शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा में शुक्रवार को परिवहन व्यवस्था को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार को उसी के विधायक ने घेरा। धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक चंद्रशेखर ने नियम-62 के तहत अपने क्षेत्र में हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की स्थिति का मुद्दा उठाते हुए बस सेवाओं की बदहाल स्थिति पर सरकार से जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि धर्मपुर क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बस रूट लंबे समय से बंद हैं और यात्रियों को पुरानी तथा खटारा बसों में सफर करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
विधायक चंद्रशेखर ने सदन में कहा कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों के लिए सार्वजनिक परिवहन जीवनरेखा की तरह है, लेकिन बसों की कमी के कारण लोगों को लगातार परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनके अनुसार, धर्मपुर क्षेत्र के कई रूटों पर नियमित बस सेवा उपलब्ध नहीं होने से विद्यार्थियों, कर्मचारियों, बुजुर्गों और आम यात्रियों को सबसे अधिक दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि बंद पड़े रूटों को जल्द बहाल किया जाए और क्षेत्र को नई बसें उपलब्ध कराई जाएं।
कांग्रेस विधायक ने एचआरटीसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बसों की हालत की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग भी सदन में रखी। उन्होंने कहा कि केवल नई बसों की घोषणा करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि निगम के मौजूदा बेड़े की वास्तविक स्थिति क्या है और बसों के रखरखाव तथा रूट संचालन में कहां खामियां रह रही हैं।
इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने भी सरकार को घेरा। उन्होंने प्रदेश में बंद पड़े बस रूटों के साथ-साथ इलेक्ट्रिक बसों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार प्रदेश में इलेक्ट्रिक बसों को पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प के रूप में पेश कर रही है, लेकिन यदि ये बसें यात्रियों को समय पर उनके गंतव्य तक ही नहीं पहुंचा पा रही हैं तो इस व्यवस्था का क्या लाभ है। उन्होंने ई-बसों के संचालन और उनसे जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतों को लेकर सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा।
विपक्ष के सवालों और विधायक की चिंताओं के बीच मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने सरकार की आगामी योजना सदन में रखी। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार एचआरटीसी के बेड़े को आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके तहत करीब 1000 इलेक्ट्रिक बसें खरीदी जाएंगी। इसके अलावा प्रदेश में 200 हाइड्रोजन बसें खरीदने की भी योजना है। सरकार का दावा है कि इससे सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अधिक आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री ने सदन में ई-बसों को लेकर उठाए जा रहे तकनीकी सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रिक बसों में किसी तरह की तकनीकी कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि इन बसों की खरीद के साथ उनके रखरखाव की व्यवस्था को भी ध्यान में रखा गया है और संबंधित कंपनी पर 12 वर्ष तक बसों के रखरखाव की जिम्मेदारी रहेगी। सरकार का मानना है कि इससे निगम पर लंबे समय तक मेंटेनेंस का अतिरिक्त बोझ कम होगा और बसों को बेहतर स्थिति में संचालित किया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री ने इलेक्ट्रिक बसों को आर्थिक रूप से भी फायदे का सौदा बताया। उन्होंने सदन में जानकारी दी कि डीजल बस को चलाने पर ईंधन और रखरखाव सहित करीब 70 रुपये प्रति किलोमीटर का खर्च आता है। इसके मुकाबले ई-बस को संचालित करने में सभी खर्चों को जोड़ने के बाद लगभग 36 रुपये प्रति किलोमीटर लागत आती है। सरकार के अनुसार, संचालन लागत में यह अंतर लंबे समय में एचआरटीसी के लिए महत्वपूर्ण बचत का आधार बन सकता है।
हालांकि, विधायक चंद्रशेखर द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में सदन के सामने परिवहन निगम के विभिन्न डिपो में बसों की कमी की तस्वीर भी सामने आई। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अनुपस्थिति में संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन ने सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट करते हुए सरकाघाट और धर्मपुर डिपो से संबंधित आंकड़े सदन में रखे।
