लिवर शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। यह सिर्फ खाने को पचाने में मदद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर में पोषक तत्वों के इस्तेमाल, ऊर्जा के प्रबंधन, हानिकारक पदार्थों को प्रोसेस करने और कई जरूरी रासायनिक प्रक्रियाओं में अहम भूमिका निभाता है। यही वजह है कि लिवर की सेहत खराब होने का असर शरीर के कई दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है।
जॉन हॉपकिन्स मेडिसिन के अनुसार, लिवर शरीर में करीब 500 अलग-अलग तरह के जरूरी काम करता है। इसके बावजूद हमारी रोजमर्रा की कई आदतें धीरे-धीरे इस अंग पर दबाव बढ़ा सकती हैं। इनमें अनहेल्दी डाइट, ज्यादा चीनी, शारीरिक गतिविधि की कमी, शराब और बिना सलाह दवाएं लेना जैसी आदतें शामिल हैं।
जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की करीब 38% आबादी फैटी लिवर की समस्या से प्रभावित है। खास बात यह है कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों की समस्या नहीं है। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी इससे प्रभावित होते हैं, जो शराब का सेवन नहीं करते। इसे नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज के तौर पर जाना जाता है।
शुरुआत में पता लगाना क्यों जरूरी है?
फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में अक्सर इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, जबकि लिवर में धीरे-धीरे अतिरिक्त फैट जमा हो रहा होता है।
समय के साथ यह स्थिति बढ़ने पर लिवर में सूजन और नुकसान हो सकते हैं। कुछ मामलों में आगे चलकर फाइब्रोसिस, सिरोसिस और अन्य गंभीर लिवर संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए सिर्फ लक्षणों का इंतजार करने के बजाय डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और नियमित स्वास्थ्य निगरानी उपयोगी हो सकती है।
कौन से टेस्ट लिवर की स्थिति समझने में मदद कर सकते हैं?
लिवर से जुड़ी परेशानी का पता लगाने के लिए डॉक्टर लक्षणों और स्वास्थ्य इतिहास के आधार पर अलग-अलग जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। कुछ सामान्य जांच इस प्रकार हैं।
1. LFT यानी लिवर फंक्शन टेस्ट
लिवर फंक्शन टेस्ट में खून के जरिए लिवर से जुड़े कई एंजाइम और अन्य मार्कर्स की जांच की जाती है। इसके परिणाम डॉक्टर को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि लिवर सामान्य तरीके से काम कर रहा है या नहीं।
अगर लगातार थकान, आंखों या त्वचा में पीलापन, पेट में परेशानी, भूख कम लगना या पेशाब का रंग असामान्य रूप से गहरा होने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर LFT की सलाह दे सकते हैं।
इसकी कीमत लैब और टेस्ट पैकेज के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर यह लगभग 500 से 1,500 रुपये के बीच हो सकती है।
2. CBC यानी कंप्लीट ब्लड काउंट
CBC मुख्य रूप से शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स जैसी चीजों की स्थिति बताता है। यह सीधे तौर पर फैटी लिवर की जांच नहीं है, लेकिन लिवर की कुछ उन्नत समस्याओं में रक्त की तस्वीर समझने में डॉक्टरों को मदद मिल सकती है।
यह एक सामान्य और व्यापक रूप से उपलब्ध ब्लड टेस्ट है। इसकी कीमत करीब 250 से 1,000 रुपये तक हो सकती है।
3. हेपेटाइटिस B और C की जांच
लिवर की बीमारी का एक कारण वायरल हेपेटाइटिस भी हो सकता है। इसलिए कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर हेपेटाइटिस B और C की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।
पीलिया, कमजोरी, भूख में कमी, पेट में सूजन या संक्रमण का संभावित जोखिम होने पर यह जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। असुरक्षित यौन संबंध या संक्रमित रक्त के संपर्क जैसी परिस्थितियों में भी डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराई जा सकती है।
टेस्ट का खर्च जांच के प्रकार और लैब के अनुसार बदल सकता है और सामान्यतः 500 से 1,500 रुपये के आसपास हो सकता है।
4. पेट का अल्ट्रासाउंड
अल्ट्रासाउंड एक इमेजिंग जांच है, जिसके जरिए पेट के अंदर मौजूद अंगों की संरचना को देखा जाता है। फैटी लिवर का संदेह होने पर डॉक्टर पेट के अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं।
इससे लिवर में फैट जमा होने के संकेतों के साथ-साथ अन्य संरचनात्मक बदलावों का आकलन करने में मदद मिल सकती है। अलग-अलग शहरों और अस्पतालों में इसकी कीमत अलग होती है और यह लगभग 800 से 2,500 रुपये तक हो सकती है।
5. बायोकेमिकल जांच
अगर LFT में कुछ असामान्य परिणाम आते हैं या डॉक्टर को लिवर की बीमारी का संदेह होता है, तो अतिरिक्त बायोकेमिकल टेस्ट कराए जा सकते हैं। इन जांचों का चयन व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किया जाता है।
इसलिए हर व्यक्ति के लिए एक जैसा टेस्ट पैकेज जरूरी नहीं होता। डॉक्टर उम्र, वजन, लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री और पहले से मौजूद बीमारियों को ध्यान में रखकर जांच तय कर सकते हैं।
रोज की ये आदतें बढ़ा सकती हैं लिवर पर दबाव
लिवर को नुकसान हमेशा किसी एक वजह से नहीं होता। कई बार लंबे समय तक जारी रहने वाली छोटी-छोटी आदतें मिलकर समस्या का कारण बनती हैं।
ज्यादा चीनी और मीठे खाद्य पदार्थ
