वंदे मातरम् विवाद पर शांता कुमार का कांग्रेस पर हमला, बोले- इंडोनेशिया से सीखें सांस्कृतिक विरासत बचाने की कला

वंदे मातरम् विवाद पर शांता कुमार का कांग्रेस पर हमला, बोले- इंडोनेशिया से सीखें सांस्कृतिक विरासत बचाने की कला

कांगड़ा। वंदे मातरम् को लेकर देश में चल रही बहस के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा है कि आजादी के 80 वर्ष बाद भी देश के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े एक महत्वपूर्ण गीत को विवाद का विषय बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है और इस गीत ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोगों में राष्ट्रीय चेतना पैदा करने में अहम भूमिका निभाई थी।

शांता कुमार ने कहा कि जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लाखों-करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की भावना को मजबूत किया, उसके स्वरूप और गायन को लेकर आज राजनीतिक विवाद खड़ा होना चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि देश को अपने इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक खांचे में बांटने के बजाय उनके ऐतिहासिक महत्व को समझने की जरूरत है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने वंदे मातरम् के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 1937 तक कांग्रेस के कार्यक्रमों में भी पूरा वंदे मातरम् गाया जाता था। उनके मुताबिक, बाद में मोहम्मद अली जिन्ना की ओर से इसके कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताए जाने के बाद कांग्रेस ने इसके दो छंदों का गायन बंद कर दिया। शांता कुमार ने कहा कि यह इतिहास का हिस्सा है और आज वंदे मातरम् को लेकर किसी भी चर्चा में उस समय की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् केवल साहित्यिक रचना या सामान्य गीत नहीं था, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इसका विशेष स्थान रहा है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन के दौरान यह गीत लोगों के बीच राष्ट्रीय भावना को व्यक्त करने का माध्यम बना। शांता कुमार के अनुसार, उस समय देश के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्रता सेनानी और आम नागरिक वंदे मातरम् के माध्यम से अपने भीतर आजादी की भावना को मजबूत करते थे।

शांता कुमार ने कहा कि समय के साथ देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां बदली हैं, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को बदलने या उसके प्रतीकों को विवाद में डालने के बजाय उनसे जुड़ी भावनाओं को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जिन नारों, गीतों और प्रतीकों ने लोगों को एकजुट किया, उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारना उचित नहीं होगा।

उन्होंने वंदे मातरम् के विवाद को लेकर कांग्रेस के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को ऐसे संवेदनशील विषयों पर व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उनके अनुसार, देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह पूरे देश की साझा विरासत है और इसके प्रति सम्मान बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

शांता कुमार ने इस पूरे मामले में इंडोनेशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को उस देश से अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति दृष्टिकोण को लेकर सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है, इसके बावजूद वहां रामायण, रामलीला और हिंदू संस्कृति से जुड़े अनेक प्रतीक आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में दिखाई देते हैं।

उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया का उदाहरण यह बताता है कि किसी व्यक्ति या समाज की धार्मिक पहचान बदलने के बावजूद उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। शांता कुमार ने इंडोनेशिया के एक मंत्री के कथित बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लोगों ने धर्म बदला, लेकिन अपने पूर्वजों और संस्कृति को नहीं छोड़ा।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करने का अर्थ किसी दूसरे धर्म या समुदाय का विरोध करना नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी देश की परंपराएं उसकी ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा होती हैं और उनका सम्मान किया जा सकता है, भले ही वहां रहने वाले लोगों की धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हों।

इसी संदर्भ में शांता कुमार ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि इंडोनेशिया जैसा मुस्लिम बहुल देश अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रतीकों को सम्मान के साथ स्वीकार कर सकता है, तो भारत में पूरा वंदे मातरम् गाने को लेकर आपत्ति क्यों होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् को किसी धर्म विशेष के चश्मे से देखने के बजाय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

