राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा से पहले वहां सक्रिय कुछ भारतीय-अमेरिकी संगठनों और एक्टिविस्ट समूहों ने विरोध अभियान शुरू कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस अभियान में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) जैसे संगठन शामिल हैं। इन समूहों का कहना है कि वे भारत से जुड़े मानवाधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार और सामाजिक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते हैं, जबकि रिपोर्ट में इन्हें भारत-विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है।
मोहन भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की विदेश यात्रा पर जाने वाले हैं। यह दौरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़े कार्यक्रमों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यात्रा के दौरान वह प्रवासी भारतीयों, स्थानीय संगठनों और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों से मुलाकात और संवाद करेंगे। 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाले ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशंस’ कार्यक्रम में उनके शामिल होने का कार्यक्रम है। इसी दौरे को लेकर अमेरिका में कुछ संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों और कैंपेन की तैयारी शुरू की है।
न्यूज 18 नेटवर्क की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोहन भागवत के विरोध के पीछे काम कर रहा यह नेटवर्क पहले भी भारत की राजनीति और सामाजिक घटनाओं को लेकर अमेरिका में सक्रिय रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इन संगठनों ने भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति, जातिगत भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिकता कानून और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाए हैं। यही नेटवर्क अब आरएसएस प्रमुख की विदेश यात्रा को भी अपने विरोध अभियान का नया केंद्र बना रहा है।
इस नेटवर्क में प्रमुख नाम इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल यानी IAMC का है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी स्थापना वर्ष 2002 में गुजरात दंगों के बाद हुई थी। संगठन अमेरिका में 501(c)(3) के तहत पंजीकृत है और उसके देश के अलग-अलग हिस्सों में कई चैप्टर बताए जाते हैं। IAMC खुद को भारत और भारतीय मूल के लोगों से जुड़े मानवाधिकार तथा एडवोकेसी मुद्दों पर काम करने वाला संगठन बताता है। हालांकि, रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इसके अभियानों के जरिए भारत से संबंधित विवादास्पद घटनाओं को एक विशेष राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव के तहत पेश किया जाता रहा है।
हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स यानी HfHR भी इस विरोध अभियान में IAMC के साथ सक्रिय बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संगठन की स्थापना 2019 में हुई थी और यह अमेरिका से संचालित एक एडवोकेसी समूह है। इसके प्रमुख नामों में सुनीता विश्वनाथ और राजू राजगोपाल का उल्लेख किया गया है। संगठन भारत में मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को उठाता रहा है। रिपोर्ट का दावा है कि HfHR ने अमेरिका के कई संस्थागत और राजनीतिक मंचों पर भारत से जुड़े मामलों को लेकर अभियान चलाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, HfHR ने अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्यों के साथ-साथ स्टेट डिपार्टमेंट और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यानी USCIRF के सामने भी भारत से जुड़े मुद्दों पर ब्रीफिंग आयोजित की हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन गतिविधियों का उद्देश्य भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में गंभीर चिंता वाले देशों की श्रेणी में रखे जाने की मांग को मजबूत करना रहा है। इन अभियानों को लेकर भारत सरकार और उसके समर्थक समूहों की ओर से पहले भी आपत्तियां सामने आती रही हैं।
नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने जैसे फैसलों को लेकर भी यह नेटवर्क सक्रिय रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन संगठनों ने अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन फैसलों के खिलाफ कैंपेन किए। भारत में भीमा-कोरेगांव मामले में आरोपी कुछ कार्यकर्ताओं के समर्थन को लेकर भी इन समूहों की गतिविधियों का जिक्र किया गया है। हालांकि, इन संगठनों की अपनी दलील यह रही है कि वे नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़े सवाल उठा रहे हैं।
