देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर बनी चिंता के बीच चीनी उद्योग ने राहत की बात कही है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) का कहना है कि घरेलू बाजार में चीनी की कोई वास्तविक कमी नहीं है और आने वाले दिनों में खुदरा कीमतों में नरमी देखने को मिल सकती है। त्योहारों का सीजन शुरू होने से पहले बाजार में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इसके साथ ही केंद्र सरकार की ओर से 10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दिए जाने से सप्लाई बढ़ने की उम्मीद है।
पिछले कुछ हफ्तों में चीनी की खुदरा कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। करीब एक महीने में इसकी कीमत 20 फीसदी से अधिक बढ़कर कुछ जगहों पर 60 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई। कीमतों में इस तेजी के बाद सरकार ने घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने और महंगाई पर लगाम लगाने के लिए आयात का रास्ता खोला है। सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख टन रॉ शुगर पर किसी तरह का सीमा शुल्क लगाए बिना आयात की मंजूरी दी थी।
त्योहारों से पहले सप्लाई बढ़ाने की तैयारी
चीनी की खपत आम दिनों के मुकाबले त्योहारों के दौरान बढ़ जाती है। मिठाइयों, बेकरी उत्पादों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ने के कारण बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना जरूरी माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने आयात की अनुमति दी है।
चीनी उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि मौजूदा घरेलू स्टॉक त्योहारों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। आयातित रॉ शुगर की अतिरिक्त खेप आने से सप्लाई की स्थिति और मजबूत हो सकती है। इसका असर आगे चलकर खुदरा बाजार में कीमतों पर पड़ने की उम्मीद है।
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF) ने भी देश में चीनी की उपलब्धता को पर्याप्त बताया है। फेडरेशन के अध्यक्ष प्रकाश नाईकनवरे के मुताबिक, 2025-26 सीजन के लिए देश के नेट शुगर प्रोडक्शन का अनुमान 2.79 करोड़ टन पर बरकरार रखा गया है।
करीब 3 करोड़ टन सालाना उत्पादन
भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। देश में हर साल करीब 3 करोड़ टन चीनी का उत्पादन होता है। हालांकि कुल उत्पादन का एक हिस्सा इथेनॉल बनाने के लिए भी इस्तेमाल होता है। मौजूदा सीजन में करीब 24 लाख टन चीनी को इथेनॉल उत्पादन की दिशा में डायवर्ट किया गया है।
इसके बावजूद उद्योग संगठनों का मानना है कि घरेलू बाजार के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। इसलिए मौजूदा स्थिति को उत्पादन की भारी कमी के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे बाजार में उपलब्धता, मांग और आपूर्ति के संतुलन समेत कई कारकों का असर माना जा रहा है।
इसी वजह से सरकार की ओर से सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति को बाजार में अतिरिक्त सप्लाई उपलब्ध कराने के उपाय के तौर पर देखा जा रहा है।
ब्राजील से आने वाली चीनी पर नजर
आयात की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती समय की है। NFCSF के मुताबिक, कुछ आयातित खेप 15 अक्टूबर से पहले भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकती हैं। हालांकि यह कई प्रशासनिक और लॉजिस्टिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
फेडरेशन के अध्यक्ष प्रकाश नाईकनवरे ने बताया कि थाईलैंड इस समय खुद चीनी की कमी से प्रभावित है। ऐसे में भारत के लिए रॉ शुगर खरीदने का प्रमुख विकल्प ब्राजील रह जाता है। ब्राजील से भारत तक समुद्री रास्ते से चीनी पहुंचाने में लगभग 40 से 45 दिन लग सकते हैं।
इसमें केवल समुद्री यात्रा का समय ही शामिल नहीं है। शिपमेंट की बुकिंग, आवश्यक मंजूरियां, लेटर ऑफ क्रेडिट, बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही और पोर्ट कंजेशन जैसी परिस्थितियां पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए किसी खेप के भारत पहुंचने की वास्तविक तारीख इन सभी कारकों के आधार पर बदल सकती है।
31 अक्टूबर के बाद भी मिल सकती है खेप को मंजूरी
सरकार ने आयात के लिए 31 अक्टूबर की समयसीमा तय की है। हालांकि उद्योग की ओर से संकेत दिया गया है कि पहले से रास्ते में मौजूद शिपमेंट के मामले में कुछ राहत संभव है।