शांता कुमार ने कहा कि भारत की पहचान केवल वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता, परंपराओं, भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से बनी है। उन्होंने कहा कि देश की विविधता को स्वीकार करते हुए अपनी ऐतिहासिक जड़ों के प्रति सम्मान रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, आधुनिकता का मतलब अपनी परंपराओं और इतिहास को भूल जाना नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। ऐसे में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि सभी समुदाय एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ देश की साझा सांस्कृतिक विरासत का भी सम्मान करें।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को नई पीढ़ी तक सही संदर्भ में पहुंचाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि युवाओं को यह बताया जाना चाहिए कि आजादी केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे लाखों लोगों का त्याग, संघर्ष और राष्ट्रीय चेतना थी। वंदे मातरम् जैसे गीतों और नारों ने उस दौर में लोगों को मानसिक रूप से संघर्ष के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों का महत्व समझना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि समय के साथ ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर धारणाएं बदल सकती हैं। शांता कुमार ने कहा कि इतिहास को राजनीतिक सुविधा के अनुसार देखने के बजाय तथ्यों और उस समय की परिस्थितियों के आधार पर समझा जाना चाहिए।

उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी होने के नाते कांग्रेस को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े प्रतीकों को लेकर स्पष्ट और जिम्मेदार दृष्टिकोण रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका रही है और इसलिए उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह उस दौर की राष्ट्रीय भावना से जुड़े प्रतीकों के महत्व को समझे।

शांता कुमार ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् को लेकर किसी भी समुदाय की भावनाओं की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में सभी धर्मों और समुदायों का सम्मान आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक प्रतीकों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने इस विषय पर टकराव के बजाय संवाद की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि देश की एकता केवल संवैधानिक संस्थाओं से नहीं बनती, बल्कि साझा इतिहास और राष्ट्रीय भावनाओं से भी मजबूत होती है। यदि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों को लेकर लगातार विवाद पैदा होते रहेंगे तो इससे आने वाली पीढ़ियों के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए राजनीतिक दलों को ऐसे मामलों में बयानबाजी के बजाय ऐतिहासिक तथ्यों और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।

शांता कुमार ने कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर हीन भावना रखने की जरूरत नहीं है। देश की सभ्यता और संस्कृति का इतिहास बेहद पुराना और व्यापक है। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों के उदाहरणों से भी यह सीखा जा सकता है कि आधुनिक राष्ट्र अपनी धार्मिक विविधता के बावजूद अपनी ऐतिहासिक विरासत को किस तरह संरक्षित रखते हैं।

इंडोनेशिया का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां रामायण और उससे जुड़े सांस्कृतिक प्रतीकों की मौजूदगी यह दिखाती है कि धार्मिक विविधता के बीच भी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह इतिहास और वर्तमान के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वंदे मातरम् को लेकर बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि इसके कितने छंद गाए जाएं। इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का पूरा इतिहास और उस दौर की राष्ट्रीय भावना जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इस विषय को समझने के लिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर ऐतिहासिक संदर्भ को देखना जरूरी है।

शांता कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों का सम्मान किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष के प्रति समर्थन नहीं होता। यह उस संघर्ष के प्रति सम्मान है जिसके कारण देश को स्वतंत्रता मिली। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाले लोगों ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभी समुदायों के प्रति सम्मान महत्वपूर्ण तत्व थे।

उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन विविधता का अर्थ अपनी साझा विरासत से दूरी बनाना नहीं है। देश की अलग-अलग परंपराओं के बीच संवाद और सम्मान की भावना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मुद्दों को राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से देखने के बजाय देश की दीर्घकालीन एकता और सामाजिक सद्भाव को ध्यान में रखना चाहिए।

वंदे मातरम् को लेकर अपनी प्रतिक्रिया में शांता कुमार ने दोहराया कि स्वतंत्रता के 80 वर्ष बाद भी इस तरह के विषय पर विवाद होना देश के लिए विचार का विषय है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को इतिहास की जानकारी सही संदर्भ में दी जानी चाहिए, ताकि वे स्वतंत्रता आंदोलन की वास्तविक परिस्थितियों और उसमें राष्ट्रीय प्रतीकों की भूमिका को समझ सकें।

उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए और साथ ही देश के सभी धर्मों और समुदायों का सम्मान भी बनाए रखना चाहिए। शांता कुमार के अनुसार, राष्ट्रीय एकता का रास्ता किसी की पहचान मिटाने से नहीं, बल्कि अलग-अलग पहचानों के बीच साझा राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने से निकलता है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने उम्मीद जताई कि वंदे मातरम् को लेकर चल रही बहस राजनीतिक टकराव का कारण बनने के बजाय देश के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और सांस्कृतिक विरासत पर सार्थक चर्चा का अवसर बनेगी। उन्होंने कहा कि जिन प्रतीकों ने कभी भारतीयों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट किया था, उनके महत्व को आज की राजनीति से ऊपर उठकर समझने की आवश्यकता है।