चंडीगढ़ स्थित पीजीआई की न्यू ओपीडी कैंटीन में मरीजों और उनके तीमारदारों से निर्धारित दरों से अधिक कीमत वसूलने के आरोपों ने अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतों के बावजूद ओवरचार्जिंग का सिलसिला पूरी तरह थमता नजर नहीं आ रहा है। खास बात यह है कि कैंटीन संचालक के खिलाफ अब तक पांच बार चालान किए जा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उसका टेंडर अभी तक रद्द नहीं हुआ है।
कैंटीन संचालक पर किए गए चालानों की राशि 10 हजार से 20 हजार रुपये के बीच बताई जा रही है। दूसरी ओर, शिकायतों के मुताबिक कैंटीन में रोजाना बड़ी संख्या में मरीजों और तीमारदारों से खाद्य पदार्थों के लिए निर्धारित कीमत से अधिक पैसे लिए जा रहे हैं। आरोप है कि अतिरिक्त वसूली की रकम प्रतिदिन करीब 40 से 50 हजार रुपये तक पहुंच रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि कथित अतिरिक्त कमाई जुर्माने की रकम से कई गुना अधिक हो तो क्या केवल चालान की कार्रवाई ओवरचार्जिंग पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त है?
पीजीआई उत्तर भारत के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में शामिल है और यहां रोजाना हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अस्पताल में प्रतिदिन करीब 12 से 15 हजार मरीज आते हैं। मरीजों के साथ आने वाले तीमारदारों की संख्या भी लगभग इतनी ही रहती है। इस तरह अस्पताल परिसर में हर दिन करीब 25 से 30 हजार लोगों की आवाजाही होती है।
इनमें न्यू ओपीडी सबसे व्यस्त हिस्सों में से एक है। पांच मंजिला न्यू ओपीडी भवन में बड़ी संख्या में मरीज जांच और इलाज के लिए पहुंचते हैं। यहां फिलहाल एक ही कैंटीन होने के कारण मरीजों और तीमारदारों के पास खाने-पीने की चीजें खरीदने के लिए सीमित विकल्प हैं। यही स्थिति ओवरचार्जिंग की शिकायतों को और गंभीर बना देती है, क्योंकि कई लोगों के लिए कैंटीन से सामान खरीदना मजबूरी बन जाता है।
शिकायतों के मुताबिक कैंटीन में कई खाद्य पदार्थ टेंडर में निर्धारित कीमतों से अधिक दाम पर बेचे जा रहे हैं। आरोप है कि कई सामान्य खाद्य वस्तुओं पर पांच से सात रुपये तक अतिरिक्त वसूले जाते हैं। कुछ उत्पादों में यह अंतर 20 से 30 रुपये तक बताया जा रहा है। अलग-अलग वस्तुओं पर थोड़ी-थोड़ी अतिरिक्त राशि वसूलने का असर बड़ी संख्या में ग्राहकों पर पड़ने के कारण कुल अतिरिक्त कमाई काफी अधिक होने का आरोप लगाया जा रहा है।
मरीजों और तीमारदारों के लिए यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पीजीआई आने वाले लोगों में बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की होती है जो इलाज के खर्च का पहले ही दबाव झेल रहे होते हैं। अस्पताल में कई घंटे बिताने के दौरान उन्हें भोजन, चाय, पानी और अन्य आवश्यक वस्तुओं की जरूरत पड़ती है। यदि इन वस्तुओं के लिए निर्धारित दर से अधिक भुगतान करना पड़े तो इसका सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है।
कैंटीन में कीमतों को लेकर शिकायतें नई नहीं हैं। पीजीआई प्रशासन की ओर से शिकायतों के आधार पर समय-समय पर कार्रवाई भी की गई है। अब तक कैंटीन संचालक के खिलाफ पांच चालान किए जा चुके हैं। इन चालानों में 10 हजार से लेकर 20 हजार रुपये तक का जुर्माना शामिल है। इसके बावजूद यदि ओवरचार्जिंग की शिकायतें लगातार सामने आती रहें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि मौजूदा कार्रवाई कितनी प्रभावी है।
सबसे बड़ा सवाल टेंडर की शर्तों को लेकर है। कैंटीन के टेंडर नियमों के अनुसार तीन चालान होने के बाद संचालक का टेंडर समाप्त करने का प्रावधान बताया जा रहा है। ऐसे में पांच चालान होने के बाद भी टेंडर जारी रहने से प्रशासनिक कार्रवाई की गति पर सवाल उठ रहे हैं।
यदि तीन चालानों के बाद टेंडर खत्म करने का प्रावधान है तो पांच चालान के बाद भी संबंधित संचालक को कैंटीन चलाने की अनुमति क्यों दी जा रही है, यह सवाल मरीजों और तीमारदारों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। शिकायतों के आधार पर चालान किए जाने से यह तो स्पष्ट है कि प्रशासन को अनियमितताओं की जानकारी मिल रही है, लेकिन बार-बार कार्रवाई के बावजूद समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाना व्यवस्था की कमजोरी को सामने लाता है।
