सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन से जुड़े मामलों में बड़ा आदेश देते हुए देशभर में दर्ज सभी FIR रद्द करने का निर्देश दिया है। कोर्ट का यह आदेश सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज उन मामलों पर लागू होगा, जो इस आंदोलन के दौरान हुए विरोध-प्रदर्शनों और झड़पों से जुड़े हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड मौजूद है, उनके मामलों पर इस आदेश का असर नहीं पड़ेगा और उन पर कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद CJP ने भी अपना अगला बड़ा कार्यक्रम वापस लेने का ऐलान किया है। संगठन ने 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च को रद्द कर दिया है। संगठन की ओर से कहा गया कि अदालत के आदेश और सरकार के साथ बने समझौते को देखते हुए अब आंदोलन को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है।
5 सितंबर का मार्च क्यों लिया गया वापस?
CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने सुप्रीम कोर्ट में संगठन की ओर से बयान देते हुए कहा कि सरकार के भरोसे और अदालत की निगरानी में हुए घटनाक्रम को देखते हुए संगठन ने 5 सितंबर को होने वाला मार्च वापस लेने का निर्णय लिया है।
उन्होंने कोर्ट में कहा कि सरकार के भरोसे पर अदालत की मुहर लगने और आदेश जारी होने के बाद संगठन अपने प्रस्तावित मार्च को वापस ले रहा है। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संगठन के इस कदम की सराहना की। उन्होंने कहा कि एक संस्था के तौर पर कोर्ट इस बात से संतुष्ट है कि ऐसा सकारात्मक माहौल तैयार हुआ है, जो युवाओं के लिए मददगार साबित हो सकता है।
इस घटनाक्रम के बाद CJP ने इसे अपने आंदोलन और छात्रों के लिए बड़ी उपलब्धि बताया। संगठन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमों को समाप्त करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अब इस दिशा में महत्वपूर्ण राहत मिली है।
अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्ति का इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने FIR खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। यह प्रावधान अदालत को किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने की शक्ति देता है।
हालांकि, अदालत ने अपने आदेश को लेकर एक महत्वपूर्ण बात भी स्पष्ट की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में FIR रद्द करने का फैसला यहां मौजूद विशेष परिस्थितियों और मामले के खास तथ्यों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। इसलिए इस आदेश को भविष्य के दूसरे मामलों में सामान्य मिसाल या बाध्यकारी फैसला नहीं माना जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी विशेष संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल कुछ शर्तों के साथ किया जा रहा है। दोनों पक्षों को अदालत के सामने हुए समझौते और तय शर्तों का पूरी तरह पालन करना होगा। यानी FIR खत्म होने के साथ-साथ आंदोलन से जुड़े पक्षों की ओर से अदालत के सामने किए गए वादों की भी अहम भूमिका रहेगी।
दिल्ली पुलिस की अर्जी के बाद आया आदेश
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार के आदेश से पहले दिल्ली पुलिस की ओर से एक अंतरिम आवेदन दाखिल किया गया था। यह आवेदन सोमवार को अदालत के सामने रखा गया था। पुलिस ने अदालत को बताया था कि वह CJP के आंदोलन से संबंधित 13 FIR को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
दरअसल, 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने इन मामलों को समाप्त करने की इच्छा जताई थी। इसी उद्देश्य से अंतरिम आवेदन के जरिए अदालत से आवश्यक आदेश मांगा गया।
अंतरिम आवेदन किसी चल रही न्यायिक कार्यवाही के दौरान किसी विशेष मुद्दे पर तत्काल आदेश या राहत मांगने के लिए दाखिल किया जाता है। इस मामले में पुलिस का रुख यह था कि आंदोलन से जुड़े मामलों में आगे जांच या कार्रवाई जारी रखने के बजाय FIR को समाप्त करने की अनुमति दी जाए।
मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने इस पहल को व्यापक रूप देते हुए देशभर में आंदोलन से जुड़े मामलों पर अपना आदेश लागू किया।
किन लोगों को राहत नहीं मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लाभ आंदोलन से जुड़े सभी लोगों को बिना शर्त नहीं मिलेगा। अदालत ने साफ कर दिया है कि जिन प्रदर्शनकारियों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड है, उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही इस आदेश से खत्म नहीं होगी।
इसका मतलब है कि केवल आंदोलन में शामिल होने या उससे जुड़े मामलों में दर्ज FIR के आधार पर राहत पाने वाले लोगों को फायदा होगा, जबकि किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से कोई स्वतंत्र आपराधिक मामला या रिकॉर्ड है तो वह अपनी जगह जारी रह सकता है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत का आदेश आंदोलन से जुड़े विवादों को समाप्त करने के लिए है, न कि किसी व्यक्ति के पुराने आपराधिक मामलों को खत्म करने के लिए।
