18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में जन्मे संपूर्ण सिंह कालरा आज दुनिया के लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक पूरी साहित्यिक और सिनेमाई दुनिया हैं। यही संपूर्ण सिंह कालरा आगे चलकर ‘गुलजार’ के नाम से मशहूर हुए। उनके लिखे शब्दों में प्रेम है, विरह है, अकेलापन है, जिंदगी की उलझनें हैं और रिश्तों की ऐसी महीन संवेदनाएं हैं, जिन्हें पढ़ते या सुनते ही इंसान अपने भीतर उतरता महसूस करता है। 18 अगस्त 2026 को वह 92 वर्ष के हो गए हैं और इस मौके पर उनके जीवन का वह अध्याय भी बेहद दिलचस्प है, जब उन्हें अपने ही परिवार की नाराजगी से बचकर अपनी रचनात्मक पहचान बनानी पड़ी थी।
गुलजार की पहचान आज शायर, गीतकार, लेखक, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक के तौर पर है। उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसे गीत और कहानियां दीं, जो कई दशक गुजर जाने के बाद भी लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की शुरुआत किसी चमकदार फिल्मी दुनिया से नहीं हुई थी। इसके पीछे विस्थापन, आर्थिक संघर्ष, परिवार की असहमति, गैरेज में काम और अपनी पहचान छिपाकर लिखने का दौर था।
बंटवारे ने बदल दी जिंदगी की दिशा
गुलजार का जन्म उस दौर में हुआ था, जब देश आजादी की ओर बढ़ रहा था। उनका जन्म स्थान दीना था, जो अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम इलाके में आता है। बचपन में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया। इसके बाद जिंदगी ने उन्हें एक और बड़ा झटका दिया—1947 का विभाजन।
बंटवारे के दौरान लाखों लोगों की तरह उनका परिवार भी अपनी जड़ों से अलग होने को मजबूर हुआ। घर-बार छूटा और परिवार को भारत आना पड़ा। पहले अमृतसर और फिर दिल्ली में परिवार ने नया जीवन शुरू करने की कोशिश की। लेकिन हालात आसान नहीं थे। आर्थिक परेशानियों के बीच संपूर्ण सिंह को भी अपने भविष्य के बारे में व्यावहारिक फैसले लेने पड़े।
हालांकि मुश्किल परिस्थितियों के बीच भी उनके भीतर शब्दों के प्रति लगाव कम नहीं हुआ। उन्हें कविताएं पढ़ने, लिखने और तुकबंदी करने में आनंद आता था। वह अपने विचारों को कागज पर उतारते रहते थे। मगर घर में उनके इस शौक को करियर की दिशा में बढ़ने की अनुमति नहीं थी।
पिता चाहते थे कि बेटा कारोबार संभाले
संपूर्ण सिंह के पिता माखन सिंह कालरा कारोबारी सोच रखने वाले व्यक्ति थे। उनके लिए जीवन में स्थिर रोजगार और आर्थिक सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण थी। उन्हें लगता था कि कविता और शायरी जैसी चीजों से घर नहीं चलता। यही वजह थी कि बेटे के लेखन के प्रति उनका रवैया उत्साह बढ़ाने वाला नहीं था।
संपूर्ण सिंह को अक्सर यह समझाया जाता था कि केवल लिखने-पढ़ने से भविष्य नहीं बनाया जा सकता। परिवार की नजर में उन्हें किसी काम-धंधे पर ध्यान देना चाहिए। उनके भाई भी उनके साहित्यिक झुकाव को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे।
लेकिन जिस चीज को परिवार समय की बर्बादी समझ रहा था, वही आगे चलकर संपूर्ण सिंह की सबसे बड़ी पहचान बनने वाली थी। उन्होंने परिवार से सीधा टकराव लेने के बजाय अपने लिए एक अलग रास्ता तलाश लिया।
मुंबई पहुंचकर गैरेज में करने लगे काम
रोजगार की तलाश उन्हें मुंबई ले आई। उस समय मुंबई आज की तरह सिर्फ फिल्मी सपनों का शहर नहीं थी, बल्कि लाखों लोगों के संघर्ष की जमीन भी थी। संपूर्ण सिंह ने यहां वर्ली के एक मोटर गैरेज में काम शुरू किया।
उनका काम गाड़ियों की मरम्मत से जुड़ा था। दुर्घटनाग्रस्त और पुरानी गाड़ियों के लिए सही रंग तैयार करना और उन्हें पेंट करना उनके काम का हिस्सा था। दिन का बड़ा हिस्सा ग्रीस, तेल, धातु और रंगों के बीच गुजरता था। लेकिन काम के दौरान भी उनके भीतर साहित्य का संसार लगातार जीवित रहा।
यही वह दौर था, जब उनकी जिंदगी में एक दिलचस्प दोहरी दुनिया बन गई थी। एक तरफ वह गैरेज में मेहनत करके अपना गुजारा कर रहे थे, दूसरी ओर खाली समय में कविताएं और शायरी लिखते थे। परिवार को डर था कि अगर उन्हें पता चल गया कि संपूर्ण अब भी लिख रहे हैं, तो घर में फिर नाराजगी होगी।
असली नाम की जगह चुना ‘गुलजार’
अपने लेखन को परिवार की नजरों से दूर रखने के लिए संपूर्ण सिंह ने अपने साहित्यिक जीवन के लिए एक नया नाम अपनाया। उन्होंने ‘गुलजार’ नाम से लिखना शुरू किया।
इस नाम ने धीरे-धीरे उनकी एक अलग पहचान बना दी। वह अपने परिवार के लिए संपूर्ण सिंह कालरा थे, जबकि साहित्यिक दुनिया में एक नए नाम से अपनी जगह बना रहे थे। बाद में उनके नाम के साथ ‘दीनवी’ भी जुड़ा, जो उनके जन्मस्थान दीना से संबंधित था।