मंत्री ने बताया कि सरकाघाट डिपो में कुल 77 बसों की स्वीकृत क्षमता है, लेकिन फिलहाल वहां 58 बसें ही उपलब्ध हैं। यानी स्वीकृत संख्या के मुकाबले डिपो में बसों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। उपलब्ध बसों में से 13 ऐसी हैं जो जीरो बुक वैल्यू की स्थिति को पार कर चुकी हैं। इसके अलावा नौ बसें नौ वर्ष पुरानी हो चुकी हैं।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत मिली 15 बसें अपनी 10 वर्ष की निर्धारित आयु पूरी कर चुकी हैं। पुरानी बसों की संख्या और नए वाहनों की कमी का असर रूट संचालन पर भी पड़ा है। सरकाघाट डिपो में बसों की कमी के चलते 17 रूट अस्थायी तौर पर बंद पड़े हैं।
धर्मपुर डिपो की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। यहां 56 बसों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले सिर्फ 47 बसें संचालित हो रही हैं। इस डिपो में भी 11 बसें जीरो बुक वैल्यू वाली हो चुकी हैं। बसों की उपलब्धता कम होने के कारण धर्मपुर क्षेत्र में नौ रूट बंद बताए गए हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में परिवहन सेवाओं को लेकर विधायक की चिंता केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि बसों की वास्तविक उपलब्धता और पुराने बेड़े की समस्या से जुड़ी हुई है। एक ओर जहां सरकार इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन बसों के माध्यम से परिवहन व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान में यात्रियों को नियमित सेवाएं उपलब्ध कराने की चुनौती बनी हुई है।
सरकार ने हालांकि आने वाले समय में इस समस्या से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक बसों को महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर सामने रखा है। सरकाघाट और धर्मपुर दोनों डिपो में ई-बसों के संचालन के लिए चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने का काम चल रहा है। सरकार के अनुसार, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने के बाद संबंधित डिपो को इलेक्ट्रिक बसें उपलब्ध कराई जाएंगी।
सदन में दी गई जानकारी के मुताबिक, चार्जिंग स्टेशन के लिए आवश्यक विद्युत ढांचे को तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। इसके लिए विद्युत विभाग को 62 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा करवाई जा चुकी है। चार्जिंग स्टेशन तैयार होने के बाद ई-बसों के संचालन का रास्ता साफ होगा।
विधानसभा में हुई इस चर्चा ने हिमाचल की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के सामने मौजूद दोहरी चुनौती को उजागर किया। एक तरफ निगम के कई डिपो में पुरानी बसों और वाहनों की कमी के कारण रूट बंद हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार भविष्य के लिए इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन बसों के बड़े बेड़े की योजना बना रही है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह रहेगी कि नई परिवहन व्यवस्था तैयार होने तक मौजूदा रूटों पर यात्रियों को पर्याप्त और भरोसेमंद बस सेवा कैसे उपलब्ध कराई जाए।
धर्मपुर विधायक द्वारा सदन में उठाया गया मुद्दा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वह सत्तारूढ़ दल से हैं। आमतौर पर विपक्ष की ओर से सरकार की परिवहन व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन इस बार सरकार के अपने विधायक ने क्षेत्र की समस्याओं को सदन के सामने रखा। इससे यह संकेत भी मिलता है कि ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन की कमी अभी भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
यात्रियों के लिए सबसे बड़ी चिंता बंद पड़े रूटों की बहाली और पुरानी बसों को हटाकर नई बसें उपलब्ध कराने की है। यदि सरकार की प्रस्तावित 1000 इलेक्ट्रिक और 200 हाइड्रोजन बसों की योजना निर्धारित समय में लागू होती है तो एचआरटीसी के बेड़े में बड़ा बदलाव संभव है। इससे न केवल पुराने वाहनों पर निर्भरता घट सकती है, बल्कि संचालन लागत और प्रदूषण में भी कमी आने की उम्मीद है।
फिलहाल सरकार की प्राथमिकता चार्जिंग स्टेशनों को तैयार करना और नई ई-बसों को चरणबद्ध तरीके से विभिन्न डिपो में उतारना है। वहीं, विधानसभा में उठे सवालों के बाद धर्मपुर और सरकाघाट क्षेत्र के यात्रियों की नजर इस बात पर रहेगी कि बंद रूट कब बहाल होते हैं और पुरानी बसों की जगह नई बसें कब उपलब्ध कराई जाती हैं। आने वाले समय में एचआरटीसी के बेड़े के आधुनिकीकरण के साथ यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई परिवहन व्यवस्था पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों के यात्रियों की रोजमर्रा की जरूरतों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर पाती है।




