलाशने के लिए मिलने वाला समय और अवसर भी छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की लागत अमेरिकी विश्वविद्यालयों की तुलना में 50 से 80 प्रतिशत तक कम बैठती है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय छात्रों की प्राथमिकताएं बदलती नजर आ रही हैं।
लगातार बढ़ रही यूरोप जाने वाले छात्रों की संख्या
शिक्षा से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में लगभग 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड जैसे देशों में भारतीय विद्यार्थियों के दाखिले में करीब 68 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यदि अमेरिका की इमिग्रेशन नीति इसी तरह सख्त बनी रहती है तो यूरोप भारतीय छात्रों के लिए और भी बड़ा शिक्षा केंद्र बन सकता है।
केवल छात्र ही नहीं, प्रोफेशनल भी तलाश रहे नए विकल्प
अमेरिका में बदलती नीतियों का असर केवल पढ़ाई करने वालों तक सीमित नहीं है। वहाँ नौकरी कर रहे कई भारतीय प्रोफेशनल भी अब भविष्य को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
सख्त वीजा नियम, नौकरी की अनिश्चितता और इमिग्रेशन से जुड़े बढ़ते जोखिमों के कारण कुछ भारतीय पेशेवर भारत लौटने या कनाडा, यूरोप और अन्य देशों में अवसर तलाशने पर विचार कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी इमिग्रेशन नीति का प्रभाव केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं बल्कि रोजगार बाजार पर भी पड़ रहा है।
H-1B वीजा में भारतीयों का दबदबा बरकरार
हालांकि स्टूडेंट वीजा के मामले में भारतीय छात्रों को झटका लगा है, लेकिन रोजगार के क्षेत्र में भारतीय पेशेवर अब भी सबसे आगे बने हुए हैं। वर्ष 2024 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिका द्वारा जारी किए गए कुल H-1B वर्क वीजा में लगभग 71 प्रतिशत भारतीय नागरिकों को मिले। यह दर्शाता है कि अमेरिकी कंपनियां अब भी भारतीय आईटी, इंजीनियरिंग और तकनीकी विशेषज्ञों पर सबसे अधिक भरोसा करती हैं।
इस सूची में चीन दूसरे स्थान पर रहा, जबकि फिलीपींस, कनाडा और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की हिस्सेदारी लगभग एक-एक प्रतिशत के आसपास रही।
छह दशक बाद घटी अमेरिका की प्रवासी आबादी
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2025 में अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों की संख्या लगभग 5.33 करोड़ थी। जून तक यह घटकर करीब 5.19 करोड़ रह गई।
1960 के दशक के बाद यह पहला मौका है जब अमेरिका में कुल प्रवासी आबादी में कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की कठोर सीमा सुरक्षा और इमिग्रेशन नीतियों का सीधा परिणाम मान रहे हैं।
अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी देश
हालांकि हाल के महीनों में प्रवासी आबादी और वीजा जारी होने की संख्या में कमी देखी गई है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी देश बना हुआ है। बेहतर शिक्षा, उच्च वेतन, आधुनिक शोध सुविधाएं और रोजगार के व्यापक अवसर आज भी दुनिया भर के लोगों को अमेरिका की ओर आकर्षित करते हैं।
वर्ष 2023 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में सबसे अधिक लगभग 1.1 करोड़ प्रवासी मेक्सिको से हैं। इसके बाद भारत का स्थान आता है, जहां के करीब 32 लाख लोग अमेरिका में रह रहे हैं। चीन से लगभग 30 लाख, फिलीपींस से 21 लाख और क्यूबा से करीब 17 लाख प्रवासी अमेरिका में निवास करते हैं।
एशियाई देशों पर सबसे अधिक असर
प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में रहने वाले कुल प्रवासियों में लगभग 52 प्रतिशत लैटिन अमेरिकी देशों से आते हैं, जबकि करीब 27 प्रतिशत आबादी एशियाई देशों की है। इसी कारण जब भी अमेरिकी सरकार वीजा या इमिग्रेशन नीति में बदलाव करती है तो उसका सबसे बड़ा प्रभाव भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों के नागरिकों पर दिखाई देता है।
पर्यटन उद्योग पर भी पड़ा असर
ट्रम्प प्रशासन की सख्त नीतियों का असर केवल शिक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं रहा बल्कि पर्यटन क्षेत्र पर भी इसका प्रभाव देखने को मिला है। वर्ष 2025 में अमेरिका आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या घटकर लगभग 6.83 करोड़ रह गई, जबकि 2024 में यह आंकड़ा करीब 7.23 करोड़ था। पर्यटकों की संख्या कम होने के कारण विदेशी यात्रियों के खर्च में भी 8 अरब डॉलर से अधिक की कमी दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक गिरावट कनाडा से आने वाले पर्यटकों की संख्या में देखी गई। इसके अलावा भारत, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और चीन से अमेरिका आने वाले यात्रियों की संख्या भी पहले के मुकाबले कम रही। हालांकि इस दौरान मेक्सिको से आने वाले पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
आगे क्या संकेत मिल रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका अपनी मौजूदा इमिग्रेशन और वीजा नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करता है तो भारतीय छात्रों का रुझान यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों की ओर और तेज हो सकता है। दूसरी ओर अमेरिकी कंपनियों में भारतीय पेशेवरों की मांग फिलहाल मजबूत बनी हुई है, जिससे रोजगार के क्षेत्र में भारत की स्थिति अभी भी काफी मजबूत मानी जा रही है। आने वाले समय में अमेरिकी नीतियों का रुख यह तय करेगा कि भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए अमेरिका कितना आकर्षक बना रहता है।




