मोदी के ‘नाराज फूफा’ तंज पर कांग्रेस का पलटवार, खरगे बोले- हर साल विपक्ष को नया विशेषण

मोदी के ‘नाराज फूफा’ तंज पर कांग्रेस का पलटवार, खरगे बोले- हर साल विपक्ष को नया विशेषण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में दिए गए भाषण के बाद एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन लोगों पर निशाना साधा, जो सरकार या देश में शुरू किए जा रहे किसी काम का लगातार विरोध करते हैं। उनके इस बयान पर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि जिस प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में युवाओं, शिक्षा, रोजगार और देश के भविष्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होनी चाहिए थी, वहां राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को प्राथमिकता दी गई। खरगे ने कहा कि विपक्ष को निशाना बनाने के लिए सरकार की ओर से लगातार नए-नए विशेषण इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SRCC के शताब्दी समारोह में शामिल हुए थे। अपने लगभग 50 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने देश की प्रगति, युवाओं और समाज की भूमिका के साथ-साथ उन लोगों पर भी टिप्पणी की, जिन्हें वह विकास के हर प्रयास में बाधा डालने वाला मानते हैं।

प्रधानमंत्री ने फिर उठाया ‘दिमागी नक्सल’ का मुद्दा

SRCC के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पुराने बयान का जिक्र करते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द दोहराया। उन्होंने कहा कि उन्होंने जब इस कथित प्रवृत्ति के खिलाफ ‘होम्योपैथी की गोली’ देने की बात कही, तो इसके बाद ऐसे लोगों के चेहरे सामने आने लगे। प्रधानमंत्री का कहना था कि अब जनता भी यह पहचानने लगी है कि कौन लोग ऐसी मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं।

मोदी ने अपने भाषण में सीधे तौर पर किसी एक राजनीतिक दल का नाम लेने के बजाय ऐसे लोगों की बात की, जो देश में होने वाले बदलाव या सरकार के प्रयासों का विरोध करते हैं। उनका तर्क था कि समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सकारात्मक काम को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं, जबकि कुछ लोग हर पहल में कमियां निकालकर उसका विरोध करने लगते हैं।

प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में ‘नाराज फूफा’ का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो किसी भी काम की शुरुआत होते ही विरोध करने के लिए खड़े हो जाते हैं। मोदी के इस तंज को विपक्ष ने अपने ऊपर किया गया राजनीतिक हमला बताया है।

खरगे ने पूछा- युवाओं के मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं हुई?

प्रधानमंत्री के भाषण के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि SRCC जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधानमंत्री के सामने देश के युवाओं से सीधे संवाद करने का बड़ा अवसर था।

खरगे के मुताबिक, इस मंच पर विद्यार्थियों की शिक्षा, रोजगार के अवसर, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, युवाओं का भविष्य और देश की आर्थिक दिशा जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन उनके अनुसार प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर राजनीतिक हमला करने को ज्यादा महत्व दिया।

कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के युवा अपने भविष्य को लेकर कई सवालों के जवाब चाहते हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री छात्रों से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर बात करेंगे। खरगे का आरोप है कि इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक अवसर को राजनीतिक बयानबाजी के लिए इस्तेमाल किया गया।

‘विपक्ष के लिए हर साल बदल जाता है विशेषण’

मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री की राजनीतिक भाषा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष पर हमला करने के लिए अलग-अलग समय पर नए शब्दों का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

खरगे ने ‘नाराज फूफा’ और ‘दिमागी नक्सल’ के साथ-साथ ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘पैरासाइट’ जैसे शब्दों का उल्लेख किया। कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया कि सरकार की ओर से विपक्ष और असहमति जताने वाले लोगों को अलग-अलग नामों से संबोधित किया जाता है।

उनका कहना था कि शब्द और विशेषण बदलते रहते हैं, लेकिन जिन नीतियों को कांग्रेस जनविरोधी मानती है, उनमें बदलाव नहीं आया है। खरगे ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सरकार से सवाल करना लोकतंत्र का हिस्सा है।

कांग्रेस अध्यक्ष की प्रतिक्रिया का मुख्य केंद्र यही रहा कि राजनीतिक असहमति को अलग-अलग लेबल देकर खारिज करने के बजाय सरकार को सवालों का जवाब देना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने समाज को दो तरह की सोच में बांटकर समझाया

SRCC में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने समाज की मानसिकता को लेकर भी एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग देश की सामूहिक क्षमता को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग सकारात्मक सोच के साथ किसी काम को आगे बढ़ाने में सहयोग करते हैं।