नाम बदलना उनके लिए सिर्फ एक पहचान बदलने का फैसला नहीं था। यह उस दौर की परिस्थितियों से निकला हुआ रास्ता था, जिसमें वह अपने जुनून को भी जिंदा रखना चाहते थे और परिवार के साथ टकराव भी नहीं बढ़ाना चाहते थे।
यही छिपकर लिखने वाला युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली लेखकों में गिना जाने लगा।
साहित्यिक बैठकों ने खोले फिल्मी दुनिया के दरवाजे
मुंबई में रहते हुए संपूर्ण सिंह साहित्यिक गतिविधियों से भी जुड़ने लगे। वह प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की बैठकों में हिस्सा लेते थे। इन बैठकों ने उन्हें उस समय के कई बड़े साहित्यकारों और रचनाकारों के करीब आने का अवसर दिया।
इसी माहौल में उनकी मुलाकात शैलेंद्र और अली सरदार जाफरी जैसे नामों से हुई। यह उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण समय था, क्योंकि अब उनका लेखन केवल निजी शौक नहीं रह गया था। उन्हें ऐसे लोग मिल रहे थे, जो उनकी प्रतिभा को समझ सकते थे और उसे आगे बढ़ने का रास्ता दे सकते थे।
फिल्मों से उनका जुड़ाव भी इसी साहित्यिक माहौल के जरिए मजबूत हुआ। शैलेंद्र ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्मी दुनिया के बड़े लोगों तक पहुंचने का अवसर मिला।
‘मोरा गोरा अंग लई ले’ ने बदल दी तस्वीर
गुलजार के फिल्मी सफर की सबसे अहम शुरुआत फिल्म ‘बंदिनी’ से जुड़ी मानी जाती है। उस समय महान निर्देशक बिमल रॉय और संगीतकार एसडी बर्मन फिल्म से जुड़े थे। शैलेंद्र के माध्यम से गुलजार को बिमल रॉय के सामने अपनी रचना पेश करने का मौका मिला।
कहा जाता है कि गुलजार ने जो गीत सुनाया, उसके शुरुआती बोल थे—‘मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे।’ उनकी रचना में मौजूद सहजता, भावनात्मक गहराई और अलग तरह की भाषा ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींचा।
फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए लिखा गया यह गीत गुलजार के फिल्मी सफर की महत्वपूर्ण पहचान बन गया। इसके बाद उनके लिए हिंदी सिनेमा के दरवाजे खुलते चले गए। वह केवल गीत लिखने वाले रचनाकार नहीं रहे, बल्कि कहानी, संवाद, पटकथा और निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाने लगे।
गीतकार से निर्देशक तक का लंबा सफर
गुलजार की प्रतिभा केवल गीतों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने फिल्मों के लिए संवाद और पटकथाएं लिखीं और फिर निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा। ‘मेरे अपने’, ‘अचानक’, ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘अंगूर’, ‘इजाजत’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों में उनकी रचनात्मक दृष्टि दिखाई दी।
उनके गीतों की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने रोजमर्रा की भाषा और भावनाओं को बेहद खूबसूरत तरीके से पेश किया। उनके शब्दों में प्रेम को केवल रोमांस के रूप में नहीं, बल्कि दूरी, इंतजार, अधूरेपन और रिश्तों की जटिलता के साथ भी देखा गया।
‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी’, ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’ और ऐसे अनेक गीतों ने उनकी पहचान को और मजबूत किया। बाद के वर्षों में ‘जय हो’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी पहचान दिलाई और इस गीत को ऑस्कर से सम्मानित किया गया।
जिस शौक को परिवार ने रोकना चाहा, वही बनी पहचान
गुलजार की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उनकी शुरुआत किसी विशेष सुविधा या फिल्मी परिवार से नहीं हुई थी। एक विस्थापित परिवार से निकलकर मुंबई पहुंचना, गैरेज में काम करना और अपने साहित्यिक जुनून को बचाए रखना उनके सफर की बुनियाद रही।
जिस लेखन को कभी परिवार की नजर में गैरजरूरी शौक समझा गया था, वही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। संपूर्ण सिंह कालरा ने ‘गुलजार’ नाम के जरिए अपनी रचनात्मक दुनिया को एक ऐसी पहचान दी, जो आज कई पीढ़ियों के बीच कायम है।
92 साल की उम्र में भी गुलजार का नाम भारतीय साहित्य और सिनेमा में उतनी ही मजबूती से मौजूद है। उनके शब्दों की खासियत यही है कि वे किसी एक दौर के नहीं लगते। उनकी नज्मों में पुरानी यादों की खुशबू है तो नए समय की बेचैनी भी। उनके गीतों में प्रेम है तो टूटते रिश्तों की खामोशी भी।
एक समय परिवार से छिपाकर लिखने वाला संपूर्ण सिंह कालरा आज ‘गुलजार’ बनकर करोड़ों लोगों की भावनाओं की आवाज हैं। उनकी जिंदगी यह बताती है कि किसी इंसान के भीतर मौजूद हुनर को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन अगर जुनून सच्चा हो तो वह किसी न किसी रास्ते से अपनी जगह बना ही लेता है।




