NSE का IPO एक कदम और आगे बढ़ा, 30 हजार करोड़ रुपये तक का हो सकता है देश का सबसे बड़ा शेयर इश्यू

NSE का IPO एक कदम और आगे बढ़ा, 30 हजार करोड़ रुपये तक का हो सकता है देश का सबसे बड़ा शेयर इश्यू

देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने अपने बहुप्रतीक्षित आईपीओ की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) जमा कर दिया है। लंबे समय से बाजार में NSE की लिस्टिंग को लेकर चर्चा चल रही थी और अब यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इश्यू करीब 30 हजार करोड़ रुपये का हो सकता है, जो इसे भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में शामिल कर सकता है।

अनलिस्टेड मार्केट में NSE की अनुमानित वैल्यूएशन लगभग 5 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसी आधार पर बाजार विशेषज्ञ IPO के संभावित आकार का अनुमान लगा रहे हैं। यदि इश्यू का आकार अनुमानित स्तर तक पहुंचता है, तो यह अब तक के सबसे बड़े आईपीओ हुंडई मोटर इंडिया के 27 हजार करोड़ रुपये के सार्वजनिक निर्गम को भी पीछे छोड़ सकता है। इससे पहले LIC का 20,557 करोड़ रुपये का आईपीओ भी देश के सबसे बड़े इश्यू में शामिल रहा है।

खास बात यह है कि प्रस्तावित आईपीओ पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल (OFS) मॉडल पर आधारित होगा। इसका अर्थ यह है कि NSE स्वयं नए शेयर जारी कर पूंजी नहीं जुटाएगा। इसके बजाय मौजूदा निवेशक अपने शेयरों का एक हिस्सा बेचकर निवेशकों को उपलब्ध कराएंगे। इस प्रक्रिया में लगभग 6 प्रतिशत हिस्सेदारी बाजार में उतारे जाने की संभावना है।

ड्राफ्ट दस्तावेजों के अनुसार कई बड़े संस्थागत निवेशक अपने शेयर बेचने की तैयारी कर रहे हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक (SBI) सबसे बड़ा विक्रेता बनकर उभर रहा है। SBI लगभग 2.47 करोड़ शेयरों की बिक्री कर सकता है। इसके अलावा मॉरीशस स्थित निवेशक MS Strategic Limited भी बड़ी मात्रा में शेयर बेचने की योजना में है। कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड (CPPIB) भी इस सार्वजनिक निर्गम के जरिए अपनी हिस्सेदारी का एक भाग निवेशकों के लिए उपलब्ध कराएगा।

हालांकि इस प्रक्रिया में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC, जो NSE की प्रमुख शेयरधारकों में शामिल है, अपने शेयर बेचने की योजना में शामिल नहीं है। यानी IPO के दौरान LIC अपनी हिस्सेदारी बरकरार रखेगी। लिस्टिंग के बाद NSE के शेयर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर ट्रेड होंगे, ठीक उसी प्रकार जैसे BSE के शेयर वर्तमान में NSE पर सूचीबद्ध हैं।

DRHP दाखिल करने से पहले एक्सचेंज ने सभी आवश्यक आंतरिक प्रक्रियाएं पूरी कीं। बुधवार को NSE की IPO समिति की बैठक आयोजित की गई, जिसमें अंतिम दस्तावेजों और प्रक्रियाओं को मंजूरी दी गई। इससे पहले सोमवार को कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने भी ड्राफ्ट पेपर्स दाखिल करने की अनुमति दे दी थी। इस प्रकार प्रबंधन और बोर्ड स्तर पर सभी जरूरी स्वीकृतियां प्राप्त करने के बाद दस्तावेज नियामक के पास भेजे गए।

दरअसल NSE की लिस्टिंग की राह कई वर्षों से विभिन्न नियामकीय चुनौतियों के कारण अटकी हुई थी। एक्सचेंज ने पहली बार वर्ष 2016 में सार्वजनिक निर्गम के लिए आवेदन किया था। उस समय लगभग 10 हजार करोड़ रुपये के ऑफर फॉर सेल की योजना बनाई गई थी। लेकिन बाद में सामने आए को-लोकेशन विवाद ने पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया और लिस्टिंग का रास्ता बंद हो गया।

