सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इसी पवित्र महीने में आने वाले मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगला गौरी की पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और माता गौरी अपने भक्तों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं।
साल 2026 में सावन के दौरान कुल चार मंगला गौरी व्रत पड़ रहे हैं। इनमें तीसरा व्रत आज यानी 18 अगस्त को रखा जा रहा है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखकर माता गौरी की पूजा करती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी मनचाहा और योग्य जीवनसाथी पाने की इच्छा से मां गौरी की आराधना करती हैं।
मंगला गौरी व्रत की पूजा में केवल उपवास का ही महत्व नहीं माना गया है, बल्कि इस दिन श्रृंगार और पूजा सामग्री का भी विशेष स्थान है। धार्मिक परंपराओं में सुहागिन स्त्रियों के सोलह श्रृंगार को सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसलिए इस दिन महिलाएं स्वयं 16 श्रृंगार करती हैं और माता गौरी को भी सुहाग से जुड़ी वस्तुएं अर्पित करती हैं।
क्यों खास माना जाता है मंगला गौरी व्रत?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी इसी तपस्या और दृढ़ संकल्प से जुड़ी मान्यताओं के कारण मंगला गौरी की पूजा को विवाह और दांपत्य सुख से जोड़ा जाता है।
कुंवारी कन्याएं इस दिन माता गौरी से मनपसंद और योग्य वर की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र तथा वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता की प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से मंगला गौरी का पूजन करने से माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हालांकि, व्रत के फल से जुड़ी ये बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की परंपराओं और नियमों में थोड़ा अंतर भी देखने को मिलता है।
तीसरे मंगला गौरी पर 16 श्रृंगार क्यों करें?
मंगला गौरी व्रत में 16 श्रृंगार को विशेष शुभ माना जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन स्नान के बाद पारंपरिक तरीके से तैयार होकर बिंदी, सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी, मंगलसूत्र, काजल, गजरा और अन्य श्रृंगार सामग्री का इस्तेमाल करती हैं।
मान्यता के अनुसार, 16 श्रृंगार केवल सुंदरता बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि विवाहित महिला के सौभाग्य और वैवाहिक मंगल का प्रतीक भी माना जाता है। इसी भावना से पूजा के दौरान माता गौरी को भी श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं।
माता को लाल या हरे रंग की चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी और अन्य सुहाग सामग्री चढ़ाई जा सकती है। कई स्थानों पर 16 की संख्या को विशेष शुभ मानते हुए 16 प्रकार की वस्तुएं, फूल, फल या मिठाइयां अर्पित करने की परंपरा भी है।
यदि आपके घर में मंगला गौरी पूजन की कोई विशेष पारिवारिक परंपरा चली आ रही है तो उसी के अनुसार सामग्री चढ़ाना अधिक उचित माना जाता है।
सुबह ऐसे शुरू करें व्रत
मंगला गौरी व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले या अपनी दिनचर्या के अनुसार जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनें और घर के पूजा स्थल की सफाई करें। पूजा की जगह पर गंगाजल का छिड़काव करके स्थान को पवित्र किया जा सकता है।
इसके बाद एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर माता गौरी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान शिव का स्मरण करते हुए माता पार्वती की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पास में रख लें।
पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प लेना चाहिए। मन में माता गौरी का ध्यान करते हुए अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत पूरा करने का संकल्प लें। इसके बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार करके विधिवत पूजा कर सकती हैं।
माता गौरी को क्या-क्या चढ़ाएं?
मंगला गौरी पूजा में माता को फूल, फल, मिठाई, धूप, दीप, अक्षत और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। सुहाग से जुड़ी वस्तुओं का भी विशेष महत्व माना जाता है।
माता गौरी को चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी, काजल और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित की जा सकती है। इसके साथ ही अपनी श्रद्धा के अनुसार फल और मिठाइयां चढ़ाएं।
कुछ धार्मिक परंपराओं में 16 फल, 16 फूल और 16 मिठाइयां अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। इसका उद्देश्य माता के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करना माना जाता है। पूजा सामग्री की संख्या को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग परंपराएं हो सकती हैं, इसलिए अपनी स्थानीय परंपरा का पालन भी किया जा सकता है।
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि
माता गौरी की प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर पूजा आरंभ करें। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और फिर माता गौरी का ध्यान करें। इसके बाद माता को जल, अक्षत, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।
माता को सुहाग की सामग्री चढ़ाते समय अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करें। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना भी की जा सकती है।
पूजन के दौरान मंगला गौरी व्रत की कथा सुनना या पढ़ना शुभ माना जाता है। कथा के बाद माता गौरी की आरती करें। आरती पूरी होने के बाद माता को चढ़ाया गया प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटें।
यदि आपने निर्जल या सामान्य उपवास रखा है तो अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करें। स्वास्थ्य और व्यक्तिगत क्षमता को ध्यान में रखते हुए फलाहार या हल्का व्रताहार लिया जा सकता है। किसी भी तरह का उपवास स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता हो तो उसे जबरदस्ती करना उचित नहीं है।
व्रत के दौरान किन बातों का रखें ध्यान?
मंगला गौरी व्रत में पूजा के साथ मन की शुद्धता और श्रद्धा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए पूजा के दौरान शांत मन रखें और माता गौरी का ध्यान करें। घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने का प्रयास करें।
पूजा सामग्री को साफ-सुथरा रखें और सामर्थ्य से अधिक खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। धार्मिक अनुष्ठान में सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा मानी जाती है।
व्रत रखने वाली महिलाओं को अपनी दिनचर्या और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए। खासकर गर्मी, कमजोरी या किसी अन्य शारीरिक परेशानी की स्थिति में लंबे समय तक भूखे रहने से बचना चाहिए।
मंगला गौरी व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंगला गौरी व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसे पति-पत्नी के बीच प्रेम और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना से भी जोड़ा जाता है।
अविवाहित कन्याओं के लिए भी यह व्रत विशेष माना जाता है। मान्यता है कि माता गौरी की आराधना करने से विवाह संबंधी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
कुछ मान्यताओं में इस व्रत को संतान सुख और वैवाहिक जीवन की परेशानियों से मुक्ति से भी जोड़ा गया है। वहीं, कुंडली से जुड़े कुछ दोषों, विशेषकर मांगलिक दोष के संदर्भ में भी मंगला गौरी की पूजा को लाभकारी बताया जाता है। हालांकि, इन धार्मिक धारणाओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
आज जरूर करें माता गौरी का स्मरण
सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत श्रद्धालुओं के लिए माता पार्वती की आराधना और भगवान शिव का स्मरण करने का विशेष अवसर है। सुहागिन महिलाएं इस दिन 16 श्रृंगार करके माता को सुहाग सामग्री अर्पित कर सकती हैं और पति की लंबी उम्र की प्रार्थना कर सकती हैं।
वहीं, अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी की कामना के साथ माता गौरी की पूजा कर सकती हैं। पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति की प्रार्थना करना भी शुभ माना जाता है।
इस दिन पूजा में दिखावे से अधिक श्रद्धा को महत्व दें। अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पूजा सामग्री का इस्तेमाल करें और माता गौरी से सुखी, शांतिपूर्ण तथा मंगलमय जीवन का आशीर्वाद मांगें।
(Photo : AI Generated)




