चंडीगढ़ नगर निगम में हाईमास्ट लाइट घोटाले का खुलासा, जेई की रिपोर्ट में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां उजागर

चंडीगढ़ नगर निगम में हाईमास्ट लाइट घोटाले का खुलासा, जेई की रिपोर्ट में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां उजागर

चंडीगढ़ नगर निगम में हाईमास्ट लाइट इंस्टॉलेशन को लेकर विवाद, तकनीकी जांच में सामने आईं कई खामियां

चंडीगढ़ नगर निगम में फर्जी एफडी मामले के बाद अब हाईमास्ट लाइट इंस्टॉलेशन प्रोजेक्ट को लेकर नया विवाद सामने आया है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में लगाए गए हाईमास्ट पोल और लाइटिंग सिस्टम की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि इस मामले का खुलासा किसी बाहरी जांच एजेंसी या शिकायत के माध्यम से नहीं, बल्कि नगर निगम के इलेक्ट्रिकल विंग में तैनात जूनियर इंजीनियर की तकनीकी रिपोर्ट के जरिए हुआ है।

जांच रिपोर्ट में हाईमास्ट लाइट सिस्टम की सामग्री, इंस्टॉलेशन प्रक्रिया और तकनीकी मानकों को लेकर कई गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट में संबंधित एजेंसी के भुगतान को रोकने की सिफारिश की गई है, जब तक कि सभी तकनीकी पहलुओं की दोबारा जांच पूरी नहीं हो जाती।

नगर निगम के जिन स्थानों पर लगाए गए हाईमास्ट सिस्टम की जांच की गई है, उनमें सेक्टर-34, सेक्टर-35 स्लो कैरिज-वे, सेक्टर-48 नाइट फूड स्ट्रीट और ओपन एयर थिएटर जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। इन जगहों पर लगे उपकरणों की गुणवत्ता और टेंडर शर्तों के पालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

जूनियर इंजीनियर सनी ठाकुर द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में तकनीकी कमियों के साथ-साथ दस्तावेजों में भी कई असमानताओं की ओर इशारा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, मौके पर लगे उपकरणों और निरीक्षण के दौरान दिखाए गए सामान में अंतर पाया गया।

गोदाम में अलग सामग्री और साइट पर अलग उपकरण मिलने का आरोप

जांच रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में संबंधित एजेंसी के गोदाम का निरीक्षण किया गया था। इस दौरान थर्ड पार्टी टेस्टिंग के लिए पाइपों के सैंपल भी लिए गए थे। हालांकि, बाद में जब वास्तविक इंस्टॉलेशन साइट पर लगे हाईमास्ट पोल और पाइपों की जांच की गई तो उनकी गुणवत्ता में अंतर पाया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि गोदाम में निरीक्षण के समय जो सामग्री दिखाई गई थी, वह साइट पर लगाए गए उपकरणों से अलग और कमजोर गुणवत्ता की प्रतीत हुई। इसके बाद जूनियर इंजीनियर ने सुझाव दिया कि निष्पक्ष जांच के लिए सैंपल सीधे इंस्टॉलेशन साइट से ही लिए जाने चाहिए।

इस स्थिति ने नगर निगम की गुणवत्ता जांच प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट में सामग्री की जांच केवल सप्लायर के स्थान पर नहीं बल्कि वास्तविक उपयोग स्थल पर भी की जानी चाहिए।

निरीक्षण रिपोर्ट में मॉडल नंबर और सीरियल नंबर की कमी

जांच में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि मार्च 2026 में फैक्ट्री स्तर पर हाईमास्ट और केबल का निरीक्षण किया गया था, लेकिन इसकी जानकारी काफी समय बाद साझा की गई। इससे निरीक्षण प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, फैक्ट्री निरीक्षण दस्तावेजों में हाईमास्ट पोल, मोटर और डबल ड्रम विंच के मॉडल नंबर तथा सीरियल नंबर दर्ज नहीं किए गए थे। इन विवरणों के अभाव में यह पुष्टि करना मुश्किल हो गया कि साइट पर लगाए गए उपकरण वही हैं जिनकी फैक्ट्री स्तर पर जांच की गई थी।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट में उपकरणों की पहचान के लिए मॉडल नंबर और सीरियल नंबर का रिकॉर्ड बेहद जरूरी होता है। इससे सामग्री में बदलाव या किसी तरह की अनियमितता की जांच आसान हो जाती है।

हाईमास्ट पोल की गुणवत्ता और टेंडर शर्तों पर उठे सवाल

रिपोर्ट में सेक्टर-48 में लगाए गए हाईमास्ट पोलों की स्थिति को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। जांच में गैल्वनाइजेशन की गुणवत्ता कमजोर पाए जाने का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कम समय में ही कुछ पोलों पर जंग के निशान दिखाई देने लगे थे।

