एयर इंडिया की कमान आज नए हाथों में, फिर CEO की कुर्सी पर क्यों है असमंजस?

एयर इंडिया की कमान आज नए हाथों में, फिर CEO की कुर्सी पर क्यों है असमंजस?

टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया में सोमवार को नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इथियोपियन एयरलाइंस को लंबे समय तक नेतृत्व देने वाले टेवोल्डे गेब्रेमरियम अब एयर इंडिया के संचालन की जिम्मेदारी संभालेंगे। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि एयरलाइन में उनकी औपचारिक एंट्री तो आज हो जाएगी, लेकिन फिलहाल उनकी सीट पर ‘CEO’ का बोर्ड नहीं लगा होगा। इसके पीछे उनकी सुरक्षा मंजूरी से जुड़ा एक अहम मामला है।

गेब्रेमरियम एयर इंडिया के पूर्व चीफ एग्जीक्यूटिव कैंपबेल विल्सन की जगह लेने जा रहे हैं। एयरलाइन के लिए उनका आगमन ऐसे समय में हो रहा है जब कंपनी को अपनी परिचालन व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और वित्तीय स्थिति को मजबूत करने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एयर इंडिया का वित्त वर्ष 2025-26 में घाटा बढ़कर करीब 22,238 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। ऐसे में नए नेतृत्व से कंपनी के प्रदर्शन में सुधार की काफी उम्मीदें लगाई जा रही हैं।

आज से शुरू होगा नए नेतृत्व का दौर

सूत्रों के मुताबिक, एयर इंडिया के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन सोमवार को कर्मचारियों के लिए आयोजित टाउन हॉल कार्यक्रम में टेवोल्डे गेब्रेमरियम का औपचारिक परिचय करा सकते हैं। इसके बाद वह एयरलाइन के कामकाज में सक्रिय रूप से शामिल होना शुरू कर देंगे।

हालांकि, उनकी नियुक्ति का एक तकनीकी पहलू अभी पूरा नहीं हुआ है। गेब्रेमरियम को फिलहाल आधिकारिक तौर पर एयर इंडिया का CEO या ‘Accountable Manager’ घोषित नहीं किया जाएगा। इसकी मुख्य वजह उनकी सिक्योरिटी क्लीयरेंस का लंबित होना बताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार, उनकी सुरक्षा मंजूरी इसी महीने के अंत तक मिलने की उम्मीद है। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक उनके पद की औपचारिक स्थिति कुछ अलग रहेगी। यानी व्यावहारिक रूप से वह कंपनी के कामकाज में शामिल होंगे, लेकिन नियामकीय तौर पर CEO और अकाउंटेबल मैनेजर की पूरी जिम्मेदारी तुरंत उनके नाम नहीं होगी।

यही वजह है कि एयर इंडिया के नए बॉस के पदभार संभालने के बावजूद कंपनी की शीर्ष कुर्सी को लेकर यह तकनीकी पेंच सामने आया है।

आखिर एयर इंडिया के सामने इतनी बड़ी चुनौती क्यों?

गेब्रेमरियम को एयर इंडिया ऐसे समय में मिली है जब एयरलाइन अपने बदलाव के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। टाटा समूह ने एयरलाइन को दोबारा खड़ा करने और इसे वैश्विक स्तर की विमानन कंपनी बनाने के लिए बड़े स्तर पर निवेश और पुनर्गठन की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद वित्तीय मोर्चे पर अभी दबाव बना हुआ है।

एयर इंडिया का FY26 घाटा 22,238 करोड़ रुपये तक पहुंचना कंपनी के सामने मौजूद आर्थिक चुनौती को दर्शाता है। एयरलाइन को एक तरफ अपने पुराने ढांचे को बदलना है, वहीं दूसरी ओर तेजी से बढ़ते बेड़े को संभालने के लिए तकनीकी और परिचालन क्षमता भी विकसित करनी है।

