नेपाल और तिब्बत की सीमा से लगे पहाड़ी इलाके में बुधवार सुबह आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी। इस आपदा में अब तक 160 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि एक हजार से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। मृतकों में नेपाल में 157 और तिब्बत में 3 लोगों की जान गई है। लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है और इनमें 133 भारतीय नागरिक भी शामिल बताए गए हैं।
इस त्रासदी ने नेपाल के रसुवा और आसपास के इलाकों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। उफनते पानी और मलबे ने पुलों, सड़कों, घरों और जलविद्युत परियोजनाओं को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। कई जगह नदी का जलस्तर अचानक इतना बढ़ गया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। बताया जा रहा है कि बाढ़ की लहर करीब 30 फीट तक ऊपर पहुंच गई थी और तेज बहाव अपने साथ मकान, वाहन और सरकारी ढांचों को बहाकर ले गया।
इस घटना को लेकर शुरुआत में भ्रम की स्थिति बनी रही। बुधवार सुबह नेपाल-चीन सीमा के नजदीक काठमांडू के उत्तर में तेज झटके महसूस किए गए थे। पहले अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS की ओर से इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप बताया गया। हालांकि बाद में जांच के बाद स्थिति साफ हुई कि यह सामान्य भूकंप नहीं था।
पहाड़ खिसकने से पैदा हुआ भूकंप जैसा झटका
USGS के अनुसार चीन की ओर ल्हेंदे नदी के आसपास पहाड़ का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया था। चट्टानों, बर्फ और संभवतः ग्लेशियर के बड़े हिस्से के अचानक खिसकने से इतनी शक्तिशाली ऊर्जा पैदा हुई कि जमीन पर 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा कंपन महसूस किया गया।
यानि इलाके में पहले भूकंप आने और उसके बाद बाढ़ आने की बात सही नहीं पाई गई। असल में पहाड़ के विशाल हिस्से के टूटकर गिरने से जमीन कांपी और इसके बाद नदी में पानी तथा मलबे का विशाल प्रवाह शुरू हो गया।
ल्हेंदे खोला नदी, भोटेकोशी नदी की एक सहायक नदी है। यह चीन के इलाके से निकलकर गहरी और संकरी पहाड़ी घाटियों के रास्ते नेपाल में प्रवेश करती है। जब पहाड़ का बड़ा हिस्सा नदी के रास्ते में गिरा तो पानी और मलबे की दिशा अचानक बदल गई। इसके बाद पानी का दबाव तेजी से बढ़ा और बाढ़ का सैलाब भोटेकोशी तथा त्रिशूली नदी की ओर फैल गया।
वैज्ञानिक अभी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पहाड़ के टूटने के पीछे वास्तविक कारण क्या था। शुरुआती आशंका है कि ग्लेशियर या बर्फ से जुड़ा बड़ा हिस्सा भी चट्टानों के साथ नीचे आया हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि घटना के वास्तविक कारणों को समझने में कई सप्ताह लग सकते हैं।
150 किलोमीटर दूर तक पहुंचा मलबा
बाढ़ की रफ्तार और ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पानी और मलबे का असर करीब 150 किलोमीटर दूर चितवन तक पहुंच गया। यहां तक बहकर आए मलबे और पानी के बीच अब तक 33 शव बरामद किए गए हैं।
तेज बहाव ने रास्ते में आने वाले कई गांवों और बस्तियों को प्रभावित किया। राहत एजेंसियों को लगातार डर है कि लापता लोगों में से कई लोग नदी के तेज बहाव में दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच गए होंगे। इसी वजह से सर्च ऑपरेशन केवल रसुवा और सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखा गया है।
खराब मौसम राहत कार्यों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई इलाकों तक जाने वाली सड़कें टूट चुकी हैं और कुछ स्थानों पर पुल बह जाने से बचाव दलों को प्रभावित गांवों तक पहुंचने में परेशानी हो रही है। मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश के साथ-साथ नदी के किनारों पर भी खोज अभियान चलाया जा रहा है।
133 भारतीय नागरिक भी लापता
इस आपदा का असर केवल नेपाल के स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं है। लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की बताई जा रही है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार नेपाल में लापता लोगों में 466 विदेशी और 113 नेपाली नागरिक शामिल हैं। विदेशी नागरिकों में 133 भारतीयों और 37 NRI के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
बताया जा रहा है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे कई श्रद्धालु भी बाढ़ की चपेट में आ गए। सीमा क्षेत्र और पहाड़ी रास्तों पर अचानक आई आपदा के कारण कई यात्री अलग-अलग स्थानों पर फंस गए। प्रशासन और राहत एजेंसियां विदेशी नागरिकों के बारे में जानकारी जुटाने में लगी हैं।
नेपाल के स्थानीय प्रशासन के साथ सुरक्षा एजेंसियां और स्वास्थ्य विभाग भी बचाव अभियान में शामिल हैं। लापता लोगों की पहचान और उनके संभावित ठिकानों का पता लगाने के लिए अलग-अलग टीमों को प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया है।
13 जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान
बाढ़ ने नेपाल के ऊर्जा ढांचे को भी बड़ा झटका दिया है। रसुवा और आसपास के इलाकों में 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रभावित हुए हैं। इनमें 8 परियोजनाएं चालू थीं, जबकि 5 का निर्माण कार्य चल रहा था। इन सभी परियोजनाओं की कुल क्षमता करीब 748 मेगावाट बताई गई है।