नाईकनवरे के मुताबिक, अगर कोई जहाज तय समयसीमा से पहले रवाना हो चुका है और उसकी खेप रास्ते में है, तो उसे 31 अक्टूबर के बाद भी भारत पहुंचने की अनुमति दिए जाने की संभावना है। इससे उन आयातकों को राहत मिल सकती है जिन्होंने समय रहते अपनी खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन लंबी समुद्री यात्रा के कारण उनकी खेप तय तारीख तक बंदरगाह नहीं पहुंच पाती।
इस तरह सरकार की आयात नीति में सिर्फ समयसीमा ही नहीं, बल्कि पहले से समुद्र में मौजूद माल को लेकर भी व्यावहारिक रुख अपनाए जाने की उम्मीद की जा रही है।
बंदरगाह वाले राज्यों में पहले पहुंचेगी रॉ शुगर
आयातित चीनी का वितरण पूरे देश में एक साथ नहीं होगा। समुद्री रास्ते से आने वाली रॉ शुगर सबसे पहले उन राज्यों में पहुंचने की संभावना है जहां बड़े बंदरगाह मौजूद हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्यों को इसका शुरुआती फायदा मिल सकता है।
इन राज्यों की रिफाइनरियों और शुगर मिलों तक रॉ शुगर को अपेक्षाकृत आसानी से पहुंचाया जा सकेगा। इसके बाद इसे प्रोसेस करके तैयार चीनी में बदला जाएगा।
वहीं, उत्तर भारत के ऐसे राज्य जिनकी समुद्र तक सीधी पहुंच नहीं है, वहां आयातित चीनी को रेल और सड़क परिवहन के जरिए पहुंचाया जाएगा। इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में अतिरिक्त सप्लाई उपलब्ध कराने की कोशिश होगी।
भारत ने कम किया चीनी का निर्यात
घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए भारत ने चीनी के निर्यात पर भी नियंत्रण लगाया हुआ है। सरकार ने 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात पर रोक लगा रखी है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित करना है।
NFCSF के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें भारत के लिए बहुत अनुकूल नहीं थीं। इसी वजह से 20 लाख टन के निर्धारित निर्यात कोटे के मुकाबले देश से केवल करीब 8 लाख टन चीनी का ही निर्यात हुआ।
नाईकनवरे का कहना है कि अगर निर्यात पर कोई पाबंदी नहीं होती, तब भी निर्यात का आंकड़ा 10 लाख टन से अधिक जाने की संभावना नहीं थी। यानी उपलब्ध उत्पादन के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चीनी की मांग और कीमतें ऐसी नहीं थीं कि बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा सके।
रॉ शुगर सीधे खाने के काम नहीं आएगी
सरकार ने जिस 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति दी है, उसमें रॉ शुगर शामिल है। इसका मतलब यह नहीं है कि ब्राजील से आने वाली चीनी को सीधे दुकानों पर बेच दिया जाएगा।
रॉ शुगर को पहले भारत में मौजूद रिफाइनरियों या शुगर मिलों में प्रोसेस किया जाएगा। इस प्रक्रिया के दौरान अशुद्धियों और अन्य अवांछित तत्वों को हटाकर इसे सफेद दानेदार चीनी के रूप में तैयार किया जाएगा। इसके बाद तैयार चीनी को बाजार में सप्लाई किया जा सकेगा।
इस पूरी प्रक्रिया में आयातित माल के बंदरगाह तक पहुंचने के बाद उसे संबंधित मिलों तक ले जाना, प्रोसेसिंग करना और फिर वितरण नेटवर्क के जरिए अलग-अलग बाजारों तक पहुंचाना शामिल होगा।
कीमतों पर कब दिखेगा असर?
चीनी उद्योग का मानना है कि मौजूदा कीमतों में आगे नरमी आ सकती है। हालांकि आयातित रॉ शुगर की खेप भारत पहुंचने में समय लग सकता है, इसलिए बाजार में इसका असर तत्काल दिखाई देना जरूरी नहीं है।
सरकार का लक्ष्य अतिरिक्त सप्लाई के जरिए बाजार में उपलब्धता बढ़ाना है। वहीं उद्योग संगठनों का कहना है कि घरेलू स्टॉक पहले से पर्याप्त है। ऐसे में आयात को अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने की स्थिति में।
अगर आयातित खेप समय पर भारत पहुंचती हैं और उन्हें तेजी से प्रोसेस करके बाजार में उतारा जाता है, तो आने वाले समय में आपूर्ति की स्थिति बेहतर हो सकती है। इससे खुदरा कीमतों पर भी दबाव कम होने की उम्मीद है।
फिलहाल चीनी की बढ़ी कीमतों के बीच सरकार और उद्योग दोनों की नजर आने वाले हफ्तों में सप्लाई और मांग के संतुलन पर है। त्योहारों से पहले पर्याप्त घरेलू स्टॉक, सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री आयात और निर्यात पर लगी रोक मिलकर बाजार में उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि चीनी उद्योग को उम्मीद है कि मौजूदा तेजी लंबे समय तक नहीं रहेगी और आने वाले दिनों में उपभोक्ताओं को कीमतों में राहत मिल सकती है।