सूत्रों के अनुसार, एयर इंडिया ने अपने मालिकों टाटा संस और सिंगापुर एयरलाइंस से लगभग 10,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त इक्विटी की मांग भी की है। इससे साफ है कि कंपनी को विस्तार के साथ-साथ अपनी वित्तीय स्थिति को संभालने के लिए भी बड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।

ऐसे माहौल में नए प्रमुख के सामने सिर्फ विमानों की संख्या बढ़ाने या नेटवर्क का विस्तार करने की जिम्मेदारी नहीं होगी। उन्हें एयरलाइन के खर्च, नकदी प्रवाह और भविष्य के मुनाफे के बीच संतुलन बनाना होगा।

सुरक्षा और ऑपरेशन पर रहेगा सबसे ज्यादा जोर

टेवोल्डे गेब्रेमरियम का सबसे बड़ा अनुभव एयरलाइन के ऑपरेशनल और इंजीनियरिंग क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इथियोपियन एयरलाइंस में उन्होंने लंबे समय तक काम किया और वहां एयरलाइन की परिचालन क्षमताओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही अनुभव एयर इंडिया के लिए भी अहम माना जा रहा है। एयर इंडिया आने वाले समय में अपने फ्लीट का बड़े पैमाने पर विस्तार करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में विमानों की संख्या बढ़ने के साथ मेंटेनेंस, इंजीनियरिंग, सुरक्षा और तकनीकी संचालन की व्यवस्था को भी उसी गति से मजबूत करना जरूरी होगा।

जानकारों के मुताबिक, गेब्रेमरियम का अनुभव एयर इंडिया के टेक्निकल संगठन को व्यवस्थित करने और मेंटेनेंस सिस्टम में सुधार लाने में उपयोगी हो सकता है। एयरलाइन को सिर्फ नए विमान हासिल करने पर ध्यान नहीं देना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि इतने बड़े बेड़े का संचालन सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से हो।

हाल के समय में एयर इंडिया के सामने सुरक्षा और ऑपरेशनल भरोसे को लेकर सवाल उठे हैं। ऐसे में नए नेतृत्व के सामने यात्रियों का भरोसा दोबारा मजबूत करना भी महत्वपूर्ण लक्ष्य होगा।

शुरुआती दौर में अकेले नहीं होंगे गेब्रेमरियम

जानकारी के मुताबिक, एयर इंडिया के नए प्रमुख को शुरुआत में कंपनी के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व का सहयोग मिलेगा। चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और एयर इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर प्रदीप सिंह खरोला शुरुआती महीनों में उनके साथ मिलकर काम कर सकते हैं।

प्रदीप सिंह खरोला पिछले महीने टाटा एयरलाइन से जुड़े थे और गेब्रेमरियम के साथ काम करते हुए उन्हें कंपनी के मौजूदा ढांचे और प्रक्रियाओं को समझने में मदद कर रहे हैं।

इस व्यवस्था का मकसद संभवतः नए प्रमुख को एयर इंडिया के मौजूदा सिस्टम, टीम और चुनौतियों को तेजी से समझने का मौका देना है। एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइन में नेतृत्व संभालना केवल रणनीति तय करने तक सीमित नहीं होता। इसके लिए अलग-अलग विभागों, तकनीकी टीमों, पायलटों, इंजीनियरिंग, ग्राउंड ऑपरेशन और वित्तीय प्रबंधन के बीच तालमेल जरूरी होता है।

इसलिए शुरुआती समय में गेब्रेमरियम को मौजूदा नेतृत्व के साथ काम करने से कंपनी के कामकाज को समझने और प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिल सकती है।

क्या एयर इंडिया की टीम में भी होगा बदलाव?