CJP ने फैसले को बताया छात्रों की जीत
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद CJP ने इसे छात्रों के लिए बड़ी जीत बताया। संगठन के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि अगस्त की शुरुआत में सरकार के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत रुक गई थी। संगठन को आशंका हुई कि सरकार अपने वादे से पीछे हट सकती है। इसके बाद CJP ने 5 सितंबर को मार्च निकालने का फैसला किया था।
दास के मुताबिक, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान स्थिति बदल गई। अदालत ने देशभर में आंदोलन से जुड़ी FIR खत्म करने का आदेश दिया। संगठन ने इसे ऐतिहासिक घटनाक्रम बताते हुए कहा कि छात्रों के खिलाफ चल रहे कथित अन्यायपूर्ण मुकदमों को समाप्त करने की दिशा में यह बड़ा कदम है।
CJP ने अपने बयान में कहा कि उसकी मांगों को सुना गया है और अब आंदोलन में शामिल छात्रों को इस तरह की कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। संगठन ने फैसले को छात्रों की जीत बताते हुए ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई थी?
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और NEET पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ था। संगठन ने 20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू किया था।
शुरुआत में प्रदर्शन का केंद्र जंतर-मंतर ही था, लेकिन धीरे-धीरे इसे दूसरे छात्रों और विभिन्न संगठनों का समर्थन मिलने लगा। आंदोलन के दौरान कई लोग इसमें शामिल हुए और सरकार से परीक्षाओं की व्यवस्था तथा कथित गड़बड़ियों को लेकर जवाब मांगते रहे।
28 जून को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन से जुड़े और उन्होंने अनशन शुरू किया। इसके बाद प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा बढ़ गई।
आंदोलन का दायरा बढ़ने के साथ सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत के कई दौर भी हुए। हालांकि, कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी।
20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च से बढ़ा तनाव
20 जुलाई को CJP ने जंतर-मंतर से संसद की ओर ‘चलो संसद’ मार्च निकालने की घोषणा की। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मार्च में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर बढ़ने के दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया और आंसू गैस का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। रिपोर्टों के मुताबिक, 150 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे।
20 से 25 जुलाई के बीच हुए घटनाक्रम के बाद दिल्ली के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी विरोध-प्रदर्शन हुए। अलग-अलग स्थानों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कीं। यही FIR बाद में आंदोलन और सरकार के बीच विवाद का बड़ा मुद्दा बन गईं।
36 दिन बाद खत्म हुआ था आंदोलन
कई सप्ताह तक चले विरोध और सरकार के साथ बातचीत के बाद CJP ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया था। संगठन के मुताबिक, उसका आंदोलन कुल 36 दिन तक चला।
इसी अवधि में सरकार के स्तर पर भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। 25 जुलाई को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद CJP ने अपना आंदोलन समाप्त करने का फैसला किया।
हालांकि, आंदोलन समाप्त होने के बाद भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR का मुद्दा बना रहा। संगठन लगातार इन मामलों को खत्म करने की मांग करता रहा। इसी बीच 5 सितंबर को फिर से मार्च निकालने की घोषणा की गई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उस प्रस्तावित मार्च को वापस ले लिया गया है।
सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच समझौते पर कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल FIR खत्म करने तक सीमित नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों के बीच बने समझौते के पालन को भी महत्वपूर्ण माना है। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत उसकी विशेष शक्ति का इस्तेमाल इसी आधार पर किया जा रहा है कि दोनों पक्ष अदालत के सामने रखी गई शर्तों का पालन करेंगे।
इस तरह अदालत ने एक तरफ आंदोलन से जुड़े मामलों में प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ दोनों पक्षों को अपने-अपने वादों पर कायम रहने की जिम्मेदारी भी दी है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद CJP ने 5 सितंबर का मार्च वापस ले लिया है। आंदोलन से जुड़े FIR विवाद पर भी बड़ा कानूनी अध्याय समाप्त होता नजर आ रहा है। हालांकि, जिन लोगों के खिलाफ अलग से आपराधिक रिकॉर्ड या मामले हैं, उनके मामलों पर यह आदेश लागू नहीं होगा।