मामले में एक अहम पहलू यह भी है कि कैंटीन संचालक पर लगाया जाने वाला जुर्माना और कथित अतिरिक्त वसूली के बीच बड़ा अंतर बताया जा रहा है। यदि प्रतिदिन 40 से 50 हजार रुपये की ओवरचार्जिंग के आरोप सही पाए जाते हैं, तो 10 या 20 हजार रुपये का जुर्माना कथित अतिरिक्त कमाई के मुकाबले काफी कम बैठता है। ऐसी स्थिति में केवल आर्थिक दंड व्यवस्था का निवारक प्रभाव कितना होगा, यह सवाल उठना लाजिमी है।
इसी कारण यह मांग भी उठ रही है कि प्रशासन को केवल चालान तक सीमित रहने के बजाय टेंडर की शर्तों के अनुसार कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही कैंटीन में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की निर्धारित कीमतों की नियमित जांच होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्राहकों से तय दर से एक रुपया भी अधिक न लिया जाए।
मरीजों और तीमारदारों की सुविधा के लिए कैंटीन में रेट लिस्ट को स्पष्ट और प्रमुख स्थान पर प्रदर्शित करना भी जरूरी है। यदि किसी वस्तु की कीमत निर्धारित है तो ग्राहक को उसी दर पर सामान मिलना चाहिए। इसके अलावा बिल या रसीद उपलब्ध कराने की व्यवस्था को भी सख्ती से लागू किया जा सकता है, ताकि किसी भी शिकायत की स्थिति में अतिरिक्त वसूली का सत्यापन किया जा सके।
पीजीआई जैसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान में कैंटीन केवल व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। यहां आने वाले अधिकांश लोग अस्पताल की सेवाओं पर निर्भर होते हैं और लंबे समय तक परिसर में रहते हैं। ऐसे में खाने-पीने की वस्तुओं की उचित कीमत और गुणवत्ता सुनिश्चित करना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस मामले में पीजीआई प्रशासन का कहना है कि कैंटीन संचालक का टेंडर समाप्त करने के लिए फाइल आगे बढ़ाई जा चुकी है और जल्द ही नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि लगातार मिल रही शिकायतों को गंभीरता से लिया जा रहा है और नियमों के अनुसार अगला कदम उठाया जाएगा।
हालांकि, प्रशासन के इस जवाब के बावजूद सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई में हो रही देरी को लेकर है। जब टेंडर की शर्तों में तीन चालानों के बाद टेंडर समाप्त करने का प्रावधान बताया जा रहा है, तो पांच चालान होने के बाद भी प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हुई, इसका स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी है।
मामले में अब निगाह इस बात पर है कि पीजीआई प्रशासन कैंटीन संचालक के खिलाफ क्या कार्रवाई करता है। यदि टेंडर समाप्त किया जाता है तो इससे भविष्य में अन्य कैंटीन संचालकों को भी नियमों के पालन का स्पष्ट संदेश जा सकता है। वहीं, यदि कार्रवाई में और देरी होती है तो इससे शिकायतों के समाधान और टेंडर नियमों के पालन को लेकर प्रशासन पर सवाल और गहरे हो सकते हैं।
न्यू ओपीडी में रोजाना हजारों मरीजों और तीमारदारों की मौजूदगी को देखते हुए कैंटीन व्यवस्था को पारदर्शी बनाना जरूरी है। मरीज इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं और ऐसे में उन्हें खाद्य पदार्थों के लिए मनमाने दाम चुकाने की स्थिति का सामना नहीं करना चाहिए। निर्धारित कीमतों की निगरानी, नियमित निरीक्षण, बिलिंग व्यवस्था और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के जरिए इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
फिलहाल पांच चालानों के बाद भी कैंटीन का टेंडर जारी रहना और ओवरचार्जिंग की शिकायतों का सामने आते रहना पीजीआई प्रशासन के लिए एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती है। मरीजों की जेब पर पड़ने वाले इस कथित अतिरिक्त बोझ को रोकने के लिए अब महज जुर्माने के बजाय नियमों के मुताबिक ठोस और समयबद्ध कार्रवाई की जरूरत है।