नए नेतृत्व के साथ संगठन के अंदर बदलाव की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, गेब्रेमरियम को जरूरत के हिसाब से टीम में बदलाव करने और काम करने के मौजूदा तरीकों को पुनर्गठित करने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी जा सकती है।

इसका मतलब यह है कि आने वाले महीनों में एयर इंडिया के कुछ विभागों और वरिष्ठ पदों पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं। नए प्रमुख अपनी टीम के प्रदर्शन का आकलन करने के बाद जिम्मेदारियों में फेरबदल कर सकते हैं।

एयरलाइन के कुछ कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी है कि नए CEO अपनी पसंद के अधिकारियों और विशेषज्ञों को टीम में शामिल कर सकते हैं। इससे कुछ मौजूदा वरिष्ठ अधिकारियों के कंपनी से बाहर जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कितने स्तर पर और किस तरह के संगठनात्मक बदलाव किए जाएंगे। फिलहाल प्राथमिकता एयरलाइन की मौजूदा व्यवस्था को समझने और उसके बाद सुधार की दिशा तय करने की होगी।

सिर्फ ग्रोथ नहीं, मुनाफे पर भी होगी नजर

एयर इंडिया पिछले कुछ समय से अपने विस्तार पर काफी जोर दे रही है। नए विमानों की योजना, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को मजबूत करने और बड़े फ्लीट के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की रणनीति कंपनी के भविष्य का हिस्सा है।

लेकिन गेब्रेमरियम के सामने चुनौती यह होगी कि विस्तार की रफ्तार और वित्तीय अनुशासन दोनों साथ-साथ चलें। सूत्रों के मुताबिक, नए प्रमुख से कैश फ्लो, लागत और मुनाफे पर कड़ी निगरानी रखने की उम्मीद की जा रही है।

एयरलाइन के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तेजी से विस्तार करने में भारी पूंजी की जरूरत होती है। विमान खरीदने से लेकर उनके रखरखाव, कर्मचारियों, ईंधन, एयरपोर्ट शुल्क और दूसरे ऑपरेशनल खर्चों तक कई मोर्चों पर बड़ी रकम खर्च होती है।

इसलिए नए नेतृत्व को यह तय करना होगा कि किन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना है और किन जगहों पर खर्च को नियंत्रित किया जा सकता है।

नेतृत्व की नई सोच से क्या बदलेगा?

गेब्रेमरियम के सामने एयर इंडिया को सिर्फ एक बड़ी एयरलाइन बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि ऐसी कंपनी तैयार करने की भी जिम्मेदारी है जो लंबे समय तक टिकाऊ तरीके से मुनाफा कमा सके।

इसके लिए कंपनी के भीतर जवाबदेही बढ़ाना, प्रदर्शन आधारित संस्कृति को मजबूत करना और नेतृत्व की अगली पीढ़ी तैयार करना भी जरूरी होगा। सूत्रों के अनुसार, गेब्रेमरियम से सभी विभागों में बेहतर प्रदर्शन और अधिक जवाबदेही वाला माहौल बनाने की उम्मीद है।

इसके अलावा नेतृत्व की पाइपलाइन को मजबूत करना भी उनके एजेंडे का हिस्सा बताया जा रहा है। इसका मतलब है कि एयर इंडिया को भविष्य के लिए ऐसे अधिकारियों और प्रबंधकों की टीम तैयार करनी होगी जो कंपनी के विस्तार और बदलती जरूरतों के साथ जिम्मेदारियां संभाल सकें।

कुल मिलाकर, टेवोल्डे गेब्रेमरियम का एयर इंडिया में आगमन केवल CEO बदलने की प्रक्रिया नहीं है। यह उस समय हो रहा है जब एयरलाइन अपने इतिहास के एक बड़े परिवर्तन से गुजर रही है। एक तरफ कंपनी अपने फ्लीट और नेटवर्क को बढ़ाने की तैयारी में है, तो दूसरी तरफ उसे घाटे, लागत, सुरक्षा और परिचालन से जुड़े सवालों का समाधान भी करना है।

आज से गेब्रेमरियम एयर इंडिया के कामकाज में सक्रिय भूमिका शुरू करेंगे, लेकिन उनकी औपचारिक CEO वाली स्थिति सिक्योरिटी क्लीयरेंस पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। माना जा रहा है कि आने वाले कुछ महीने एयर इंडिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन्हीं के दौरान नए प्रमुख अपनी रणनीति, टीम और प्राथमिकताओं की दिशा तय करेंगे।