शिमला। जिला परिषद शिमला में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सी को लेकर राजनीतिक गतिविधियां एक बार फिर तेज हो गई हैं। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की ओर से इस मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखे जाने से अब दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की नजर अदालत के आदेश पर टिक गई है। हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद चुनाव की अगली प्रक्रिया और तारीख को लेकर तस्वीर साफ होगी। इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने समर्थन का आंकड़ा मजबूत करने में जुट गए हैं।
जिला परिषद शिमला में कुल 25 निर्वाचित सदस्य हैं। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में किसी भी दल या समूह को बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 13 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा राजनीतिक समीकरण में भाजपा पहले ही 13 सदस्यों के समर्थन का दावा कर चुकी है। दूसरी ओर कांग्रेस के पक्ष में करीब 11 सदस्यों के होने की बात सामने आ रही है। इस लिहाज से कांग्रेस बहुमत के जादुई आंकड़े से फिलहाल दो कदम दूर दिखाई दे रही है।
हालांकि जिला परिषद की राजनीति में अंतिम समय तक समीकरण बदलने की संभावना बनी रहती है। यही वजह है कि दोनों दल उन सदस्यों पर नजर रखे हुए हैं, जिनका रुख अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं माना जा रहा। एक-एक सदस्य का समर्थन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। ऐसे में अदालत के फैसले से पहले ही राजनीतिक संपर्क और रणनीतिक कवायद बढ़ने लगे हैं।
भाजपा की ओर से लगातार यह दावा किया जा रहा है कि उसके पास 13 सदस्यों का समर्थन मौजूद है और वह बहुमत के आंकड़े को पार कर चुकी है। पार्टी का प्रयास अब अपने साथ खड़े सदस्यों को एकजुट बनाए रखने के साथ-साथ राजनीतिक स्थिति को और मजबूत करना है। भाजपा नेताओं की नजर उन सदस्यों पर भी है, जिनका समर्थन अभी किसी एक खेमे के साथ पूरी तरह तय नहीं माना जा रहा।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह चुनाव चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ अवसर भी माना जा रहा है। यदि पार्टी अपने मौजूदा 11 सदस्यों के साथ दो और सदस्यों का समर्थन जुटा लेती है तो वह भी 13 के बहुमत आंकड़े तक पहुंच सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस खेमे की ओर से भी लगातार रणनीति तैयार की जा रही है। पार्टी की कोशिश उन सदस्यों को अपने पक्ष में लाने की है, जो फिलहाल निर्णायक स्थिति में हैं।
जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव का मामला लंबे समय से अटका हुआ है। मई 2026 में हुए पंचायती राज चुनावों के बाद जिला परिषद के नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाया। चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने के कारण मामला न्यायालय तक पहुंचा। इस संबंध में हाई कोर्ट में दायर याचिका में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए और आरोप लगाया गया कि चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष सरकार की ओर से चुनाव प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई। सरकार ने बताया कि विधानसभा के आगामी सत्र के चलते शिमला के जिलाधीश की व्यस्तता को देखते हुए जिला परिषद की अगली बैठक 10 सितंबर को आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। इसी दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
अब अदालत के आदेश को लेकर राजनीतिक दलों में उत्सुकता बनी हुई है। हाई कोर्ट यदि चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ करता है तो जिला परिषद में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की तारीख तय होने के बाद सियासी गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। चुनाव की तारीख सामने आते ही दोनों दलों को अपने-अपने समर्थक सदस्यों को एकजुट रखने और बहुमत साबित करने की तैयारी करनी होगी।
25 सदस्यीय जिला परिषद में 13 का आंकड़ा इस पूरे राजनीतिक मुकाबले का केंद्र बन गया है। भाजपा का दावा है कि वह इस आंकड़े तक पहुंच चुकी है, जबकि कांग्रेस को दो अतिरिक्त सदस्यों की जरूरत है। ऐसे में यदि किसी एक सदस्य का रुख बदलता है तो मौजूदा समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि दोनों पक्ष किसी भी संभावित बदलाव को लेकर सतर्क हैं।
राजनीतिक रूप से देखें तो जिला परिषद का यह चुनाव केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं रह गया है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने के कारण इसे दोनों दलों के संगठनात्मक प्रभाव और जमीनी पकड़ से भी जोड़कर देखा जा रहा है। शिमला जिला परिषद का राजनीतिक समीकरण आने वाले दिनों में प्रदेश की स्थानीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने 13 सदस्यों के समर्थन को सुरक्षित रखना है। यदि पार्टी अपने मौजूदा आंकड़े को कायम रखने में सफल रहती है तो अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में उसकी स्थिति मजबूत रहेगी। वहीं कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है। उसे अपने 11 सदस्यों को एकजुट रखना होगा और साथ ही दो अन्य सदस्यों का समर्थन हासिल करना होगा।
दोनों दलों की रणनीति अब हाई कोर्ट के आदेश और उसके बाद चुनाव की संभावित तारीख पर निर्भर करेगी। अदालत का फैसला आने से पहले किसी भी खेमे की स्थिति पूरी तरह अंतिम नहीं मानी जा रही है। राजनीतिक दल अपने स्तर पर संभावित विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और सदस्य भी बदलते समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपना रुख तय कर सकते हैं।
यदि कांग्रेस भाजपा के खेमे से किसी सदस्य को अपने पक्ष में लाने में कामयाब रहती है और अन्य दो सदस्यों का समर्थन हासिल कर लेती है, तो मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा अपने 13 सदस्यों के दावे को बनाए रखने के साथ कांग्रेस की संभावित सेंधमारी को रोकने की कोशिश करेगी। ऐसे में आने वाले दिनों में बैठकों, संपर्कों और राजनीतिक बातचीत का दौर बढ़ने की संभावना है।
जिला परिषद के चुनाव में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इन पदों के जरिए स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों, प्रशासनिक समन्वय और पंचायत क्षेत्रों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों में नेतृत्व की भूमिका निभाई जाती है। यही वजह है कि दोनों दल इन पदों पर अपने समर्थक उम्मीदवारों को बैठाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं।
मई में पंचायती राज चुनावों के बाद से चुनाव प्रक्रिया लंबित रहने के कारण अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं। सरकार की ओर से 10 सितंबर को बैठक आयोजित करने की जानकारी अदालत में दिए जाने के बाद यह माना जा रहा है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट हो सकती है। हालांकि अंतिम दिशा अदालत के आदेश और उसके बाद प्रशासनिक प्रक्रिया से ही तय होगी।
फिलहाल भाजपा बहुमत के आंकड़े के साथ आगे होने का दावा कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता का समीकरण बदलने के लिए जरूरी दो सदस्यों की तलाश में है। दोनों दलों के बीच यह मुकाबला आने वाले दिनों में और दिलचस्प हो सकता है। हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद यह साफ होगा कि चुनाव कब और किस प्रक्रिया के तहत होगा, लेकिन उससे पहले ही शिमला जिला परिषद में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ चुकी है।
अब असली परीक्षा उस समय होगी जब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव के लिए सदस्य मतदान के लिए सामने आएंगे। तब तक कौन किसके साथ खड़ा रहता है और कौन सा राजनीतिक समीकरण बनता है, यह कहना मुश्किल है। फिलहाल 25 सदस्यों वाली जिला परिषद में 13 के आंकड़े ने पूरे मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है और दोनों प्रमुख दल हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार करते हुए अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने में जुटे हैं।