डाइट में लगातार ज्यादा शुगर और कैलोरी लेना शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा जमा होने से जुड़ा हो सकता है। इससे वजन बढ़ने और लिवर में फैट जमा होने का जोखिम बढ़ सकता है। खासकर मीठे पेय पदार्थों और ज्यादा शुगर वाले प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित रखना बेहतर है।
शारीरिक गतिविधि की कमी
लगातार बैठकर रहना और व्यायाम न करना वजन बढ़ने तथा मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ को नियंत्रित रखने में मदद करती है, जिससे फैटी लिवर के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड
बार-बार तला हुआ, ज्यादा कैलोरी वाला और अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन लेने से शरीर में अतिरिक्त कैलोरी पहुंच सकती है। लंबे समय तक ऐसा खानपान वजन और लिवर की सेहत दोनों पर असर डाल सकता है।
शराब का सेवन
अत्यधिक शराब का सेवन लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है। लंबे समय तक ज्यादा शराब लेने से फैटी लिवर से लेकर सूजन, फाइब्रोसिस और सिरोसिस जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
धूम्रपान
सिगरेट का धुआं शरीर में कई हानिकारक रसायन पहुंचाता है। धूम्रपान को लिवर की खराब सेहत सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। इसलिए लिवर ही नहीं, पूरे शरीर की सेहत के लिए इससे दूरी रखना जरूरी है।
बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेना
कुछ दवाएं और हर्बल या सप्लीमेंट उत्पाद लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं, खासकर जब उनका गलत तरीके से या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए। इसलिए पेनकिलर, एंटीबायोटिक या किसी अन्य दवा को लंबे समय तक खुद से लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।
नींद पूरी न करना
लगातार खराब नींद शरीर के मेटाबॉलिज्म और वजन नियंत्रण को प्रभावित कर सकती है। अप्रत्यक्ष रूप से यह फैटी लिवर के जोखिम से भी जुड़ सकती है। इसलिए पर्याप्त और नियमित नींद को स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए।
पानी कम पीना
पर्याप्त पानी पीना शरीर के सामान्य कार्यों के लिए जरूरी है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ कम पानी पीने से लिवर में फैट जमा हो जाता है। फिर भी पर्याप्त हाइड्रेशन शरीर की सामान्य सेहत के लिए महत्वपूर्ण है।
लिवर को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
लिवर की सेहत के लिए किसी एक ‘डिटॉक्स’ ड्रिंक पर निर्भर रहने के बजाय पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सबसे पहले खाने में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और पर्याप्त फाइबर शामिल करें। संतरा, अमरूद, गाजर, पालक और अन्य मौसमी सब्जियां-फल संतुलित डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।
मछली, अखरोट और अलसी जैसे खाद्य पदार्थों से मिलने वाले स्वस्थ फैट भी संतुलित मात्रा में डाइट में शामिल किए जा सकते हैं। वहीं बहुत ज्यादा तला-भुना भोजन, मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी को सीमित करना फायदेमंद हो सकता है।
नींबू पानी पीना सामान्य हाइड्रेशन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे लिवर को ‘डिटॉक्स’ करने वाली दवा समझना सही नहीं है। शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को प्रोसेस करने में लिवर और किडनी पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नियमित एक्सरसाइज भी बेहद जरूरी है। तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैरना या अपनी क्षमता के अनुसार अन्य शारीरिक गतिविधियां वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं।
शरीर किन संकेतों से सावधान करता है?
फैटी लिवर शुरुआती अवस्था में अक्सर बिना लक्षण के रह सकता है। लेकिन बीमारी बढ़ने पर कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं। लगातार थकान, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में असहजता, भूख में बदलाव या कमजोरी जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं।
अगर आंखों या त्वचा में पीलापन, पेट या पैरों में सूजन, पेशाब का रंग बहुत गहरा होना, त्वचा में लगातार खुजली या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
काले रंग का मल या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षणों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनके पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं और कुछ स्थितियों में तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।
सबसे जरूरी बात
लिवर की बीमारी का मतलब हमेशा शराब का सेवन नहीं होता। वजन बढ़ना, डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसे कई कारक फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
इसलिए लिवर को स्वस्थ रखने के लिए केवल पानी, नींबू या किसी ‘डिटॉक्स’ उपाय पर भरोसा करने के बजाय संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, शराब और तंबाकू से दूरी तथा जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच पर ध्यान देना चाहिए।
अगर किसी व्यक्ति में लिवर से जुड़े लक्षण हैं या पहले से फैटी लिवर की समस्या सामने आ चुकी है, तो कौन सी जांच कितनी बार करानी है, यह डॉक्टर से व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर तय करना बेहतर है।