इसके विपरीत प्रधानमंत्री ने उस वर्ग का भी जिक्र किया जो किसी भी नए काम की शुरुआत होते ही उसमें समस्या तलाशने लगता है। इसी मानसिकता को समझाने के लिए उन्होंने ‘नाराज फूफा’ का उदाहरण दिया।

मोदी का कहना था कि देश में जब भी कोई बड़ा काम शुरू होता है, कुछ लोग उसके समर्थन के बजाय तत्काल विरोध करने लगते हैं। उनके इस बयान को विपक्ष ने राजनीतिक कटाक्ष माना और कहा कि प्रधानमंत्री असहमति रखने वालों को एक ही नजर से देख रहे हैं।

विपक्ष का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना या उनकी आलोचना करना किसी नकारात्मक मानसिकता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

मनोज झा ने भी प्रधानमंत्री के भाषण पर उठाए सवाल

आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने भी SRCC में प्रधानमंत्री के संबोधन को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान की अपनी एक ऐतिहासिक और शैक्षणिक परंपरा रही है।

मनोज झा के मुताबिक, वह खुद दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र और शिक्षक दोनों रहे हैं। इसलिए वह इस परिसर और वहां की शैक्षणिक संस्कृति से परिचित हैं। उन्होंने कहा कि SRCC के शताब्दी जैसे अवसर को छात्रों और शिक्षकों से जुड़ी वास्तविक समस्याओं पर बातचीत के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की उपलब्धता और शैक्षणिक संसाधनों से जुड़े कई सवाल हैं। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री को इन विषयों पर विद्यार्थियों और शिक्षकों की बात सुननी चाहिए थी।

झा ने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए वह अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि इस तरह के शैक्षणिक मंच पर राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी छात्रों से संवाद करना था।

‘सरकार से सवाल पूछना कभी अपराध नहीं था’

मनोज झा ने अपने बयान में राजनीतिक माहौल में आए बदलाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहले सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाता था।

उनका आरोप है कि अब सरकार के विकास के दावों या ‘ग्रोथ स्टोरी’ पर सवाल करने वालों को अलग-अलग नामों से निशाना बनाया जाता है। उन्होंने ‘एंटी-नेशनल’, ‘नाराज फूफा’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का जिक्र करते हुए कहा कि असहमति जताने वालों को इस तरह के लेबल देना उचित नहीं है।

झा का कहना था कि विश्वविद्यालय ऐसे स्थान होने चाहिए जहां विद्यार्थी बिना डर के सवाल पूछ सकें और सरकार की नीतियों पर चर्चा कर सकें। उनके अनुसार, आलोचना को दबाने के बजाय उसका जवाब तथ्यों और तर्कों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की समस्याओं का भी उठाया मुद्दा

आरजेडी सांसद ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े कुछ बुनियादी मुद्दों की ओर भी ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के सामने इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी से संबंधित चुनौतियां मौजूद हैं।

उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री के विश्वविद्यालय दौरे के दौरान इन विषयों पर बात होने से छात्रों और शिक्षकों को यह संदेश जाता कि उनकी समस्याएं सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।

झा ने यह भी कहा कि देश के बड़े शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के सामने सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध के अवसर, संसाधन और भविष्य की सुरक्षा जैसे कई विषय हैं।

बयानबाजी से बढ़ा सियासी तापमान

प्रधानमंत्री मोदी के SRCC भाषण के बाद कांग्रेस और आरजेडी की प्रतिक्रियाओं ने एक बार फिर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी को तेज कर दिया है। प्रधानमंत्री जहां ऐसे लोगों पर निशाना साध रहे हैं जो हर नए काम का विरोध करते हैं, वहीं विपक्ष इसे असहमति की आवाज को राजनीतिक नाम देने की कोशिश के रूप में देख रहा है।

इस पूरे विवाद में ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ जैसे शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। कांग्रेस का कहना है कि देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक कटाक्ष के बजाय युवाओं के वास्तविक सवालों पर संवाद होना चाहिए।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री के भाषण का केंद्रीय संदेश यह रहा कि देश की प्रगति में सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों और हर पहल का विरोध करने वाली मानसिकता के बीच अंतर समझना जरूरी है।

फिलहाल SRCC के कार्यक्रम से शुरू हुआ यह विवाद केवल एक भाषण तक सीमित नहीं रहा है। इसके जरिए एक बार फिर यह बहस सामने आ गई है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, राजनीतिक असहमति और विकास के प्रयासों पर सवाल उठाने की सीमा क्या होनी चाहिए। विपक्ष जहां इसे लोकतांत्रिक अधिकार मानता है, वहीं सरकार समर्थक पक्ष लगातार यह तर्क देता रहा है कि देशहित में होने वाले कार्यों का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं होना चाहिए।