बाढ़ के बाद जलविद्युत परियोजनाओं में काम कर रहे 133 से ज्यादा कर्मचारी और श्रमिक भी लापता बताए गए हैं। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार इनमें कुछ विदेशी कर्मचारी भी शामिल हैं।
प्राधिकरण की विशेष टीमें प्रभावित इलाकों में पहुंच चुकी हैं और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर लापता कर्मचारियों की तलाश की जा रही है। परियोजनाओं के आसपास भारी मलबा जमा होने और संपर्क मार्ग टूटने से बचाव अभियान काफी मुश्किल हो गया है।
सड़कें और पुल बहने से संपर्क टूटा
आपदा में नेपाल के सड़क नेटवर्क को भी गंभीर नुकसान हुआ है। बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा चौकी तक जाने वाली सड़क का लगभग 42 किलोमीटर हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया या पानी में बह गया। इस सड़क के प्रभावित होने से नेपाल और चीन सीमा के बीच संपर्क बुरी तरह बाधित हुआ है।
इसके अलावा कम से कम 19 बड़े पुलों के बहने की पुष्टि हुई है। कई स्थानीय झूला पुल भी बाढ़ की चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हो गए। सड़क और पुल टूटने के कारण कई गांवों का बाहरी दुनिया से संपर्क कट गया है।
बचावकर्मियों को कई इलाकों में पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्तों और हवाई सहायता पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर राहत सामग्री पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
बिहार और उत्तर प्रदेश में भी बढ़ी सतर्कता
नेपाल में आई इस भीषण बाढ़ का असर भारत के कुछ हिस्सों तक पहुंचने की आशंका को देखते हुए प्रशासन सतर्क हो गया है। खासतौर पर बिहार की गंडक नदी और उससे जुड़ी अन्य नदियों के जलस्तर पर नजर रखी जा रही है।
नेपाल से करीब 3 मीटर ऊंची फ्लड वेव आने की आशंका जताई गई है। पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। सीतामढ़ी और शिवहर के हालात पर भी प्रशासन की नजर बनी हुई है।
नेपाल से आने वाला पानी त्रिशूली नदी के रास्ते गंडक नदी तक पहुंच सकता है। इसके बाद बिहार के निचले और नदी किनारे वाले इलाकों में जलस्तर बढ़ने की संभावना है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर जिलों में भी प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
अमेरिका ने 5 लाख डॉलर की सहायता का ऐलान किया
बाढ़ प्रभावित नेपाल के लिए अमेरिका ने 5 लाख डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार यह रकम प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने और बचाव कार्यों में मदद के लिए इस्तेमाल की जाएगी।
अमेरिका की ओर से प्रभावित इलाके में एक आपदा सलाहकार भेजने की भी बात कही गई है। सहायता राशि से अस्थायी आश्रय, जरूरी राहत सामग्री, साफ पानी, स्वच्छता और सफाई से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद की जाएगी।
काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास ने बताया कि वह प्रभावित क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी नागरिकों की जानकारी जुटाने के लिए स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है और जरूरत पड़ने पर उन्हें सहायता पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
भारत ने भेजी 10 टन राहत सामग्री
भारत ने भी नेपाल में जारी राहत और बचाव अभियान के लिए मदद भेजी है। भारत की ओर से करीब 10 टन मानवीय सहायता और जरूरी दवाइयां नेपाल पहुंचाई गई हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार भारतीय वायुसेना का C-130J विमान राहत सामग्री लेकर काठमांडू पहुंचा।
राहत सामग्री में अस्थायी टेंट, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और आवश्यक दवाइयां शामिल हैं। भारत ने संकेत दिया है कि जरूरत के अनुसार नेपाल के लिए आगे भी राहत सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।
नदी किनारे अभी भी खतरा, लोगों को चेतावनी
नेपाल के फ्लड फोरकास्टिंग डिविजन ने चेतावनी दी है कि प्रभावित नदियों के आसपास खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और नदी के आसपास जाने से बचने की सलाह दी गई है।
चीन की ओर नदी के रास्ते में बनी झील का पानी अभी पूरी तरह खाली नहीं हुआ है। ऐसे में अगर वहां से फिर बड़ी मात्रा में पानी निकलता है तो निचले इलाकों में एक बार फिर खतरा बढ़ सकता है।
प्रशासन ने लोगों से सुरक्षित स्थानों पर रहने और किसी भी आपात स्थिति में स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने की अपील की है। नेपाल ने इससे पहले भी भोटेकोशी नदी में विनाशकारी बाढ़ देखी है। पिछले साल आई बाढ़ में 11 लोगों की मौत हुई थी और नेपाल-चीन को जोड़ने वाला मितेरी पुल भी बह गया था।
फिलहाल राहत एजेंसियों की सबसे बड़ी चुनौती एक हजार से अधिक लापता लोगों का पता लगाना है। खराब मौसम, टूटी सड़कें, बिखरा हुआ मलबा और तेज नदी प्रवाह बचाव अभियान को लगातार मुश्किल बना रहे हैं। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई इस आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, ग्लेशियर और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को गंभीर रूप से सामने ला दिया है।