हाईमास्ट पोल लंबे समय तक खुले वातावरण में लगाए जाते हैं, इसलिए उनकी मजबूती और जंगरोधी क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि गैल्वनाइजेशन की प्रक्रिया मानकों के अनुसार नहीं होती है तो भविष्य में संरचना की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

वेल्डिंग और केबल गुणवत्ता में पाई गई तकनीकी कमियां

जांच रिपोर्ट में पोलों की वेल्डिंग को लेकर भी कई खामियों का उल्लेख किया गया है। इसमें वेल्डिंग में दरारें, गैप, कटिंग दोष और पोरोसिटी जैसी तकनीकी समस्याएं सामने आने की बात कही गई है।

इसके अलावा ट्रेलिंग केबल की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ केबल मानकों के अनुरूप नहीं पाई गईं और कुछ को अंडर गेज बताया गया। तकनीकी रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि ऐसी सामग्री लंबे समय में सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है।

हाईमास्ट सिस्टम में बिजली आपूर्ति और संचालन के लिए उपयोग होने वाली केबल की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती है। खराब गुणवत्ता की केबल से खराबी, रखरखाव की समस्या और सुरक्षा संबंधी खतरे बढ़ सकते हैं।

टेंडर की शर्तों के उल्लंघन का आरोप

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि टेंडर में निर्धारित उपकरणों और मौके पर लगाए गए सामान में अंतर हो सकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि टेंडर में छह-पोल मोटर का प्रावधान था, जबकि मौके पर चार-पोल 1425 आरपीएम मोटर लगाए जाने की बात सामने आई।

इसके अलावा कई जरूरी उपकरण जैसे मैकेनिकल टॉर्क लिमिटर, रबर बफर, प्रोटेक्टिव पीवीसी सिस्टम और मल्टी-पिन प्लग-सॉकेट मौके पर उपलब्ध नहीं पाए गए। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या एजेंसी ने लागत कम करने के लिए तय मानकों से अलग सामग्री का इस्तेमाल किया।

यदि टेंडर शर्तों के अनुसार उपकरण नहीं लगाए गए हैं तो यह नगर निगम की निगरानी व्यवस्था और ठेकेदार की जवाबदेही दोनों से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।

कंपनी चयन प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका पर चर्चा

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि संबंधित कंपनी को काम सौंपने से पहले नगर निगम के इंजीनियरिंग विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने West Bengal के हुगली स्थित कंपनी परिसर का दौरा किया था।

बताया गया है कि निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने कंपनी की व्यवस्था और क्षमताओं को संतोषजनक बताया था, जिसके बाद प्रोजेक्ट का काम संबंधित एजेंसी को दिया गया। अब सवाल उठ रहे हैं कि यदि प्रारंभिक निरीक्षण में सब कुछ सही पाया गया था तो बाद में साइट पर इतनी तकनीकी कमियां कैसे सामने आईं।

मामले ने नगर निगम की खरीद प्रक्रिया, तकनीकी मूल्यांकन और निगरानी व्यवस्था को लेकर बहस शुरू कर दी है। शहर के कई लोग अब इस बात की मांग कर रहे हैं कि पूरे प्रोजेक्ट की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

भुगतान रोकने और संयुक्त जांच की सिफारिश

जूनियर इंजीनियर ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और निर्माता कंपनी के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संयुक्त साइट निरीक्षण कराया जाए। उनका कहना है कि सभी तकनीकी पहलुओं की पुष्टि होने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि जांच पूरी होने तक संबंधित एजेंसी का भुगतान रोका जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि यदि कोई तकनीकी कमी या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी तय की जा सके।

नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल

हाईमास्ट लाइट प्रोजेक्ट से जुड़ा यह मामला अब नगर निगम की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और ठेकेदारों की निगरानी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है। सार्वजनिक धन से होने वाले ऐसे प्रोजेक्ट में पारदर्शिता, तकनीकी जांच और समय-समय पर निरीक्षण बेहद जरूरी होता है।

विपक्षी दलों और शहर के सामाजिक संगठनों ने भी मामले की स्वतंत्र जांच कराने और दोषी पाए जाने वाले लोगों पर कार्रवाई की मांग उठानी शुरू कर दी है। वहीं नगर निगम स्तर पर आगे की जांच और तकनीकी समीक्षा की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हाईमास्ट लाइट इंस्टॉलेशन विवाद ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि बड़े विकास कार्यों में गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था को कितना प्रभावी बनाया जा रहा है।