को-लोकेशन मामला NSE के इतिहास के सबसे चर्चित विवादों में शामिल रहा है। आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकरों को एक्सचेंज के ट्रेडिंग सिस्टम तक अन्य निवेशकों की तुलना में पहले पहुंच मिल रही थी, जिससे उन्हें अनुचित लाभ प्राप्त हो सकता था। इस मामले ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस और निष्पक्ष बाजार व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

इन चिंताओं को देखते हुए SEBI ने उस समय NSE को अपना IPO प्रस्ताव वापस लेने की सलाह दी थी। इसके बाद कई वर्षों तक एक्सचेंज की लिस्टिंग की योजना ठंडे बस्ते में चली गई। हालांकि इस दौरान NSE ने अपने आंतरिक नियंत्रण, अनुपालन व्यवस्था और गवर्नेंस फ्रेमवर्क में कई सुधार किए। कंपनी लगातार नियामक के साथ संवाद करती रही और विभिन्न स्तरों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करती रही।

जनवरी 2026 में स्थिति तब बदली जब SEBI ने NSE को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) प्रदान किया। यह मंजूरी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि इसे कुछ लंबित विवादों के अंतिम निपटारे से अलग रखते हुए दिया गया। NOC मिलने के बाद फरवरी में NSE बोर्ड ने IPO प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति प्रदान कर दी थी, जिसके बाद DRHP दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

अपनी तैयारी को मजबूत बनाने के लिए NSE ने इस बार बड़े स्तर पर पेशेवर सलाहकारों की सेवाएं ली हैं। रिपोर्टों के अनुसार एक्सचेंज ने करीब 20 मर्चेंट बैंकर्स, कानूनी सलाहकारों और अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं को इस प्रक्रिया में शामिल किया है। इसका उद्देश्य नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आईपीओ को सफलतापूर्वक बाजार तक पहुंचाना है।

दूसरी ओर, को-लोकेशन मामले का समाधान अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इस विवाद को निपटाने के लिए NSE ने जून 2025 में सेटलमेंट आवेदन दाखिल किया था। एक्सचेंज ने मामले को समाप्त करने के लिए लगभग 1,387.39 करोड़ रुपये का भुगतान करने का प्रस्ताव रखा था। कंपनी का मानना था कि इस भुगतान के जरिए विवाद का समाधान किया जा सकता है।

हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार SEBI की हाई पावर्ड एडवाइजरी कमिटी (HPAC) ने इससे अधिक राशि पर समझौते की सिफारिश की है। समिति का सुझाव करीब 1,880 करोड़ रुपये के भुगतान का बताया जा रहा है। इसमें लगभग 1,200 करोड़ रुपये डिसजॉर्जमेंट, करीब 380 करोड़ रुपये ब्याज तथा शेष राशि सेटलमेंट शुल्क के रूप में शामिल है। फिलहाल यह प्रस्ताव SEBI के संबंधित अधिकारियों के विचाराधीन बताया जाता है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि NSE का आईपीओ भारतीय शेयर बाजार के लिए एक ऐतिहासिक घटना साबित हो सकता है। देश के अधिकांश इक्विटी और डेरिवेटिव कारोबार का बड़ा हिस्सा NSE के प्लेटफॉर्म पर होता है। ऐसे में इसकी लिस्टिंग से निवेशकों को सीधे तौर पर देश के सबसे प्रभावशाली एक्सचेंज के कारोबार में भागीदारी का अवसर मिलेगा।

अब निवेशकों की नजर SEBI की समीक्षा प्रक्रिया और अंतिम मंजूरी पर टिकी हुई है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार आगे बढ़ता है तो NSE का सार्वजनिक निर्गम भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ सकता है। करीब एक दशक तक विभिन्न कारणों से रुकी रही यह प्रक्रिया अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और आने वाले महीनों में इससे जुड़ी गतिविधियां बाजार की सबसे बड़ी चर्चाओं में शामिल रहने की संभावना है।