न्यूज 18 की रिपोर्ट में इन संगठनों के दूसरे समूहों के साथ संबंधों का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, IAMC और HfHR विभिन्न अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर भारत से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त कार्यक्रम और अभियान चलाते रहे हैं। इनमें काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR), इंडिया सिविल इंटरनेशनल और कोएलिशन अगेंस्ट फासिज्म इन इंडिया जैसे नाम शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट इन संगठनों की गतिविधियों को भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की व्यापक कोशिश के रूप में देखती है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि नेटवर्क से जुड़े कुछ संगठनों के ऐसे व्यक्तियों या समूहों से संबंध रहे हैं जिन पर भारत में विवादित गतिविधियों या गंभीर आरोपों का मामला रहा है। इनमें भारत में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी SIMI का संदर्भ भी दिया गया है। हालांकि, किसी संगठन या नेटवर्क के बीच संबंधों और सहयोग की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है, इसलिए ऐसे आरोपों को संबंधित पक्षों के आधिकारिक रुख और उपलब्ध कानूनी तथ्यों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
मोहन भागवत की यात्रा का विरोध पहली बार नहीं है जब अमेरिका में यह नेटवर्क भारत की किसी घरेलू घटना के बाद सक्रिय हुआ हो। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP से जुड़े छात्र आंदोलन के दौरान भी अमेरिका के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन आयोजित किए गए थे। इन प्रदर्शनों में भारत की राजनीतिक घटनाओं और कथित दमन के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार बहस से जोड़ने की कोशिश की गई।
कैम्ब्रिज और हार्वर्ड स्क्वायर के अलावा न्यूयॉर्क के यूनियन स्क्वायर तथा कैलिफोर्निया के सैन होजे में भी प्रदर्शन आयोजित किए जाने का जिक्र रिपोर्ट में किया गया है। IAMC के स्थानीय चैप्टर और HfHR से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इन गतिविधियों में भाग लिया था। रिपोर्ट का कहना है कि भारत में चल रहे छात्र आंदोलन को अमेरिका में पहले से सक्रिय मानवाधिकार और राजनीतिक अभियानों के साथ जोड़कर व्यापक विरोध का रूप देने की कोशिश की गई।
यही वजह है कि मोहन भागवत की यात्रा से पहले शुरू हुआ विरोध अब विशेष चर्चा में है। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के मौके पर होने वाली यह विदेश यात्रा केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं मानी जा रही है। भागवत प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संवाद करने के अलावा स्थानीय संघों और उनसे जुड़े संगठनों के निमंत्रण पर कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भारतीय मूल की बड़ी आबादी रहती है, इसलिए इस यात्रा को संगठन के वैश्विक संपर्क और प्रवासी समुदाय से जुड़ाव के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
29 अगस्त को न्यूयॉर्क में होने वाला ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशंस’ कार्यक्रम यात्रा का प्रमुख पड़ाव बताया जा रहा है। इसके अलावा अलग-अलग समुदायों और संगठनों के प्रतिनिधियों से भी उनकी बातचीत प्रस्तावित है। विरोध करने वाले समूहों का अभियान मुख्य रूप से इन्हीं सार्वजनिक कार्यक्रमों और भागवत की उपस्थिति को केंद्र में रखकर चलाया जा रहा है।
पूरा विवाद अमेरिका में सक्रिय भारतीय मूल के अलग-अलग वैचारिक समूहों के बीच लंबे समय से मौजूद मतभेदों को भी सामने लाता है। एक तरफ आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के समर्थक हैं, जो भागवत की यात्रा को सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद और संगठन के शताब्दी वर्ष से जुड़ा कार्यक्रम बता रहे हैं। दूसरी तरफ विरोध करने वाले समूह हैं, जो आरएसएस और भारत सरकार की नीतियों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस तरह मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा से पहले शुरू हुआ विरोध केवल एक कार्यक्रम के खिलाफ प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि यह प्रवासी भारतीय समुदाय के भीतर मौजूद राजनीतिक और वैचारिक टकराव की भी तस्वीर पेश करता है। न्यूज 18 की रिपोर्ट में जिस नेटवर्क का उल्लेख किया गया है, वह पहले भी भारत के कई संवेदनशील मुद्दों को अमेरिकी राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार मंचों तक ले जाता रहा है। अब उसी सक्रियता का अगला केंद्र आरएसएस प्रमुख की प्रस्तावित विदेश यात्रा बन गई है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विरोध अभियान कितना व्यापक रूप लेता है और मोहन भागवत के अमेरिका, कनाडा तथा ब्रिटेन दौरे के दौरान किन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़ी इस यात्रा ने अमेरिका में सक्रिय विभिन्न भारतीय-अमेरिकी संगठनों के बीच राजनीतिक और वैचारिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।




